खुद्दार कहानी- पूरा परिवार गूंगा-बहरा, मां-पापा मजदूर
”मेरा पूरा परिवार गूंगा-बहरा है। कोई बोल-सुन नहीं सकता। सभी इशारों में बात करते हैं। पापा मजदूरी करते थे। बाद में दर्जी का काम करने लगे। मां दूसरे घरों में काम करने और खाना पकाने जाती थी। लोग मां-पापा का मजाक उड़ाते थे। ताना मारते थे कि तुम लोगों ने ऐसे कर्म ही किए हैं कि सब के सब गूंगे-बहरे हो गए। तुम्हारे नसीब में ही खोट है।
मैं जब पढ़ने के लिए स्कूल जाने लगी, तो आसपास के लोगों ने मेरा मजाक उड़ाया। लोग कहते थे कि गूंगी-बहरी भी पढ़ने चली है। पढ़-लिखकर क्या ही करोगे। अपने मां-बाप की तरह मजदूरी ही तुम्हें भी करनी है। बहुत होगा तो किसी होटल में वेटर बन जाओगी।
मोहल्ले के बच्चे खेलते रहते और मैं एकटक उन्हें देखती रहती। मुझे कोई अपने साथ नहीं रखता था। स्कूल में गरीब होने की वजह से टीचर भी मेरे साथ भेदभाव करते थे। मेरे बाल खींचकर मुझे मारते थे। बाल काट देते थे। स्कूल में झाड़ू लगवाते थे। मैं फफक-फफक कर रोने लगती थी।
मुझे याद है- 10वीं के आसपास की बात है। एक रोज जिंदगी से तंग आकर मैंने पॉइजन पी लिया। सोचने लगी- इस जिंदगी को जीने से अच्छा है मर जाऊं। रोज-रोज तड़पने, लोगों की बातों को सुनने से अच्छा है एक बार में ही मर जाऊं, लेकिन डॉक्टर ने बचा लिया। करीब एक महीने तक हॉस्पिटल में एडमिट रही।
उसी दिन मैंने सोच लिया कि दूसरा जीवन मिला है, तो अपने जैसे हजारों लोगों को स्किल्ड करके ही मरूंगी।”
ये कहानी 36 साल की प्रीति सोनी की है। वह डिसेबल्ड बच्चों को ट्रेनिंग देती हैं। देश-विदेश हर जगह उन्हें बुलाया जाता है। अमेरिका, स्वीडन, पाकिस्तान, दुबई समेत 7 से ज्यादा देशों में ट्रेनिंग के लिए जा चुकी हैं।

दिल्ली के द्वारका में एक मॉल के सामने बने पार्क में मेरी मुलाकात प्रीति सोनी से हुई। ब्लू जैकेट और चश्मा पहने प्रीति काफी खुश लग रही हैं। हाथ के इशारे से वे कुछ बता रही हैं, लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा। पास बैठे प्रदीप मेरी मदद करते हैं। वे साइन लैंग्वेज एक्सपर्ट हैं, प्रीति के इशारे को अपने शब्दों के जरिए मुझे समझा रहे हैं।
प्रीति ‘डेफ कैन फाउंडेशन’ नाम से एक NGO चलाती हैं। देशभर के मूक-बधिर बच्चों के लिए वर्कशॉप ऑर्गनाइज करती हैं। वह मूक-बधिर बच्चों के लिए देशभर में काम करने वाली संस्था ‘नेशनल एसोसिएशन फॉर डेफ’ की सेक्रेटरी भी हैं।
प्रीति बताती हैं, ‘मैं पैदाइशी मूक-बधिर हूं। आसपास के लोग ताना मारते थे कि तुम जैसे लोगों का भविष्य ही क्या है। वेटर बनोगी, दूसरों के घरों का चूल्हा-चौका करोगी। मैं इन बातों को सुन तो नहीं सकती थी, लेकिन उनके इशारों से सब समझती थी।’

प्रीति कहती हैं, ‘मैं घर की बड़ी बेटी हूं। मम्मी-पापा भी पैदाइशी मूक-बधिर हैं। पापा दिहाड़ी मजदूरी करते थे। फिर बाद में उन्होंने दर्जी का काम करना शुरू कर दिया। किसी बंधुआ मजदूर की तरह एक जगह दोनों बंध कर रहे।
बेजुबान होने की वजह से उन्हें ढंग की दिहाड़ी भी नहीं मिलती थी, जिसमें हमारा ठीक से गुजर-बसर हो पाए। दोनों बहनों को पालने के लिए मां दूसरों के घरों में चूल्हा-चौका करने के लिए जाती थीं। दूसरों के घरों में खाना बनाने जाती थीं।
कई बार मैंने ये भी महसूस किया कि जहां वो काम करने के लिए जाती थीं, वहां के लोग मां पर चिल्ला देते थे। बहरी हो, सुनती नहीं हो, एक काम ढंग का करती नहीं है और हर महीने इन्हें तनख्वाह चाहिए।’
प्रीति आगे बताती हैं- मैं समझ गई थी कि गूंगा-बहरा होने से ज्यादा दुखद अनपढ़ रहना है। मां-पापा पढ़े होते, तो उनके साथ लोग जानवरों जैसा व्यवहार नहीं करते। इसलिए तमाम मुश्किलों के बाद भी मैंने पढ़ाई जारी रखी। ग्रेजुएशन करने के बाद B.Ed और मास्टर्स किया। अब LLB कर रही हूं, ताकि अपने जैसे लोगों का केस लड़ सकूं।

आप दिल्ली से हैं? मैं प्रीति से पूछता हूं।
प्रीति बताती हैं, ‘रहने वाली मध्यप्रदेश के इंदौर की हूं। शादी के बाद भोपाल आ गई। अभी एक ट्रेनिंग प्रोग्राम के लिए दिल्ली आई थी।
देश-विदेश के मूक-बधिर बच्चों को ट्रेंड करती हूं। उन्हें सिलाई, बुनाई, बोलने-चलने के तरीके, साइन लैंग्वेज… इन सारी चीजों को सिखाती हूं, ताकि वह अपने पैरों पर खड़ा हो सकें।
कई बार ऐसे भी मामले आते हैं, जब लंबे अरसे से घरों में कैद मूक-बधिर बच्चों का रेस्क्यू करना पड़ता है।
एक किस्सा बताती हूं- कुछ साल पहले की ही बात है। एक मूक-बधिर बच्चे को उसके परिवार वालों ने बरसों से घर में बंद करके रखा हुआ था। उनका कहना था कि यह बाहर जाएगा-आएगा, तो समाज में इज्जत नहीं बचेगी। वह ठीक से अपनी भाषा में बात भी नहीं कर पाता था। परिवारवालों का कहना था कि यह पैदा होते ही क्यों नहीं मर गया।
मैंने उस बच्चे का रेस्क्यू किया। उसे अपनी संस्था में रखा। आज वह पढ़ा-लिखा है। एक कंपनी में काम भी कर रहा है। दरअसल यदि किसी घर में मूक-बधिर बच्चा पैदा हो जाता है, तो उस बच्चे को पाप की नजर से देखा जाने लगता है।’

थानों में मूक बधिर पुलिस की नियुक्ति हो, तभी हालात बदलेंगे
वह कहती हैं, ‘मेरे साथ तो कभी गलत नहीं हुआ, लेकिन जब कई मामलों से रूबरू होती हूं कि मूक-बधिर बच्चे, खास तौर से लड़कियों के साथ रेप, शारीरिक उत्पीड़न की घटनाएं ज्यादा होती हैं। अब जो बोल नहीं सकते हैं, सुन नहीं सकते हैं, वह अपनी बात पुलिस के सामने, कोर्ट में कैसे रख सकते हैं। इसलिए मैं अभी एक मुहिम चला रही हूं।
सरकार से मांग कर रही हूं कि सभी पुलिस स्टेशन में एक ऐसा पुलिसकर्मी नियुक्त हो, जो मूक-बधिर हो। ताकि वह ऑफिसर न बोलने, न सुनने वाले व्यक्ति की बातों को साइन लैंग्वेज के जरिए बता सके, समझा सके।’
इसके लिए तो देश में कई संस्थाएं काम कर रही हैं?
‘जो काम कर रहे हैं, सभी बोलने-सुनने वाले लोग हैं। जो चीजें मैंने स्कूल-कॉलेज के दौरान देखा कि मूक-बधिर बच्चों के साथ कैसे बर्ताव होता है। हमें जोकर की तरह समझा जाता है। उन्हें ऐसा लगता है कि ये तो कुछ बोल-सुन सकते नहीं हैं, जो मन में आए, वह हमारे साथ कर लें।
मेरी बहन को ही ले लीजिए। उसका पढ़ने-लिखने में बिल्कुल भी इंटरेस्ट नहीं है। अब जैसी मेरी जिंदगी है, वह नहीं बन पाई। मेरे भीतर तो बचपन से खुद-ब-खुद एक अवेयरनेस था। शायद गॉड गिफ्ट कह सकते हैं।’

डॉक्टर ने कहा आपकी बेटी बोल सकती है, तो मुझे खुशी का ठिकाना नहीं रहा
हमारी बातचीत के दौरान प्रीति के घर से फोन आता है। आज उनकी बेटी का बर्थडे है। 2012 में उनकी शादी हुई थी।
पूछने पर कहती हैं, ‘पति भी मूक-बधिर हैं। वह IGNOU में पोस्टेड हैं। हम दोनों एक कॉन्फ्रेंस के दौरान मिले थे। उसके बाद हमने शादी कर ली। मेरी बेटी नॉर्मल है। वह सुन-बोल सकती है।
शादी के पहले तक लोग यही कहते थे- इसका भी पूरा खानदान गूंगा-बहरा है। अब शादी की है, तो बच्चा और आगे की जेनरेशन भी गूंगा-बहरा होगी, लेकिन जब बेटी पैदा हुई और डॉक्टर ने कहा- यह सुन-बोल सकती है, तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
आज मैं हजारों मूक-बधिर बच्चों को पढ़ा रही हूं। साइन लैंग्वेज में डांस भी करती हूं। एक हॉटस्टार की फिल्म में मैंने काम भी किया है।
मुझे फिल्म देखने का बहुत शौक है, लेकिन दुख होता है कि हम लोगों को ध्यान में रखकर कोई डायरेक्टर फिल्म नहीं बनाता है। स्क्रीन पर क्या चल रहा होता है, कभी समझ में नहीं आया। सिर्फ जो एक्शन सीन होता है, उससे लगता है कि मार-पीट जैसा कुछ चल रहा है।

इसलिए मैं कुछ ऐसी फिल्मों पर भी काम कर रही हूं, जिसमें साइन लैंग्वेज दिया गया हो। देश में लाखों ऐसे मूक-बधिर लोग हैं, जिन्हें साइन लैंग्वेज भी नहीं आती है। मेरे पास कई ऐसे बच्चे आते हैं, जो इशारों में बात करते हैं। मान लीजिए कि उनसे किसी ने पूछा- खाना खा लिया, तो वो बच्चे भी खाना खाने का इशारा करते हुए बोलते हैं।
अब सभी बातों को तो ऐसे नहीं समझा सकते हैं। इसलिए हम बच्चों को साइन लैंग्वेज पढ़ाते हैं, ताकि वह समाज में सिर उठाकर जी सकें।’
प्रीति को बचपन की बातें याद आ रही हैं। वह कहती हैं, ‘मैं कभी-कभी सोचती हूं कि पढ़ी-लिखी नहीं होती, तो अपने मां-बाप की तरह मैं भी किसी के घर में बर्तन धो रही होती, होटलों में वेटर का काम कर रही होती।’
