एक ऐसा शब्द, जो सुनने में जितना सधा हुआ लगता है, उतना ही भीतर से उलझा हुआ है।

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*गुस्ताखी माफ*

 

एक ऐसा शब्द, जो सुनने में जितना सधा हुआ लगता है, उतना ही भीतर से उलझा हुआ है।

 

जब आप कहते हैं, सियासत इस कदर अवाम पर अहसान करती है पहले छीन लेती है आँखें, फिर चश्मे दान करती है।

 

तो यह सिर्फ एक लेख नहीं बल्कि एक कड़वा सच है।

 

यह पंक्तियाँ उस दर्द को बयान करती हैं, जिसे आम आदमी रोज़ महसूस करता है, मगर अक्सर शब्द नहीं दे पाता।

 

जो लोग हमारे भविष्य का फैसला करते हैं, वही क्यों हमारे वर्तमान को इतना धुंधला कर देते हैं?

 

सियासत का खेल बड़ा अजीब होता है। यह सीधे वार नहीं करती, बल्कि धीरे-धीरे इंसान की सोच, उसकी उम्मीदें और उसकी हिम्मत छीन लेती है पहले वो हालात पैदा किए जाते हैं, जहाँ इंसान अपनी बुनियादी ज़रूरतों के लिए तरसने लगे रोज़गार, शिक्षा, सुरक्षा, सब कुछ अधूरा छोड़ दिया जाता है फिर एक दिन वही सियासत मदद का हाथ बढ़ाती है, कुछ योजनाएँ, कुछ वादे, कुछ राहत के टुकड़े, और इसे एहसान का नाम दे दिया जाता है।

 

लेकिन सवाल ये है की

 

जिसे पहले अंधेरा दिया गया, उसे रोशनी देना क्या सच में एहसान है?

 

अवाम की बेबसी यह है कि अवाम जो उम्मीदों के सहारे जीती है, वो हर बार भरोसा करती है कि इस बार कुछ बदलेगा। लेकिन अक्सर उसे मिलता है टूटे हुए वादों का ढेर और अधूरी उम्मीदों का बोझ।

 

लोग सोचते हैं कि शायद यही सिस्टम है शायद यही तक़दीर है और यही सोच सबसे खतरनाक होती है। क्योंकि जब इंसान सवाल करना छोड़ देता है तब सियासत और ताकतवर हो जाती है।

 

लेकिन हर अंधेरे के बाद एक रोशनी भी होती है। जब अवाम जागती है, सवाल पूछती है, और अपने हक के लिए खड़ी होती है तब सियासत को भी बदलना पड़ता है। असल ताकत कुर्सी में नहीं, बल्कि उस कुर्सी को देने वाले लोगों में होती है।

 

यह लेख हमें सिर्फ सियासत की सच्चाई नहीं दिखाता, बल्कि हमें आईना भी दिखाता है कि हम कब तक इस एहसान के भ्रम में जीते रहेंगे?

 

शायद अब वक्त आ गया है कि हम चश्मा लेने से पहले यह पूछें हमारी आँखें छीनी ही क्यों गई थीं?

 

मेरे इस लेख से अगर किसी को ठेस पहुंचे तो एक बार फिर कहता हूं गुस्ताखी माफ।

 

*News 69 Channel*

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