मण्डला की मिट्टी ने रोका बहुत… पर शासन का आदेश भारी पड़ा*

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*मण्डला की मिट्टी ने रोका बहुत… पर शासन का आदेश भारी पड़ा*

 

*कलेक्टर सोमेश मिश्रा का तबादला एक अफसर नहीं, भरोसे का चेहरा विदा हुआ*

 

हर तबादला एक खबर होता है, लेकिन कुछ तबादले इतिहास बन जाते हैं—क्योंकि वे सिर्फ पद का बदलाव नहीं, बल्कि एक पूरे दौर के अंत की आहट होते हैं। मण्डला ने ऐसा ही एक दिन देखा, जब कलेक्टर श्री सोमेश मिश्रा ने जिले को अलविदा कहा और नर्मदापुरम के लिए प्रस्थान किया।

सरकारी आदेश अपनी जगह था—संक्षिप्त, स्पष्ट और निर्विवाद। पर उस आदेश की स्याही में वह गहराई नहीं थी, जो मण्डला की सड़कों, गांवों और लोगों की आंखों में दिखाई दे रही थी। एक ऐसा अफसर, जिसने फाइलों से आगे बढ़कर लोगों के बीच अपनी पहचान बनाई, आज उसी जमीन से चुपचाप विदा हो रहा था।

कलेक्ट्रेट परिसर में औपचारिकताएं पूरी होती रहीं—प्रभार हस्तांतरण, दस्तावेजों पर हस्ताक्षर, नए कलेक्टर का स्वागत। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया के बीच एक अदृश्य खामोशी पसरी रही। वह खामोशी, जो अक्सर तब जन्म लेती है जब कोई “अपना” विदा हो रहा हो।

श्री सोमेश मिश्रा का कार्यकाल मण्डला के लिए सिर्फ प्रशासनिक गतिविधियों का समय नहीं था, बल्कि यह एक ऐसे नेतृत्व का दौर था, जिसमें संवेदनशीलता और सख्ती का संतुलन साफ दिखाई देता था। वे उन अधिकारियों में रहे, जिन्होंने आदेश देने से पहले सुनना सीखा, और निर्णय लेने से पहले समझना जरूरी समझा।

गांवों की पगडंडियों पर उनकी अचानक मौजूदगी, आमजन से सीधा संवाद, और छोटी-छोटी समस्याओं को प्राथमिकता देना ये सब बातें उन्हें भीड़ से अलग करती रहीं। यही वजह है कि उनका जाना सिर्फ एक ट्रांसफर नहीं, बल्कि एक विश्वास के स्थानांतरण जैसा महसूस हो रहा है। नर्मदापुरम अब उनका अगला पड़ाव है एक नया जिला, नई चुनौतियां और नई उम्मीदें। लेकिन मण्डला के लिए यह विदाई एक गहरी लकीर खींच गई है, जिसे समय भी हल्का नहीं कर पाएगा।

कई अधिकारी आते हैं, अपना कार्यकाल पूरा करते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन कुछ ऐसे होते हैं, जो जाते समय अपने पीछे आंकड़े नहीं, किस्से छोड़ जाते हैं और श्री सोमेश मिश्रा उन्हीं में से एक बनकर उभरे हैं।

मण्डला आज चुप है लेकिन इस खामोशी में एक वाक्य बार-बार गूंज रहा है साहब, आपने कुर्सी नहीं संभाली इस जिले का भरोसा संभाला था।

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