दर्शकों की पीड़ा दूर करें टीवी चैनल

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*दर्शकों की पीड़ा दूर करें टीवी चैनल*

 

टीवी न्यूज़ चैनल एक ही बात को लगातार कितनी बार रिपीट कर सकते हैं,

क्या इसकी कोई सीमा निर्धारित नहीं होनी चाहिए,

ताकि दर्शकों का बेशकीमती वक्त खामखां जाया न हो ?

इसके अलावा चैनलों पर होने वाली चर्चा (डिबेट) में एक से अधिक लोगों को एक साथ जोर-जोर से बोलने देने के लिए भी कोई समय सीमा तय होनी चाहिए कि नहीं ?

क्योंकि एक से ज्यादा लोगों के एक साथ चीखने से

हाहाकारी हालात बन जाते हैं, जिनमें दर्शकों को किसी की भी बात साफ सुनाई नहीं देती, इससे उनका मूल्यवान समय बर्बाद होता है।

 

ये शिकायतें आज के समय में ज्यादातर टीवी दर्शकों की है। लेकिन दुनिया भर की पल-पल की जानकारी रखने का दावा करने वाले न्यूज़ चैनल क्या अपने ही दर्शकों के बड़े हिस्से की इस पीड़ा से बेखबर हैं ?

या फिर वे अपनी छिपी व्यवसायिक रणनीति के तहत दर्शकों के हितों की जानबूझ कर अनदेखी कर रहे हैं ?

 

न्यूज़ चैनलों पर होने

वाला ‘शोर-शराबा’ और ‘रिपीटिटिव कंटेंट’ न केवल दर्शकों का समय खराब करता है और उनका माथा भन्ना देता है,

बल्कि यह पत्रकारिता के मानकों के भी खिलाफ है।

 

> एक और गंभीर मुद्दा यह है कि जिओ हॉट स्टार जैसे जो ब्रॉडकास्टर्स (प्रसारक) दर्शकों से उनके पसंद के प्रोग्राम दिखाने के लिए पैसे ले रहे हैं, वे प्रोग्राम से ज्यादा समय विज्ञापन दिखा कर दर्शकों के साथ फरेब कर रहे हैं !

 

यानी विज्ञापन देखने के जिस काम के लिए दर्शकों को पैसे दिए जाने चाहिए, उसके लिए उल्टे दर्शकों से पैसे वसूले जा रहे हैं !

हैरान करने वाली बात यह है कि पैसे लेकर जितने समय प्रोग्राम दिखाया जाता है, उससे ज्यादा समय विज्ञापन दिखाए जाते हैं !

यानी आपके ही पैसों से आपको विज्ञापन का डोज जबरन पिलाया जा रहा है!

 

प्रोग्राम के बीच हर 5 -7 मिनट के अंतराल पर विज्ञापन दिखा कर,

दर्शकों के प्रोग्राम देखने के आनंद में भी बार-बार व्यवधान डाल रहे हैं ये ब्रॉडकास्टर्स।

 

हैरान करने वाली एक और बात यह है कि अगर आपको विज्ञापन नहीं देखने हैं तो उसके लिए भी “एड फ्री” के नाम पर दर्शकों से पैसा वसूल रहे हैं ये ब्रॉडकास्टर्स।

यानी दर्शकों को दोनों तरफ से लूट रहे हैं।

विज्ञापन देखने के लिए भी पैसा दो और न देखने के लिए भी पैसा दो।

खुल्लम खुल्ला हो रही इस नाजायज वसूली पर रेगुलेटरी अथॉरिटीज क्यों अंधी- बहरी बनी हुई है ?

 

क्या इन चैनलों की सरकारी नियामक संस्था ‘भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI)’ को यह सब होते नहीं दिख रहा है,

जो एक आम आदमी को भी साफ-साफ और रोज-रोज दिख रहा है ?

 

प्रसारकों ने स्व नियंत्रण के लिए अपने संगठन भी बना रखे हैं। उनमें ‘न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन (NBDA)’ और ‘न्यूज ब्रॉडकास्टर्स फेडरेशन (NBF)’ प्रमुख हैं।

पर ये दोनों संगठन भी सब कुछ जानते बूझते हुए शुतुरमुर्गी रवैया अख्तियार किए हुए हैं ! Aatmdeep

 

क्या करोड़ों दर्शकों के हित में हमारा केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय इस अस्वाभाविक और शोषणकारी स्थिति पर ध्यान देगा ?

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