परिवर्तन प्रकृति का नियम है तो भाजपा भी परिवर्तन की ओर ?
परिवर्तन प्रकृति का नियम है तो भाजपा भी परिवर्तन की ओर ?
राजेन्द्र सिंह जादौन
कहते हैं प्रकृति कभी स्थिर नहीं रहती नदी बहती है, मौसम बदलते हैं, पेड़ पत्ते गिराकर नए उगाते हैं। अब जब प्रकृति ही परिवर्तनशील है तो राजनीति भला कैसे अछूती रह सकती है? और जब बात भारतीय जनता पार्टी की हो, तो परिवर्तन भी थोड़ा “मेगा इवेंट” जैसा होना चाहिए हल्का-फुल्का नहीं, बल्कि ऐसा कि पोस्टर बदलें, चेहरे बदलें, और जनता फिर से भ्रम में पड़ जाए कि “अबकी बार सच में बदलाव है!”
2014 से लेकर अब तक भाजपा ने सत्ता का ऐसा स्वाद चखा है कि विपक्ष को डायबिटीज हो गई और जनता को हाई ब्लड प्रेशर। हर चुनाव में “परिवर्तन” का नारा दिया गया कभी सरकार बदलने के लिए, कभी व्यवस्था बदलने के लिए, और अब लगता है कि पार्टी खुद को ही बदलने के मूड में है। यानी अब नारा कुछ यूँ हो सकता है “परिवर्तन हममें भी जरूरी है!”
सूत्रों की मानें तो जुलाई 2026 तक भाजपा में बड़े बदलाव होने वाले हैं। अब “सूत्र” कौन हैं, यह वही जानते हैं जो हर बार “विश्वसनीय सूत्रों” के हवाले से खबरें चलाते हैं। ये सूत्र इतने शक्तिशाली होते हैं कि इन्हें खुद पार्टी के बड़े नेता भी नहीं जानते, लेकिन खबरें इनके नाम पर ही बनती हैं। खैर, सूत्र कह रहे हैं तो कुछ न कुछ तो बदलना ही है चाहे कुर्सी बदले या कुर्सी पर बैठने का अंदाज़।
कहा जा रहा है कि केंद्र से लेकर राज्यों तक बदलाव की बयार चलेगी। अब यह बयार ठंडी होगी या गर्म, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि किसका पत्ता कटता है और किसका लग जाता है। राजनीति में “परिवर्तन” का मतलब आम आदमी के लिए विकास हो सकता है, लेकिन नेताओं के लिए यह सीधा-सीधा “पद परिवर्तन” होता है आज मंत्री, कल मार्गदर्शक मंडल, और परसों “वरिष्ठ नेता”।
बंगाल, केरल, तमिलनाडु जैसे राज्यों में भाजपा अभी भी “संभावनाओं” की राजनीति कर रही है। यहाँ हर चुनाव के बाद पार्टी कहती है “हमने अच्छा प्रदर्शन किया, बस जनता को समझने में थोड़ी देर लगी।” अब अगर इन राज्यों के बाद मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और गुजरात में बदलाव की बात हो रही है, तो समझ लीजिए कि पार्टी खुद भी मान रही है कि “कुछ तो गड़बड़ है दया!”
सबसे दिलचस्प मामला बिहार का है, जहाँ महिला मुख्यमंत्री बनाने की चर्चा है। यह सुनकर कई नेताओं की नींद उड़ गई है कुछ इसलिए कि उन्हें मौका नहीं मिलेगा, और कुछ इसलिए कि अब उन्हें महिला सशक्तिकरण पर सच में काम करना पड़ेगा। वैसे भी भारतीय राजनीति में महिला नेतृत्व अक्सर “प्रयोग” के रूप में देखा जाता है जब पुरुष नेता थक जाते हैं या उलझ जाते हैं, तब कहा जाता है, “चलो अब बदलाव करते हैं।”
परिवर्तन की इस पूरी प्रक्रिया में सबसे ज्यादा कन्फ्यूज अगर कोई है तो वह है आम कार्यकर्ता। उसे समझ ही नहीं आता कि वह किसके पोस्टर लगाए पुराने वाले नेता के या आने वाले नए चेहरे के? और अगर गलती से गलत पोस्टर लगा दिया, तो उसका राजनीतिक करियर वहीं खत्म। इसलिए कार्यकर्ता अब पोस्टर लगाने से पहले भी “सूत्रों” की पुष्टि करने लगे हैं।
जनता भी कम दिलचस्प नहीं है। उसे हर बार बताया जाता है कि “अबकी बार असली बदलाव होगा।” जनता भी हर बार विश्वास कर लेती है, क्योंकि उसके पास विकल्प कम और उम्मीद ज्यादा होती है। लेकिन धीरे-धीरे उसे समझ आने लगा है कि राजनीति में परिवर्तन का मतलब अक्सर वही होता है “नाम नया, काम वही।”
राजनीति का यह परिवर्तन भी प्रकृति के नियम जैसा ही है बस फर्क इतना है कि प्रकृति में बदलाव अपने आप होता है, और राजनीति में बदलाव “प्रबंधन” से होता है। यहाँ मौसम नहीं बदलते, बल्कि माहौल बदला जाता है।
तो अब इंतजार कीजिए जुलाई 2026 कादेखते हैं कौन “परिवर्तित” होता है, कौन “स्थिर” रहता है, और कौन “मार्गदर्शक” बनकर इतिहास के पन्नों में चला जाता है।
बाकी…राम जी की मर्जी तो है ही,
लेकिन राजनीति में राम जी भी शायद यही सोचते होंगे “हे प्रभु! ये परिवर्तन है या पुनः व्यवस्था?” 😄
