सवालों से घबराती मोहन सत्ता और दबाव में पत्रकारिता”?
*“सवालों से घबराती मोहन सत्ता और दबाव में पत्रकारिता”?*
संपादकीय – राजेन्द्र सिंह जादौन
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी पारदर्शिता और जवाबदेही होती है, और इस व्यवस्था में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ इसलिए कहा गया है क्योंकि वह जनता और सत्ता के बीच एक सेतु का काम करती है। पत्रकार का दायित्व केवल खबरें दिखाना या छापना नहीं होता, बल्कि सत्ता से सवाल करना, उसकी नीतियों का विश्लेषण करना और जनता की आवाज को मजबूती से उठाना भी होता है। लेकिन आज जिस तरह का माहौल बनता जा रहा है, वह न केवल चिंता का विषय है बल्कि लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी भी है।
मैं व्यक्तिगत रूप से किसी भी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में खड़े होकर आरोप-प्रत्यारोप करने में विश्वास नहीं रखता। मेरा काम सिर्फ इतना है कि जो भी सत्ता में है, उससे सवाल किए जाएं। क्योंकि पत्रकार किसी का गुलाम नहीं होता, न वह किसी संस्था के दबाव में काम करता है और न ही किसी सरकार का प्रवक्ता होता है। उसकी निष्ठा केवल सच और जनता के प्रति होती है।
मध्यप्रदेश की राजनीति में लंबे समय तक एक स्थिर सरकार रही। उस दौरान भी मतभेद हुए, आलोचनाएं हुईं, लेकिन एक बात स्पष्ट थी कि पत्रकारों को अपनी बात कहने की स्वतंत्रता थी। सरकार की आलोचना करने पर भी संवाद के दरवाजे बंद नहीं होते थे। यह लोकतंत्र की स्वस्थ परंपरा थी, जहां असहमति को दुश्मनी नहीं माना जाता था।
लेकिन वर्तमान परिदृश्य में स्थिति बदलती नजर आ रही है। अब अगर कोई पत्रकार सरकार से सवाल करता है, उसकी नीतियों पर उंगली उठाता है या किसी गड़बड़ी को उजागर करता है, तो उसे सीधे या परोक्ष रूप से दबाव का सामना करना पड़ता है। यह दबाव कई रूपों में आता है कभी आर्थिक, कभी प्रशासनिक और कभी व्यक्तिगत।
सबसे बड़ा हथियार बना है विज्ञापन। मीडिया संस्थानों की आर्थिक संरचना काफी हद तक सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर रहती है। ऐसे में अगर किसी संस्थान के पत्रकार की रिपोर्टिंग सरकार को असहज करती है, तो सबसे पहले उसी संस्थान के विज्ञापन रोक दिए जाते हैं। यह संदेश साफ होता है कि “सवाल करोगे तो कीमत चुकानी पड़ेगी।” यह न केवल पत्रकार को बल्कि पूरे संस्थान को प्रभावित करता है, क्योंकि उसकी आजीविका पर सीधा असर पड़ता है।
स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है जब इस विषय में संबंधित अधिकारियों से बात की जाती है और जवाब मिलता है “क्या आपने हमसे पूछकर चैनल शुरू किया था?” यह जवाब केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि एक मानसिकता का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि सत्ता अब खुद को इतना शक्तिशाली मानने लगी है कि उसे लगता है मीडिया का अस्तित्व भी उसकी अनुमति पर निर्भर है।
दूसरी ओर, यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि प्रदेश में कई ऐसे चैनल और प्लेटफॉर्म सक्रिय हैं जो नियमों का खुला उल्लंघन कर रहे हैं। किराए के लाइसेंस पर संचालन, नियमों की अनदेखी और कानून की धज्जियां उड़ाना आम बात हो गई है। लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती, क्योंकि वे सत्ता से सवाल नहीं करते, बल्कि उसकी छवि को चमकाने का काम करते हैं। यह दोहरा मापदंड लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
आज एक ईमानदार पत्रकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपने कर्तव्य और अपने अस्तित्व के बीच संतुलन कैसे बनाए। एक तरफ सच बोलने की जिम्मेदारी है, तो दूसरी तरफ रोजी-रोटी का संकट। लेकिन असली पत्रकार वही होता है जो इन कठिन परिस्थितियों में भी सच का साथ नहीं छोड़ता।
पत्रकारिता कोई साधारण पेशा नहीं है, यह एक मिशन है। इसमें संघर्ष स्वाभाविक है। अगर सच लिखने की कीमत विज्ञापन बंद होना, झूठे मुकदमे झेलना या सामाजिक दबाव सहना है, तो यह कीमत चुकाने के लिए तैयार रहना ही सच्ची पत्रकारिता है। इतिहास गवाह है कि हर दौर में सत्ता ने सवालों को दबाने की कोशिश की है, लेकिन अंततः सच ही सामने आया है।
मेरे लिए पत्रकारिता केवल एक काम नहीं, बल्कि एक संकल्प है। मैं उन विचारों से प्रेरित हूं जो लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सर्वोपरि मानते हैं। इसलिए सवाल करना मेरा अधिकार ही नहीं, बल्कि मेरा कर्तव्य भी है। चाहे इसके लिए कितनी भी चुनौतियां क्यों न झेलनी पड़ें, यह रास्ता नहीं छोड़ा जा सकता।
सत्ता को भी यह समझना होगा कि सवालों को दबाकर वह अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती। लोकतंत्र में आलोचना कोई अपराध नहीं, बल्कि सुधार का माध्यम होती है। अगर सरकारें आलोचना को स्वीकार करें और उसे सुधार के अवसर के रूप में लें, तो न केवल व्यवस्था मजबूत होगी बल्कि जनता का विश्वास भी बढ़ेगा।
आज जरूरत है कि पत्रकार, मीडिया संस्थान और समाज मिलकर इस बात को समझें कि स्वतंत्र पत्रकारिता ही लोकतंत्र की असली ताकत है। अगर इसे कमजोर किया गया, तो इसका असर केवल मीडिया पर नहीं, बल्कि पूरे समाज पर पड़ेगा।
मैं अपने रास्ते पर अडिग हूं और रहूंगा। सवाल करता रहूंगा, क्योंकि यही मेरा धर्म है, यही मेरा कर्म है। चाहे इसके लिए कितनी भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े, लेकिन सच की आवाज को दबने नहीं दिया जाएगा। लोकतंत्र की रक्षा के लिए यह संघर्ष जरूरी है, और यह संघर्ष जारी रहेगा।
