सब कुछ बदल गया, बस मालवा का आरएसएस का गढ़ आज भी वहीं खड़ा है?

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*सब कुछ बदल गया, बस मालवा का आरएसएस का गढ़ आज भी वहीं खड़ा है?*

व्यंग्य – राजेन्द्र सिंह जादौन

कहा जाता है कि समय सबसे बड़ा परिवर्तनकर्ता होता है। समय के साथ समाज बदलता है, शहर बदलते हैं, सोच बदलती है और विकास की नई-नई कहानियाँ लिखी जाती हैं। लेकिन कभी-कभी देश के नक्शे पर कुछ जगहें ऐसी भी होती हैं जहाँ समय जैसे रुक सा जाता है। मालवा का एक ऐसा ही जिला है शाजापुर।

मालवा की इस धरती को लंबे समय से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी का मजबूत गढ़ माना जाता है। चुनाव आते हैं, विकास के वादों की बरसात होती है, मंच सजते हैं, भगवा झंडे लहराते हैं और जनता लाखों वोटों से नेताओं को जिताती भी है। लेकिन जब चुनावी शोर थमता है और जमीन की सच्चाई सामने आती है, तब सवाल उठता है कि आखिर इन वर्षों में बदला क्या है?

अगर शाजापुर की गलियों में घूमकर देखा जाए तो विकास की कहानी कुछ अलग ही दिखाई देती है।
बदलाव अगर हुआ है तो वह टंकी चौराहे से निकलकर बॉम्बे की ओर जाने वाले हाइवे में दिखाई देता है। सड़कें जरूर चौड़ी हो गई हैं, लेकिन विकास की दिशा आज भी उतनी ही संकरी लगती है।

धर्म के नाम पर मंदिर जरूर खड़े हो गए हैं। हर साल किसी न किसी धार्मिक आयोजन के नाम पर चंदा भी खूब इकट्ठा होता है। शहर में धार्मिक झंडों और पोस्टरों की संख्या जरूर बढ़ गई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या धर्म के नाम पर बने इन ढाँचों ने जिले के विकास की तस्वीर भी बदली है?।शायद नहीं।

अगर असली बदलाव की सूची बनाई जाए तो उसमें सबसे ऊपर नेताओं की अवैध कॉलोनियाँ आती हैं। विकास के नाम पर शहर के आसपास जमीनों का खेल खूब हुआ है। राजनीतिक आशीर्वाद से कई नई कॉलोनियाँ उग आईं, जैसे बरसात में खेतों में कुकुरमुत्ते उग आते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि कुकुरमुत्ते प्राकृतिक होते हैं और ये कॉलोनियाँ राजनीतिक कृपा से जन्म लेती हैं।
शाजापुर से मेरा रिश्ता भी पुराना है।।मैंने इस जिले को 1982 में छोड़ा था, में यही पैदा हुआ मेरी पढ़ाई मैंने यही सरस्वती शिशु मंदिर में की थी। उसके बाद पिता जी के साथ मैं भोपाल चला आया। उस समय भी शाजापुर एक शांत और ठहरा हुआ जिला था।

आज लगभग चार दशक बाद जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि शहर की आत्मा अब भी वहीं खड़ी है, जहाँ उसे छोड़कर गया था।

आज तक न जाने कितने विधायक बदले और कितने सांसद आए और चले गए। हर चुनाव में जनता से कहा गया कि इस बार विकास की गंगा बहेगी। हर बार जनता ने भरोसा भी किया और वोट भी दिए। लेकिन विकास की वह गंगा शायद रास्ता भटक गई, क्योंकि शाजापुर के कई हिस्सों तक वह आज भी नहीं पहुँच पाई।

राजनीति जरूर खूब चमकी है। चुनावी मंच बड़े हो गए हैं, भाषणों का शोर बढ़ गया है और पोस्टरों की संख्या भी कई गुना हो गई है। लेकिन अगर किसी किसान, मजदूर या छोटे व्यापारी से पूछा जाए कि पिछले 40–50 साल में उसके जीवन में कितना बदलाव आया है, तो जवाब अक्सर बहुत उत्साहजनक नहीं होता।

यहाँ की राजनीति में धर्म का रंग जरूर गहरा हुआ है।
भगवा के नाम पर राजनीति खूब चमकी है। चंदा भी खूब आया और संगठन भी मजबूत हुए। लेकिन जब बात शिक्षा, रोजगार और उद्योग की आती है तो तस्वीर कुछ फीकी नजर आती है।

शाजापुर के युवाओं को आज भी बेहतर अवसरों की तलाश में बड़े शहरों की ओर पलायन करना पड़ता है। पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी के लिए उन्हें इंदौर, भोपाल या दूसरे शहरों का रुख करना पड़ता है।

जिले में अगर कुछ तेजी से बढ़ा है तो वह है राजनीतिक दावे और धार्मिक आयोजन।।विकास के नाम पर सड़कें जरूर बनीं, लेकिन उद्योगों की कतारें नहीं लगीं।

नेताओं के भाषणों में योजनाओं की सूची जरूर लंबी होती गई, लेकिन जमीन पर बदलाव की गति उतनी तेज नहीं दिखी जितनी मंचों पर बताई जाती है।

कभी-कभी लगता है कि शाजापुर की राजनीति एक ऐसे चक्र में फँस गई है जहाँ हर चुनाव में वही बातें दोहराई जाती हैं। विकास का वादा, धर्म का नारा और फिर अगले चुनाव तक इंतजार।

इस पूरे खेल में अगर कोई सबसे ज्यादा धैर्य से खड़ा है तो वह है आम नागरिक।।वह हर चुनाव में उम्मीद के साथ वोट डालता है और फिर अगले पाँच साल तक इंतजार करता है कि शायद इस बार कुछ बदलेगा।

लेकिन जब सालों बाद पीछे मुड़कर देखा जाता है तो लगता है कि असल में ज्यादा कुछ नहीं बदला।
विधायक बदल गए, सांसद बदल गए, सरकारें बदल गईं, लेकिन जिले की मूल तस्वीर लगभग वैसी ही बनी रही।
शायद यही कारण है कि कभी-कभी मन में यह सवाल उठता है कि क्या सचमुच सब कुछ बदल गया है?
या फिर मालवा का यह आरएसएस का गढ़ आज भी उसी जगह खड़ा है जहाँ दशकों पहले था जहाँ राजनीति आगे बढ़ गई, लेकिन विकास अब भी रास्ता तलाश रहा है।

क्योंकि इतिहास गवाह है कि किसी भी क्षेत्र की असली ताकत केवल राजनीतिक नारे नहीं होते, बल्कि शिक्षा, उद्योग, रोजगार और सामाजिक विकास होता है।
और जब तक ये चारों स्तंभ मजबूत नहीं होंगे, तब तक चाहे कितने ही झंडे लहरा लिए जाएँ, विकास की कहानी अधूरी ही रहेगी।

इसलिए सवाल आज भी वहीं खड़ा है।क्या सचमुच सब कुछ बदल गया है,या फिर मालवा का यह गढ़ आज भी समय के उसी मोड़ पर खड़ा है जहाँ से विकास की राह अभी शुरू ही नहीं हुई?

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