अब तो सारे घर के बदल दीजिये मंत्री!

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किसी भी मंत्रिमंडल में किसे रखना और किसे नहीं ये अधिकार प्रधानमंत्री और प्रदेश में मुख्यमंत्री का माना जाता है, पर होता नहीं है. ये अधिकार पार्टी हाईकमान का होता है. मप्र में जिलों के प्रभारी मंत्रियों का रिपोर्ट कार्ड सार्वजनिक होने के बाद ये मांग शुरू हो सकती है कि अब कम से कम उन मंत्रियों को रवानगी दे दी जाना चाहिए जो एकदम निकम्मे साबित हुए हैं.
मप्र के प्रभारी मंत्रियों का रिपोर्ट कार्ड अचानक सार्वजनिक नहीं हुआ बल्कि ऐसा इरादतन किया गया है ताकि मुख्यमंत्री पर चड्डी गांठ रहे मंत्रियों की बोलती बंद की जा सके. आपको पता है कि मप्र भाजपा और सरकार में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. कुछ बागी मंत्री खुलेआम मंत्रिमंडल की बैठकों का बहिष्कार कर रहे हैं.
आपको बता दें कि पुरानी परंपरा के अनुसार अगस्त 2024 को मोहन यादव सरकार के मंत्रियों को जिलों का प्रभार दिया गया. उस समय यह कहा गया था कि प्रभारी मंत्री अपने प्रभार वाले जिलों का न केवल दौरा करेंगे, बल्कि रात रुकेंगे और स्थानीय स्तर पर बैठकें भी लेंगे.लेकिन पिछले डेढ़ साल की तफ्तीश से पता चला कि कई दिग्गज मंत्रियों ने न तो बैठकें ली न रात रुकने में रुचि दिखाई।इसी तफ्तीश को मंत्रियों का रिपोर्ट कार्ड कहा जा रहा है.
सरकार द्वारा अपने स्तर पर कराए गए एक सर्वे के मुताबिक कुछ मंत्री तो ऐसे हैं जो 18 महीनों में दस बार भी प्रभार के जिलों में नहीं गए. जिलों से आई मैदानी रिपोर्ट में यह चकित करने वाले तथ्य सामने आए हैं. सुना जा रहा है कि सरकारी पार्टी ये रपट सार्वजनिक होते ही गंभीर तो हो गई है लेकिन अभी किस मंत्री के खिलाफ क्या कार्रवाई करना है ये तय नहीं कर सकी.माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में मंत्रियों के प्रभार वाले जिलों में बदलाव और मंत्रिमंडल विस्तार में यह रिपोर्ट अहम रोल निभा सकती है.
रिपोर्ट कार्ड के हिसाब से छोटे मियां तो छोटे मियां, बडे मियां सुभानअल्लाह निकले.उप मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा जबलपुर जैसे प्रभार वाले जिले में सिर्फ दो रात रुके और एक बैठक ली. दूसरे डिप्टी राजेंद्र शुक्ला भी शहडोल में सिर्फ दो रात रुके और दो बैठकें लीं.मोहन सरकार को लगातार परेशानी में डालने वाले स्थानीय शासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय धार में रात रुके ही नहीं. लोनिवि मंत्री राकेश सिंह ने नर्मदापुरम की अभी तक कोई बैठक नहीं ली.मुख्यमंत्री पद के दावेदार मंत्री प्रहलाद पटेल भिंड में सिर्फ दो रात रुके.
मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव के निर्दैशो को धता बताते हुए मंत्री राकेश सिंह, विश्वास सारंग और राकेश शुक्ला ने एक भी बैठक प्रभारी जिले में नहीं ली. कैलाश विजयवर्गीय, राकेश शुक्ला, कृष्णा गौर व चैतन्य काश्यप ने अपने प्रभार वाले जिले में एक रात रुकना भी गवारा नहीं किया.
खबर है कि यदि मुख्यमंत्री मोहन यादव की सुनी और मानी गई तो प्रहलाद सिंह पटेल और कैलाश विजयवर्गीय के साथ ही विश्वास सारंग, प्रतिमा बागरी, दिलीप अहिरवार, इंदर परमार, नरेंद्र शिवाजी पटेल, धर्मेंद्र लोधी, विजय शाह, एदल सिंह कंषाना, नागर सिंह चौहान, और कृष्णा गौर के बारे में पुन्रविचार किया जा सकता है.
पार्टी नेतृत्व का मानना है कि यदि सभी प्रभारी मंत्री जिम्मेदारी से काम करते तो आज संगठन के भीतर जिला स्तर पर जो असंतोष दिखाई दे रहा है वह शायद न होता.आम शिकायत है कि जिन मंत्रियों ने निष्क्रियता दिखाई उन जिलों में कलेक्टर, एसपी, तहसीलदार आदि विधायक व कार्यकर्ताओं की नहीं सुनते.
उललेखनीय है कि प्रशासन के विकेंद्रीकरण के उद्देश्य से 1993 में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने प्रभारी मंत्री, प्रभारी सचिव का सेट अप बनाया था. और उसके बेहतर परिणाम भी मिले थे. लेकिन मुख्यमंत्री मोहन यादव के मंत्रियों ने इस प्रणाली को नाकाम कर दिया. खामियाजा भुगत रही है जनता और खुद मुख्यमंत्री मोहन यादव.
@ राकेश अचल
