विकास और यायावर मन की ब्यथा

मन हुआ
चार -पांच दसक पुराने अपने उस कस्बे से
पुरानी मुहब्बत जता आयें
पेड़ पौधे,नदी,नाले,पोखर, झर्रे ,बगिया , उन सबसे चलो मिल आयें
सोचा-
अल्हड़ बचपन को फिर से जी लिया जाये
कुछ सुनें और कुछ सुनाया जाये
भूले बिसरे गीतों को गुनगुनाया जाये
उसी बगिया में अपने ही पंजों के निशान खोजे जाये।
कहानी थी स्लेट- पाटी वाले स्कूल की
बात थी कस्बे की मशहूर बगिया की
पेड़ तो थे
नीम,जामुन,कटहल, पीपल के
पर नाम था चंदन की आम की बगिया
चंदन कौन था ?
आम थे नहीं ? तो आम की बगिया कैसे हो गयी ?
ये तब भी पहेली था अब तो क्या कहें।
जो भी हो
गुल्ली डंडा , क्रिकेट , फुटबाल , लुक्का -छिप्पी , अक्कड़ -बक्कड़ ,बूढ़ों की चौपाल , नेताओं की रैली ,
चिड़ियों के बसेरे , पथिकों और गरीबों को छांव के लिए बड़ी मूफीद जगह थी यह।
मेंढक ,बिच्छू,सांप,न्योले, गिरगिट
उल्लू, कोयल,कौआ,तीतर , मोर
न जाने क्या क्या ।
सारे बचपन के लिए जीवविज्ञान की प्रयोगशाला थी यह बगिया।
विकास की माँ को साथ लिए
चल पड़े हम अपने जाने पहचाने कस्बे की ओर।
××××××
यहाँ….देखा अजब उलटफेर !
एक बहुमंजिली इमारत देख आंखों को भरोसा नहीं हुआ
गार्ड से पूछा-
वो चंदन की बगिया?
खेल का मैदान ?
बोला कौन चंदन ?
जाओ !! चंदन गया तेल लेने।
शायद उसने भी इमारत ही देखी होगी
बगिया देखा होता तो
आग नहीं उगलता।
हम भी खिसयाये चलते बने।
उस दौर में
बगिया के बाहर एक पंचर की दुकान लगाती थी
उसका बेटा था खिलाड़ी
खेलने तो कभी नहीं आता था बगिया में
बस नाम था.. खिलाड़ी।
उस समय 10-12 का रहा होगा
बात बात में उसी से जान पहिचान निकल आयी
45 साल पहले के वो सारे लोग
आंखों के सामने तैरने लगे
झील की मछलियों की तरह।
मैं अब खिलाड़ी को एक टक देख रहा था
पढ़ रहा था उसके भाव
सुन रहा था उसकी कहानी
सालों से इस परिवार ने
धंधा बदल लिया पंचर छोड़
गुटका बेचना शुरु कर दिया
कहता है
‘साहब अब साइकिल कौन चलाता है।’
लोग खूब तंबाकू, गुटखा खाते हैं, सिगरेट पीते हैं।
धंधा अच्छा चल जाता है।
खिलाड़ी उम्र में हम सब की तरह 5 दशक पार कर चुका है
उसका 12 साल का बेटा भी माहिर है गुटका, तंबाकू, सिगरेट, टाफी, बीड़ी बेचने में
पास में है इंटरकालेज है
सारे बच्चे उसे नाम से जानता हैं
बच्चों का हुजूम लगा रहता है।
छत्ते में चिपकी मधुमक्खियों की तरह।
मेरे आग्रह पर खिलाड़ी पूरा कस्बा घुमाने को सहमत हो गया ।
आम की बगिया बिकने का उसे भी दुख है
मकानों का घना जंगल
न मोर, न तितली ,न कोयल, न गौरैया
सब सूना सूना।
हम चले अपने फेबरेट पोखर की ओर
जहाँ जेठ की दोपहरी गुलजार हुआ करती थी
पशु पक्षियों की लायफ लाइन था यह पोखर
कस्बे के बच्चों का स्वीमिंग पूल।
फिर एक झटका
खिलाड़ी बोला 10 बरस पहले पोखर ही सूख गया
जिस पहाड़ी से पानी भरता था
वहाँ बस्ती बन गयी
अब पोखर की जगह पंचायत ने सीमेंट का गोदाम बना रखा है।
कुछ दूर एक पानी का झर्रा था
पूरे कस्बे की पानी की जरूरत पूरी करता था।
और थोड़ी बहुत सिचाई भी।
बदले दौर में नल -जल योजना घर घर है
सो आज वहाँ कचड़े का ढेर लगा है
पानी का नामोनिशान नहीं।
पहले दो तिहाई जंगल थे
अब दो तिहाई मकान हैं।
हां, खिलाड़ी खुश है
अनाज मुफ्त है
आयुष्मान भारत है
मेहनत मजदूरी से मुक्ति है
जल जंगल जमीन के विनाश
चहकते चिड़ियों के झुंड से
उसका पहले भी कोई लगाव नहीं था
विकास और विनाश के महत्वपूर्ण मुद्दों पर
वह सिर नहीं खपाता ।
उसका मन है कस्बा एक बड़ा शहर बन जाये।
रेल, मेट्रो, चल जाये
मौल बन जाये
विकास के इन्हीं सपनों में मस्त रहता है।
विकास की अम्मा ने कहा
यहीं जगह मिली थी घूमने को ??
मैंने कहा तुम भी जान लो
विकास की अम्मा
यही है अपने कस्बे यात्रा
यहीं है विकास की कहानी ।
डा. गिरिजा किशोर
