मां राशन लेने जाती, दुकानदार उधार तक नहीं देता; याद कर कांप जाता हूं

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‘1985 की बात है। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में नौकरी कर रहा था। एक रोज इंदौर से फोन आया कि भाई का एक्सीडेंट हो गया है। आप जल्दी घर वापस आ जाइए। यह सुनकर मेरी जान अटक गई।

मां भी मेरे साथ ही रह रही थीं। मैंने उन्हें कुछ नहीं बताया। किस मुंह से बताता, वो तो उसी वक्त मर जातीं।

भोपाल से इंदौर जाने के दौरान पूरे रास्ते मैं सिर झुकाए रोता रहा। अपने आंसू छुपाता रहा ताकि मां न देखे। वहां पहुंचने से पहले ही भाई की मौत हो चुकी थी। वह मेरे भाई कम, दोस्त ज्यादा थे। इस घटना ने मेरी पूरी जिंदगी पलट दी।

इससे पहले भी मेरे एक दूसरे भाई की पीलिया से मौत हो गई थी। मुझे आज भी आंगन में उसका पीला पड़ा शव याद है। शायद सही समय पर इलाज मिलता, तो बच जाता। ये दोनों घटनाएं मुझे यहां तक लेकर आई हैं।’

83 साल के राधेश्याम साबू ये बातें बता रहे हैं। वह इंदौर से भोपाल एक हॉस्पिटल में कुछ जरूरतमंद मरीजों को आइस क्यूब, डायपर और कुछ जरूरी दवाएं देने के लिए आए हुए हैं।

ये 83 साल के राधेश्याम साबू हैं। पिछले 20 सालों से जरूरतमंद मरीजों की मदद कर रहे हैं। अभी उन्होंने 10 लाख की एक मशीन एम्स भोपाल को दी है।
ये 83 साल के राधेश्याम साबू हैं। पिछले 20 सालों से जरूरतमंद मरीजों की मदद कर रहे हैं। अभी उन्होंने 10 लाख की एक मशीन एम्स भोपाल को दी है।

राधेश्याम पिछले 20 सालों से मरीजों की मदद कर रहे हैं। अब तक वह करीब डेढ़ करोड़ रुपए से अधिक के मेडिकल इक्विपमेंट्स हॉस्पिटल को दे चुके हैं। उनकी ‘परपीड़ा हर’ नाम से एक संस्था भी है।

83 साल का व्यक्ति। गर्दन कंधों की ओर दबी हुई। हाथ और गर्दन पर झुर्रियां… फिर भी राधेश्याम बिना छड़ी के चल रहे हैं। लिफ्ट से नहीं, हॉस्पिटल की सीढ़ी से मरीजों से मिलने जा रहे हैं।

इस उम्र में इतनी एनर्जी?

पूछने पर वह कहते हैं, ‘मुझे अपनी बढ़ती उम्र का एहसास कभी नहीं होता। जैसे आप यंग हैं, मैं भी वैसा ही फील करता हूं। मैं अपने बच्चों से कहता हूं कि पैदा तो गरीबी में हुआ, लेकिन मरूंगा करोड़ों रुपए दान करके। शायद कुछ लोग मेरे पीछे कहते भी होंगे कि इस बुढ़ापे में भी इतना एक्टिव है। पैर कब्र में हैं और यह दूसरों के लिए काम कर रहा है।’

राधेश्याम आज भी हर रोज 15 किलोमीटर साइकिल चलाते हैं। जब वो पढ़ रहे थे, तो हर दिन 30 किलोमीटर साइकिल चलाकर कॉलेज जाते थे।
राधेश्याम आज भी हर रोज 15 किलोमीटर साइकिल चलाते हैं। जब वो पढ़ रहे थे, तो हर दिन 30 किलोमीटर साइकिल चलाकर कॉलेज जाते थे।

हॉस्पिटल में अपना काम निपटाने के बाद मैं राधेश्याम के साथ ही बाहर निकल आता हूं। वह कहते हैं, ‘ऐसे दर्जनों लोग रोजाना मेरे पास आते हैं, जिनके पास इलाज के पैसे नहीं होते हैं। आज से 20 साल पहले जब मैंने हॉस्पिटल विजिट करना शुरू किया था, तब लगा कि इन लोगों की पीड़ा तो असहनीय है। बिना इलाज के लोग मर रहे हैं। हालात इतने बुरे कि छोटी-छोटी चीजें भी खरीद पाने की स्थिति में नहीं हैं।

आपको एक किस्सा बताता हूं, ‘कुछ साल पहले की बात है। एक व्यक्ति मेरे पास आया। उसकी पत्नी हॉस्पिटल में एडमिट थी। उसे डेढ़ लाख रुपए की जरूरत थी। मैंने कहा- तुम 20 हजार इकट्ठा कर लो, बाकी पैसों का इंतजाम मैं करता हूं।

एक हफ्ते बाद वह घूम-फिर कर मेरे पास वापस आया। मिलते ही फूट-फूटकर रोने लगा। कहने लगा- बाबूजी, बस 2 हजार रुपए जमा हो पाया। इससे अगर कुछ हो जाए तो देख लीजिए। नहीं तो पत्नी को मर जाने दीजिए।

उसकी बातों को सुनकर मैं हैरान रह गया कि कोई पति पैसों की तंगी के चलते अपनी पत्नी के मर जाने तक की बात कह रहा है। मैंने उसकी पत्नी के इलाज के सारे खर्चे दिए।’

यह राधेश्याम की मां के साथ की तस्वीर है। उनका कहना है कि वो भले ही गरीबी में पैदा हुए, लेकिन करोड़ों रुपए दान करके ही इस दुनिया से जाएंगे।
यह राधेश्याम की मां के साथ की तस्वीर है। उनका कहना है कि वो भले ही गरीबी में पैदा हुए, लेकिन करोड़ों रुपए दान करके ही इस दुनिया से जाएंगे।

राधेश्याम मूल तौर से राजस्थान से हैं। इनके दादा-परदादा ही इंदौर में आकर बस गए थे। राधेश्याम कहते हैं, ‘पापा मुनीम का काम करते थे। वह अलग-अलग दुकानों में नौकरी करते थे। नशे के आदी थे, तो उनकी नौकरी लंबे समय तक टिक नहीं पाती थी।

हमारा पूरा बचपन गरीबी में बीता। गरीबी इतनी थी कि मां लकड़ी खरीदने, राशन या गेहूं लाने के लिए जाती, तो दुकानदार कहता- अम्मा पिछले महीने के पैसे अभी तक नहीं मिले हैं। पहले पुराना हिसाब चुकाओ।

मां कहती- अभी तो दे दो, अगले महीने सारे उधार चुकता कर दूंगी।

मैं मां की आंखों को एकटक देखता रहता। उस वक्त तो नहीं लगता था कि गरीबी में जी रहा हूं। इतनी दिक्कतें हैं, लेकिन अब सोचते ही कांप जाता हूं।

जब मेरे सामने कोई फटेहाल व्यक्ति खड़ा होकर मुझसे मदद मांगता है, तो मैं उसकी जगह खुद को देखता हूं। मुझे उन दिनों की बातें याद आने लगती हैं।

घर में हम 6 भाई-बहन थे। मां कुछ भी लातीं, तो हम भाई-बहनों के बीच बांट देतीं। कई बार ऐसा होता कि वह खुद कुछ भी नहीं खाती थीं।’

राधेश्याम के दोनों भाई की तस्वीर है, जिनकी पीलिया और एक्सीडेंट में मौत हो गई थी। आज भी उस घटना को याद कर वह रोने लगते हैं।
राधेश्याम के दोनों भाई की तस्वीर है, जिनकी पीलिया और एक्सीडेंट में मौत हो गई थी। आज भी उस घटना को याद कर वह रोने लगते हैं।

राधेश्याम ने बचपन में कई छोटे-मोटे काम किए हैं। वह कहते हैं, ‘मैं पढ़ने में भी एवरेज था और थोड़ा बदमाश भी। दरअसल जिस मोहल्ले में हम रहते थे, वहां झाड़ू बनाने वाले से लेकर, दिहाड़ी मजदूर करने वाले लोग ही रहते थे।

अब जिस तरह का माहौल मिलेगा, बच्चे तो वैसे ही बनेंगे। स्कूल जाता तो पापा टीचर से कहते- मास्टर साहब इसकी हड्डी मेरी और चमड़ी आपकी। उधेड़ दीजिए।

10वीं के बाद कुछ लोगों ने कहा कि ITI कर लो, कोई न कोई नौकरी मिल जाएगी। उस वक्त सरकारी इंस्टीट्यूट में फ्री में यह कोर्स होता था। मैंने वह कर लिया। इसी के बाद BHEL यानी भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड में नौकरी लग गई।

नहीं तो, उससे पहले तो मैंने पेपर बेचने से लेकर पायल की नथ बनाने तक का काम किया था। महीने के 15 रुपए मिलते थे। जब नौकरी हुई, तो तनख्वाह 70 रुपए हो गई।’

1965 में राधेश्याम की शादी हुई थी। नौकरी जॉइन करने के बाद वह थिएटर से लेकर स्पोर्ट्स में पार्टिसिपेट करने लगे थे।
1965 में राधेश्याम की शादी हुई थी। नौकरी जॉइन करने के बाद वह थिएटर से लेकर स्पोर्ट्स में पार्टिसिपेट करने लगे थे।

कब की कहानी सुना रहे हैं?

‘यह 1985 से पहले की ही बात है। 1965 में मेरी शादी हुई थी। हम तब भोपाल में रह रहे थे। मां गांव में ही थीं। जब उन्हें जरूरत पड़ती, तो हम कुछ पैसे भेज देते थे। फिर मां भी साथ में रहने लगीं।

मां हमेशा कहती थीं- गरीब की सेवा करो। कभी वह रैन बसेरे में लेकर जातीं, तो कभी बुजुर्गों के वृद्धाश्रम में। सच कहूं तो मुझे उस वक्त ये सारी चीजें फालतू लगती थीं। मां को बुरा न लगे इसलिए चला जाता। अब सोचता हूं तो लगता है कि कितना स्वार्थी था मैं।

सिर्फ खुद के बारे में सोचता था। जब भाई की डेथ हुई, उसके बाद लगा कि अपने लिए तो सब जीते हैं, दूसरों के लिए भी कुछ करू फिर जिंदगी सार्थक है…।’

राधेश्याम 1999 में रिटायर हुए थे। कहते हैं, ‘BHEL की नौकरी में रहने के दौरान भी मैं अपनी सैलरी से लोगों की सेवा करता था। उनकी जरूरत की चीजें उनमें बांटता था। 60 साल की उम्र में रिटायर होना था, लेकिन 58 साल होने पर मेरे बच्चे कहने लगे- पापा अब आप रिटायरमेंट ले लीजिए।

1999 में जब राधेश्याम रिटायर हुए, तो उनकी सैलरी 12 हजार रुपए थी। 2004 में 95 साल की उम्र में उनकी मां की डेथ हो गई।
1999 में जब राधेश्याम रिटायर हुए, तो उनकी सैलरी 12 हजार रुपए थी। 2004 में 95 साल की उम्र में उनकी मां की डेथ हो गई।

जब मैनेजर से कहा, तो वह कहने लगे- पागल हो, बुजुर्गों को वैसे भी बच्चे किस नजरिए से देखते हैं, सबको पता है। दो साल बाद रिटायर होना। जब बताया कि मैं नौकरी से रिटायर होना चाहता हूं, जिंदगी से नहीं, तब वह माने।

अब तो मुझे बहुत कुछ करना है। मैंने इंदौर जाकर मरीजों के लिए काम करना शुरू किया। जिन हॉस्पिटल्स में स्ट्रेचर, पीने के पानी की मशीन, बायपास मशीन… जैसी चीजें नहीं होती थीं, मैंने प्रोवाइड कराना शुरू किया। जब तक इस शरीर में जान है, यह काम करता रहूंगा।

यकीन मानिए आज तक कभी लगा नहीं कि मैं अब खाट पकड़ लूं।’

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