“बीमार स्वास्थ्य तंत्र और स्वस्थ भ्रष्टाचार”
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मध्य प्रदेश सरकार हर मंच से बड़े गर्व के साथ यह दावा करती है कि वह स्वास्थ्य सेवाओं में नए आयाम स्थापित कर रही है। योजनाओं के ढेर, प्रेस कॉन्फ़्रेंस की चमक और विज्ञापनों में मुस्कुराते चेहरे—मानो प्रदेश का हर नागरिक विश्वस्तरीय इलाज पा रहा हो। लेकिन हकीकत की ज़मीन पर कदम रखते ही यह चमकदार तस्वीर छिन्न-भिन्न हो जाती है।
राजधानी के ज़िला अस्पताल की हालत इसका ज्वलंत उदाहरण है। वहाँ मरीज तो हैं, पर चिकित्सक नदारद। दवाइयाँ तो छोड़िए, डॉक्टरों का चेहरा तक देखने को तरसते हैं लोग। इलाज की आस लेकर पहुँचे गरीब और मध्यमवर्गीय मरीज़ घंटों-घंटों लाइन में खड़े रहते हैं, पर अंत में उन्हें सिर्फ़ “अस्पताल की उदासी और सिस्टम की बेरुख़ी” मिलती है।
दूसरी तरफ़ मंत्रालय की ऊँची इमारतों में बैठे स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी किसी और ही ‘ऑपरेशन’ में व्यस्त हैं। यह ऑपरेशन भ्रष्टाचार का है—जहाँ दलालों की दलाली और रिश्वत की रासलीला ही मुख्य इलाज है। मरीज़ की जान पर चाहे जो बीते, पर अधिकारी और दलाल की जेबें हर हाल में स्वस्थ रहनी चाहिए—यही मंत्र है इस बीमार तंत्र का।
विडंबना देखिए, जो विभाग जनता की नब्ज़ पकड़कर उसे स्वस्थ करने का दायित्व निभाना चाहिए था, वही अब भ्रष्टाचार की नब्ज़ थामे खड़ा है। अस्पतालों में गंदगी, दवाओं की कमी, डॉक्टरों की अनुपस्थिति और मरीजों की असहायता—ये सब मिलकर एक ही सवाल पूछते हैं: क्या सरकार के दावे सिर्फ़ काग़ज़ों और विज्ञापनों की शोभा हैं?
सच तो यह है कि मध्य प्रदेश का स्वास्थ्य विभाग बीमार हो चुका है। और इस बीमारी का असली वायरस है—भ्रष्टाचार। जब तक इस वायरस पर सर्जिकल वार नहीं किया जाएगा, तब तक न अस्पताल सुधरेंगे, न मरीजों की हालत। सरकार को चाहिए कि वह विज्ञापनबाज़ी छोड़कर जमीनी हकीकत पर नज़र डाले, वरना यह व्यवस्था मरीजों का इलाज तो नहीं कर पाएगी, हाँ—स्वास्थ्य विभाग का “भ्रष्टाचार” हमेशा स्वस्थ और मज़बूत बना रहेगा।
