ब्लैकबोर्ड- पापा को मंदिर की सीढ़ियों से घसीटा, गाली दी
27 साल पहले की बात है। हम लोग ओडिशा के बलिचाई गांव में रहते थे। एक दिन पापा ये कहकर घर से निकले कि मंदिर में दर्शन करके आता हूं। जिद करने पर मुझे भी साथ ले गए। उस वक्त मैं 15 साल की थी। हम दोनों गांव के मंदिर पहुंचे और नीचे खड़े होकर ही दर्शन करने लगे।
हम लोग दलित हैं इसलिए मंदिर के अंदर तो क्या, सीढ़ियां भी नहीं चढ़ सकते थे। अचानक पापा को किसी ने धक्का दिया और वो मंदिर की सीढ़ियों पर गिर पड़े। ये देखते ही मंदिर के पुजारी और आस-पास के लोग पापा को भद्दी गालियां देने लगे।
फिर एक आदमी लाठी लेकर आया और सबने मिलकर पापा को पीटना शुरू कर दिया। मारते-मारते अधमरा कर दिया। वो सबके पैर पकड़कर गिड़गिड़ाते रहे, लेकिन ऊंची जाति वालों ने उनकी एक न सुनी। उस दिन तो पापा जैसे-तैसे जिंदा घर लौट आए, लेकिन तबसे हम लोगों ने मंदिर जाना छोड़ दिया।
आंसू पोंछते हुए छबि कहती हैं कि हम दलितों के लिए भगवान के भी दर्शन दुर्लभ हैं, ये हमारी जिंदगी का सबसे बड़ा स्याह पहलू है।
ब्लैकबोर्ड में इस बार कहानी ओडिशा के गांव बलिचाई से जहां करीब 26 साल पहले छुआछूत के चलते दलितों को गांव से निकाला गया और लोग आज तक लौट नहीं पाए
ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से लगभग 250 किलोमीटर दूर गंजाम जिले में स्थित बलिचाई गांव हरियाली से भरपूर और एकदम शांत है। खेत और बाग-बगीचे से घिरे इस गांव के ज्यादातर मकान मिट्टी के हैं। कच्ची-पक्की सड़कों से होकर मैं बलिचाई गांव में उस जगह पहुंची जहां आज से 26 साल पहले कथित सवर्णों ने हाड़ी जाति के दलितों को गांव छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया था। जहां दलितों के मकान थे अब वहां केवल घास नजर आती है।
ये दलित गंजाम जिले के दूसरे गांव जैसे बालीपादर, केंदूपादर, मामूदीहा, बावनपुर में रहते हैं। सभी बलिचाई गांव से 10 किलोमीटर की रेंज में ही बसे हैं। मैं सबसे पहले बावनपुर गांव पहुंची यहां मेरी मुलाकात छबि नायक से हुई।

छबि नायक भी इस घटना की शिकार हैं। साड़ी के पल्लू में चेहरा छिपाए छबि घर के बाहर ही जमीन पर बैठी हैं। माथे पर सफेद टीका और हाथों में छाले के निशान साफ नजर आ रहे हैं। मैंने जैसे ही बालिचाई गांव का नाम लिया छबि तपाक से टूटी-फूटी हिंदी में बोल पड़ीं, उस गांव में तो हम दलितों को कुएं से पानी निकालकर पीने की भी इजाजत नहीं थी।
एक बार मैं खेत से काम करके लौट रही थी। प्यास के मारे गला सूखने लगा तो कुएं के पास जाकर बैठ गई। इंतजार कर रही थी कि कोई पानी निकलने आएगा तो उससे मांग कर पी लूंगी। सवर्णों ने मुझे कुएं के पास बैठे देखा तो गाली देते हुए बोले- हिम्मत कैसे हुई इस कुएं के पास बैठने की। दोबारा यहां दिखी तो गांव से निकाल देंगे।
मैंने बहुत मिन्नतें कीं, लेकिन उन लोगों ने पानी नहीं पिलाया। मैं बेहोश हो गई। तभी कुछ दलित वहां पहुंच गए, उन्होंने मुझे पानी पिलाया और घर ले गए। ये कहानी सिर्फ मेरी नहीं बल्कि मेरे गांव के हर दलित की थी।
गहरी सांस लेकर छबि कहती हैं, ‘हमारे साथ जो हुआ उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। गांव की किसी दुकान पर सामान लेने जाते थे तो दूर से ही इशारा करके बताना पड़ता था कि वो सामान दे दो। जबकि हम सामान के पूरे पैसे भी देते थे, फिर भी किसी चीज को हाथ नहीं लगा सकते थे। दुकानदार हमें सामान फेंक कर देता था जैसे लोग कुत्ते को रोटी फेंकते हैं।
सन 2000 की बात है। सर्दियों का मौसम था, हमारी जाति का एक बच्चा दुकान पर सामान लेने गया। उसने गलती से किसी सामान को हाथ लगा दिया। ऊंची जाति वालों ने बच्चे के साथ-साथ उसके बाप को भी पीटा। फिर बारी-बारी से गांव के सभी दलितों को पीटने लगे। अचानक माहौल इतना खराब हो गया कि हम दलितों को रातों-रात गांव छोड़कर भागना पड़ा।’
छबि खीझते हुए कहती हैं कि ‘ऊंची जाति के लोग जानवरों को भी हमसे ज्यादा प्यार करते हैं। जब उन लोगों ने मार-पीट शुरू की तो जान बचाने के लिए सबकुछ छोड़कर भागना पड़ा। तन पर जो कपड़ा था, उसके अलावा सबकुछ छोड़कर भागना पड़ा।
उस रात का मंजर याद करके आज भी रूह कांपने लगती है। वो सर्द रात जब हम पर अंधेरे में हमला बोला गया, हर तरफ चीखने-चिल्लाने की आवाजें थीं। मैंने जल्दी से अपनी छोटी को गले से चिपकाया और नंगे पांव बिना पीछे देखे भागती रही। हमें इतना समय भी नहीं मिला कि घर में रखे पैसे और जवाहरात उठा पाते। गांव में हमारे पास 3 एकड़ जमीन थी, जिस पर अब ऊंची जाति वालों का कब्जा है।’
भावुक होकर छबि कहती हैं, ‘मेरे पति को गांव से निकलने का बहुत दुख था। वो अंदर ही अंदर टूटते चले गए। नई जगह आकर वो बिल्कुल भी खुश नहीं थे। वो दिन-रात मजदूरी करते थे, फिर भी घर नहीं चलता था। धीरे-धीरे वो बहुत बीमार रहने लगे। अपने घर लौटना चाहते थे, आए दिन सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते थे। आखिर एक रात सोते- सोते चल बसे। मुझे और मेरी तीन बेटियों को छोड़ गए।
बच्चों के साथ-साथ सास-ससुर की जिम्मेदारी भी मेरे कंधों पर आ गई। कई बार मन में आत्महत्या करने का ख्याल आया, लेकिन बच्चों के बारे मे सोचकर रुक गई। कई बार ऐसा लगता कि दलित होने की सजा मिल रही है।’
छबि आगे कहती हैं- ‘कुछ दिन धक्के खाने के बाद मुझे सात हजार महीने की पगार पर मुर्गी फॉर्म में नौकरी मिली। सोचिए कि सात हजार रुपए में 6 लोगों का पेट कैसे पलता होगा। इसके अलावा मेरे पास कोई उपाय भी नहीं है। दिनभर मुर्गियों के बीच में रहकर बदबू से मेरी तबीयत खराब होने लगी है।
मालिक मुझसे दो लोगों जितना काम करवाता है। अगर छुट्टी कर लूं तो पैसे भी काट लेता है। अब मुझसे काम नहीं होता, लेकिन बेटियों की शादी भी करनी है। इसलिए अब एक बेटी को काम पर साथ ले आती हूं। पति के जाने के बाद मैं कैसे घर चला रही हूं, ये सिर्फ मेरा दिल जानता है।’

छबि ही नहीं बल्कि उनके जैसे जाने कितने लोग अपना घर और जमीनें छोड़कर दूसरी जगह बसने को मजबूर हो गए। 45 साल की सावित्री को भी 26 साल पहले अपना गांव छोड़ना पड़ा। वो गांव क्यों छोड़ना पड़ा, इस पर वो तपाक से कहती हैं कि ऊंची जाति के लोग हम दलितों को हर दिन तंग करते थे। उस दिन भी यही हुआ, हमारी जाति के बच्चे ने गलती से दुकान का सामान छू लिया। जिसका खामियाजा पूरे गांव के दलितों को उठाना पड़ा।
सावित्री वो दिन याद करते हुए कहती हैं, इस छोटी सी बात पर गांव में अचानक माहौल इतना खराब हो गया कि हम लोग घर के भीतर भी सुरक्षित नहीं थे। एक रात ऊंची जाति के लोग हथियार लेकर आए। बारी-बारी से सभी को घर से निकालकर पीटने लगे। पुलिस ने भी कुछ नहीं किया।
उस रात गांव के सारे दलित अपनी जान बचाकर भागे। जिसे जहां जगह मिली वो चला गया, लेकिन कोई वापस गांव लौटकर नहीं आया। घर और जमीन सब छूट गई। हमारे घर से सामान लूट लिया, घर जला दिए गए।

सावित्री के पति मुथू घर के बाहर बैठकर झाड़ू बना रहे थे। उनकी उम्र करीब 50 साल होगी। मिट्टी से बना उनका घर मुश्किल से 6 फुट चौड़ा और 10 फुट लंबा है। घर को देखकर ऐसा लगा कि ज्यादा पुराना नहीं है।
मैंने मुथू से पूछा कि आपका घर तो पुराना नहीं लग रहा है। इस पर वो बोले- ओडिशा कोस्टल एरिया है और यहां हर साल साइक्लोन अपने साथ तबाही लेकर आता है। बाढ़ में हमारे घर डूब जाते हैं। अगर बाढ़ आई तो घर बह जाता है जैसे दो साल पहले मेरा घर बह गया था, काश उसमें हम भी खत्म हो गए होते।
ये कहते ही मुथु की आंखों से आंसू बहने लगते हैं।
कुछ देर रुककर वो कहते हैं, ये घर सरकारी जमीन पर है, जिसे कभी भी खाली करवाया जा सकता है। जमीन का ये टुकड़ा पहले किसी और के कब्जे में था। 10 हजार देकर मैंने घर बनाया है। बारिश में मिट्टी और लकड़ी से बने घर की छत टपकती है। जब बारिश आती है, हम लोग पूरी रात एक कोने में बैठकर ठिठुरते रहते हैं। पूरी उम्र निकल गई, धक्के खाते-खाते, इतना कहते ही मुथू अपने आंसू पोछते हैं।
कड़क आवाज में मुथु कहते हैं- देश के राष्ट्रपति का हमारी जाति से होने का क्या फायदा। हम लोग तो आज भी छुआछूत के शिकार हैं। गांव छोड़ने के बाद मैं और गरीब हो गया। दो साल पहले मेरी मां की मौत हो गई, उसके अंतिम संस्कार के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे, मुझे उधार लेना पड़ा। मां अपने आखिरी समय तक बलिचाई गांव में उस घर को याद करती रही जहां वो दुल्हन बनकर आई थी।

मुथु कहते हैं बेटियों की शादी भी कर्ज लेकर की है, अब वो कैसे लौटा पाऊंगा, इसी चिंता में नींद नहीं आती है। एक झाड़ू बेचने पर 20 रुपए मिलते हैं। कई दिन तो झाड़ू भी नहीं बिकते, फिर पेट पालने के लिए मजदूरी करता हूं।
अपने पैरों की तरफ इशारा करके वो कहते हैं- ठीक से खाना ना मिलने की वजह से शरीर कमजोर हो गया, पैरों में दर्द होता है और अब मजदूरी करना भी मुश्किल लगता है। अपनी जमीन और घर होते हुए भी, आज हमारे पास कुछ नहीं बचा। अब तो मरकर ही आजादी मिलेगी।
यहीं पास में 60 साल के जलंधर नायक भी रहते हैं। उनका शरीर अब सूखकर कंकाल हो चुका है। धीमी आवाज में वो कहते हैं कि उस रात हम लोगों पर तलवार से हमला किया गया। हम लोग डरकर भाग आए। गांव में हमारा अच्छा घर था और 2 एकड़ जमीन भी थी। मैंने सब कुछ खो दिया।
वो लोग घर से 2 लाख रुपए और सोना भी चुराकर ले गए। मेरा भाई इस घटना के कुछ साल बाद अपनी जमीन मांगने वापस गांव गया था। दबंगों ने उस पर तलवार से हमला कर दिया। उसे जान से मार दिया।
जलंधर हाथों से इशारा करते हुए कहते हैं कि खाना भी नहीं मिलता है। लड़के बाहर रहते हैं और लड़कियों की शादी हो गई है। मुझे टीबी है। अस्पताल में दवाई तो मिल जाती है पर खाना नहीं मिलता। मुश्किल से घर चल रहा है। जब पत्नी मजदूरी करने जाती है तब खाना मिलता है, वरना भूखे ही रहते हैं।
अब तो ये भी याद नहीं कि आखिरी बार पेट भर खाना कब खाया था। जब भूख से पेट दुखता है तो पानी पी लेता हूं।

अभी तक हमारी मुलाकात जिनसे भी हुई वो लोग या तो टूटी-फूटी हिंदी या फिर उड़िया में बात कर रहे थे। 47 साल के गणपति नायक हिंदी में कहते हैं कि गांव के सवर्णों ने हमें मंदिर नहीं जाने दिया। किसी होटल में रुकने की इजाजत नहीं दी, गांव में शादी की शोभायात्रा निकालने पर भी मनाही थी। यहां तक की तालाब में नहाने का अधिकार नहीं था। उन्हें हमें गांव से निकालने का बहाना चाहिए था।
गणपति नायक कहते हैं कि ‘एक बच्चे की गलती पर उसके पिताजी को मारकर गांव के रास्ते पर फेंक दिया। फिर कुछ दिनों बाद गांव के सवर्ण लोगों ने मिलकर हमारे घर का सामान लूट लिया और गांव से भी भगा दिया। बलिचाई गांव में दलितों के करीब 50 घर थे।
घटना के चार दिन के अंदर ऐसा माहौल बना दिया गया कि हमें सब कुछ छोड़कर भागना पड़ा। हमारे भागने पर हमारे घरों को जला दिया गया ताकि हम वापस ना जा पाएं।
उस वक्त मेरा बच्चा दो साल का था। उसे लेकर यहां-वहां भटकते थे। कभी पेड़ के नीचे सोते तो कभी किसी के बरामदे में रात बिताते। कई बार तो सड़क किनारे भी सोए हैं। जैसे-तैसे कुछ काम करके परिवार का पेट पाला। गांव से निकाले गए दलितों में कई बुजुर्ग भी थे, उन्हें तो हमसे भी ज्यादा दिक्कत हुई। कई लोगों की मौत हो गई।’

चेहरे पर उदासी लिए गणपति नायक कहते हैं कि हमें तो आज भी धमकी मिलती है कि अगर दोबारा गांव में घुसने की कोशिश की तो फिर मारकर भगा दिया जाएगा। पुलिस भी कोई मदद नहीं करेगी। हम लोगों ने ओडिशा सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक को लेटर भेजा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। अब तो केवल राष्ट्रपति से उम्मीदें हैं। अगर वो मिलने का समय देती हैं तो शायद हमारे दुखों का अंत हो जाएगा।
