*0प्रतिदिन विचार* राकेश दुबे

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*भारत का इलेक्ट्रिक वाहन बाजार*

देश में इलेक्ट्रिक वाहन बाजार तेजी से बढ़ रहा है। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, पिछले साल ईवी की बिक्री दस लाख का आंकड़ा पार कर गई और 2030 तक यह संख्या 170 लाख यूनिट तक पहुंचने की उम्मीद है। बाजार में तेजी के रुझान के साथ, देश के अधिकांश कार निर्माताओं ने अपने कुछ सबसे ज्यादा बिकने वाले वर्तमान मॉडल को इलेक्ट्रिक वर्जन में बनाना भी शुरू कर दिया है।

काफी समय से इस बात पर विवाद चल रहा था कि अमरीकी कंपनी टेस्ला भारत में इलेक्ट्रिक कारों का निर्माण करेगी या नहीं। टेस्ला उनकी कारों पर भारत में आयात शुल्क में कमी के लिए पैरवी कर रही थी। उनका तर्क था कि वे अपनी इलेक्ट्रिक कारों को लाकर भारतीय बाजारों को परखना चाहते हैं और इसलिए वे भारत में अपनी स्थिति को परखने के लिए आयात शुल्क में छूट की मांग कर रहे हैं। हालांकि, कंपनी के इस ढुलमुल रवैये से भारत में विनिर्माण सुविधाएं शुरू करने के उनके वास्तविक इरादे पर संदेह पैदा हो रहा था। लेकिन अब यह लगभग स्पष्ट हो गया है कि कंपनी भारत में अपनी टेस्ला कार का विनिर्माण शुरू करने में रुचि नहीं रखती है। हाल ही में भारत में ईवी नीति की घोषणा करते हुए सरकार ने भी यह संकेत दिया है कि टेस्ला कंपनी देश में अपनी कारों का विनिर्माण करने में रुचि नहीं रखती है। सरकार ने इस बीच भारत में इलेक्ट्रिक कारों के विनिर्माण को प्रोत्साहित करने वाली नीति पेश की है। हालांकि नई ईवी नीति 15 प्रतिशत की रियायती टैरिफ दर पर इलेक्ट्रिक कारों के आयात की भी अनुमति देती है, लेकिन आयातित कारों की कुल संख्या पर 8000 कारों की सीमा है, जिसके बाद आयात शुल्क 115 प्रतिशत तक जा सकता है। नीति में 35000 डॉलर से अधिक कीमत वाली किसी भी आयातित इलेक्ट्रिक कार पर शुल्क में कटौती की पेशकश की गई है, बशर्ते निर्माता तीन साल के भीतर स्थानीय संयंत्र स्थापित करने के लिए कम से कम 42500 करोड़ रुपए या लगभग 500 मिलियन डॉलर का निवेश करे। 15 प्रतिशत की यह रियायती ड्यूटी 35000 डॉलर से कम कीमत वाली कारों पर लागू नहीं होगी। कुल सीमा शुल्क राहत 6484 करोड़ रुपए तक सीमित होने का अनुमान है। नई ईवी नीति के तहत उद्यमियों को आवेदन जमा करने के लिए जल्द ही एक पोर्टल चालू किया जाएगा। यह पोर्टल कम से कम 120 दिनों तक खुला रहेगा। केवल वे कंपनियां ही आवेदन करने के लिए पात्र होंगी, जिन्होंने वाहन विनिर्माण से कम से कम 10000 करोड़ की बिक्री की है और अचल संपत्ति निवेश में न्यूनतम 3000 करोड़ रखती हैं। इस योजना के तहत भारतीय और विदेशी दोनों कंपनियां आवेदन करने के लिए पात्र होंगी। सरकार के अनुसार, नई नीति ‘मेक इन इंडिया’ पहल का समर्थन करेगी और ऑटोमोबाइल विनिर्माण में भारत की वैश्विक स्थिति को ऊपर उठाने में मदद करेगी।

विदेशी निवेशक आकर्षित नहीं हैं इस नीति से : इस नीति की खास बात यह है कि विदेशी वाहन निर्माता जैसे अमरीकी कंपनी टेस्ला, चीनी कंपनी बीवाईडी आदि सरकार की ईवी नीति के प्रति बहुत ठंडा रुख अपनाए हुए हैं। जहां तक टेस्ला का सवाल है, हालांकि उसने भारत में अपनी तैयार कार के लिए डीलरों का चयन शुरू किया है, लेकिन वो भारत में कार बनाने के लिए इच्छुक नहीं है। दूसरी तरफ चीन की कंपनी बीवाईडी इसलिए निवेश के प्रति ठंडा रुख रखे हुए है, क्योंकि भारत सरकार सुरक्षा कारणों से चीन जैसे देश की कंपनियों, खास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक से जुड़ी कंपनियों को भारत में प्रवेश देने के लिए इच्छुक नहीं है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ बड़ी वैश्विक कंपनियां भारत में इलेक्ट्रिक कार उत्पादन हेतु निवेश कर सकती हैं, लेकिन इन कंपनियों की इलेक्ट्रिक कारें अपने देशों में भी कोई विशेष बाजार नहीं बना पार्इं। ऐसे में वो भारत जैसे देश में जहां टाटा और महिंद्रा जैसी बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनियों, जो इलेक्ट्रिक वाहनों के क्षेत्र में भी काफी आगे बढ़ चुकी हैं, के सामने कैसे टिक पाएंगी, यह एक बड़ा सवाल उनके सामने है।

सेहत के साथ रोजगार सृजन और आर्थिक विकास : विभिन्न राष्ट्रीय अध्ययनों और विश्लेषणों से पता चलता है कि भारत में, पर्यावरण की रक्षा हेतु किए जा रहे प्रयास पर्यावरण ही नहीं, वित्तीय लाभ भी उत्पन्न कर सकते हैं, और रोजगार सृजन का बड़ा स्रोत हो सकते हैं। इस संदर्भ में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी द्वारा एक बड़ा योगदान संभव है। भारत का ईवी क्षेत्र 2030 तक 250 बिलियन डॉलर का उद्योग बन सकता है, जिससे वाहन निर्माण, बैटरी उत्पादन, आपूर्ति श्रृंखला और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में पांच करोड़ नौकरियां पैदा होंगी। ऐसे में देश में इलेक्ट्रिक वाहनों का घरेलू उत्पादन बढऩा हर दृष्टि से महत्वपूर्ण है। विदेशी कंपनियां भारत में इलेक्ट्रिक वाहन निर्माण में निवेश करने को लेकर बहुत उत्साहित नहीं हैं, इसका एक और कारण यह है कि टाटा और महिंद्रा जैसी घरेलू कंपनियां अपने विदेशी प्रतिस्पर्धियों की तुलना में बहुत कम लागत पर इलेक्ट्रिक वाहन बना रही हैं। उदाहरण के लिए, हम देखते हैं कि भारतीय निर्माता 9 लाख रुपए प्रति यूनिट से 20 लाख रुपए प्रति यूनिट के बीच इलेक्ट्रिक कार बेचने में सक्षम हैं, जबकि टेस्ला जैसी कंपनियां अपनी कारों को 35 लाख रुपए से 80 लाख रुपए के बीच की कीमत पर बेच रही हैं। देश में लग्जरी कारों का बाजार बहुत छोटा है। इसलिए, लग्जरी कार वर्ग में बड़े पैमाने पर उत्पादन की ज्यादा गुंजाइश नहीं है। हालांकि, बड़े शहरों में प्रदूषण को कम करने में मदद के लिए इलेक्ट्रिक कारों का उत्पादन बढ़ाने की तत्काल आवश्यकता है और उस संदर्भ में, ‘मेक इन इंडिया’ इलेक्ट्रिक वाहन घरेलू उत्पादन, जीडीपी और रोजगार के विस्तार में प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं।

 

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