डीजीपी पद को लेकर हाईकोर्ट में दायर याचिका, मुख्य सचिव के बेमानी फैसलों से विवादों में छत्तीसगढ़ सरकार

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डीजीपी पद को लेकर हाईकोर्ट में दायर याचिका, मुख्य सचिव के बेमानी फैसलों से विवादों में छत्तीसगढ़ सरकार

पुलिस मुख्यालय से लेकर कई विभागों में अनावश्यक गतिरोध

सवालों के घेरे में नौकरशाही की निष्ठा

क्या छत्तीसगढ़ में पूर्व मुख्यमंत्री की पसंद का बनेगा डीजीपी?

हिमांशु गुप्ता के लिए प्रदेश के सबसे विवादित रिटायर्ड अधिकारी के मार्फत बढ़ाई गई फाइल

डीजीपी पद की रेस से बाहर करने के लिए केंद्र में किसने करवाई जीपी सिंह की फर्जी शिकायत?

क्या जेल में हुए आईपीएस थप्पड़ कांड में सबूत मिटाने के कारण डीजी जेल का नाम डीजीपी पद के लिए बढ़ाया गया?

विजया पाठक, एडिटर, जगत विजन
छत्तीसगढ़ में डीजीपी पद के लिए रस्साकशी चल रही है। आश्चर्य की बात है कि पद के लिए जिसका नाम आगे बढ़ाया जा रहा है। वह न तो सबसे वरिष्ठ है। सबसे ज्यादा दागदार है। जिसके लिए लाईजनिंग छत्तीसगढ़ इतिहास के सबसे दागदार आईपीएस अफसर कर रहा है। सूत्रों के मुताबिक इस अधिकारी को डीजीपी पद पर आसीन करने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री और उनके दो खासमखास पूर्व आईपीएस, वर्तमान गृहमंत्री शामिल हैं। प्रदेश सरकार जहाँ संवैधानिक रूप से अपने कदम आगे बढ़ाते हुए विकास की नई राह तय कर रही है, वहीं टॉप क्लास नौकरशाही के असंवैधानिक फैसलों से पीड़ित अधिकारी-कर्मचारी भी अदालतों का रुख कर रहे हैं। यह भारतीय प्रशासनिक सेवा के उन वरिष्ठ अधिकारियों का दुःख-दर्द है, जो कई सालों से राज्य सरकार की सेवा में जुटे हैं। प्रभावशील अधिकारी मनमानी में उतारू हैं। मुख्य सचिव भी क़ानूनी नहीं बल्कि राजनैतिक फैसलों पर अपनी मुहर लगा रहे हैं।

पवन देव, जीपी सिंह डीजीपी के लिए सबसे उपयुक्त
राज्य के प्रशासनिक मुखिया और जूनियर अधिकारियों की पसंद-नापसंद के चलते डीजीपी का पद विवादों से घिरा बताया जा रहा है। यह भी बताया जा रहा है कि मुख्य सचिव की कार्यप्रणाली के चलते पुलिस मुख्यालय में पुनः गतिरोध कायम हो गया है। दरअसल, आईपीएस पवन देव और जीपी सिंह का नाम प्रस्तावित डीजीपी के चयन हेतु केंद्र को भेजी गई पैनल लिस्ट से हटाये जाने के मामले ने गंभीर रुख ले लिया है। सूत्र तस्दीक करते हैं कि मामले की शिकायत पीएमओ और सीबीआई से किये जाने के बाद छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में भी याचिका दायर की गई है। इस याचिका के तथ्यों से सत्ता के गलियारों में हड़कंप है। प्रशासनिक और पुलिस गलियारों में पूर्व मुख्यमंत्री बघेल के इशारों पर लिए जा रहे फैसलों से छत्तीसगढ़ का राजनैतिक गलियारा सरगर्म है। पवन देव ने याचिका दायर कर अदालत से जल्द सुनवाई की गुहार लगाई है। यह भी बताया जाता है कि आईपीएस के वरिष्ठ अधिकारियों की वरिष्ठता तय करने को लेकर मुख्य सचिव का कार्यालय ने आपराधिक कार्यशैली का परिचय देते हुए बड़ी धांधली की है, पहली डीपीसी में गुरजिंदर पाल सिंह की पदोन्नति से जुड़ा बंद लिफाफा प्रस्तुत करने में कोताही बरती गई। इसके बाद यूपीएससी की अंतिम पैन-लिस्ट से उनका नाम अचानक बाहर कर दिया गया। जीपी सिंह के अलावा पवन देव का नाम भी डीजीपी पद की पैनल लिस्ट से आखिरी समय हटाए जाने का मामला विवादों से घिर गया है। डीजीपी के लिए नियुक्ति ने इस बात पर तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या योग्यता की बलि नौकरशाही की जड़ में समा गई है। प्रशासनिक और पुलिस हलकों के जानकार सूत्रों के अनुसार, यूपीएससी की विभागीय पदोन्नति समिति ने डीजीपी पैनल को अंतिम रूप देने के लिए सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह आदेश के तहत 13 मई को बैठक की गई थी। इस सूची में विचार के लिए 04 नाम- अरुण देव गौतम, पवन देव, हिमांशु गुप्ता और जीपी सिंह शामिल किये गए थे। मुख्य सचिव कार्यालय ने रहस्यमय तरीके से कैंची चलाते हुए केंद्र सरकार को भेजी गई पैनल में सिर्फ दो अधिकारियों के नाम पर अंतिम मुहर लगाई, जबकि शेष दो अधिकारियों का पत्ता बगैर किसी ठोस कारणों के साफ कर दिया। जानकारी के मुताबिक मौजूदा प्रभारी डीजीपी अरुणदेव गौतम और डीजी हिमांशु गुप्ता का ही नाम अंतिम सूची में जगह बना पाया। जबकि प्रक्रियागत पात्रता के बावजूद जीपी सिंह और पवन देव का नाम पैनल से हटा दिया गया। प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक पूर्व मुख्यमंत्री बघेल और उनकी लॉबी जीपी सिंह की डीजीपी पद पर नियुक्ति को रोकने के लिए जोर-शोर से जुटी हुई है। राजनैतिक गलियारों में चर्चा है कि डीजीपी की कुर्सी पर जीपी सिंह के बैठते ही बघेल समेत उसके गिरोह के कई आपराधिक तत्व हवालात में नजर आ सकते हैं। फ़िलहाल बीजेपी शासनकाल में भी उनका फीलगुड यथावत जारी है।

जीपी सिंह के मामले में कांग्रेस लगा रही अड़ंगा
जीपी सिंह का ट्रेक रिकॉर्ड बेहतर आँका जाता है। राजनैतिक संरक्षण प्राप्त तत्वों को उनके असल ठिकाने भेजे जाने के मामले में जीपी सिंह की गिनती कारगर और योग्य आईपीएस अधिकारियों के रूप में होती है। जीपी सिंह के शासन-प्रशासन की मुख्यधारा शामिल होने के अंदेशे मात्र से भूपेश गिरोह की नींद हराम बताई जाती है। सूत्र तस्दीक करते हैं कि भूपेश गिरोह के बचाव के मद्देनजर केंद्र सरकार को गलत जानकारी देकर दोनों वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों को पैनल लिस्ट से दरकिनार किया गया है। यही नहीं प्रदेश के मुखिया की पसंद-नापसंद का हवाला देते हुए अनधिकृत कदम उठाये गए हैं। अब राज्य सरकार के इस फैसले को अदालत में चुनौती दिए जाने का मामला सुर्ख़ियों में बताया जा रहा है। जीपी सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बीच कांग्रेस राज से ही तलवारें खींची बताई जाती हैं। भूपेश राज में जीपी सिंह के कई क़ानूनी फैसलों से तत्कालीन मुख्यमंत्री के अरमानों पर पानी फिर गया था। बताया जाता है कि नान घोटाले में निर्दोषों को फंसाने और उनके खिलाफ फर्जी मामले दर्ज करने को लेकर जीपी सिंह ने तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को स्पष्ट ना कर दी थी। जबकि तत्कालीन सुपर सीएम अनिल टुटेजा को जमकर फटकार लगाई थी। इस मामले में टुटेजा का माफ़ीनामा सोशल मीडिया में खूब वायरल हुआ था।

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