“रुकसाना की कहानी – कम उम्र की शादी को रोका गया”

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मदनी नगर बस्ती की गलियों में रहने वाली 16 साल की रुकसाना (बदला हुआ नाम) एक आम सी दिखने वाली, लेकिन अपने सपनों में रंग भरने वाली लड़की है। उसे सजना-संवरना बहुत पसंद है — बालों में फूल लगाना, लाली-लिपस्टिक लगाना, काजल की तीखी लकीर खींचना — यही उसकी दुनिया थी। घर के अंदर रहकर वो अपना समय इन छोटी-छोटी चीज़ों में बिताती थी, लेकिन उसे नहीं पता था कि बाहर उसके लिए कुछ बड़ा और खतरनाक तय हो रहा है।

रुकसाना के मां-बाप काम की तलाश में अक्सर गांव से बाहर चले जाते हैं। उनकी चिंता ये थी कि रुकसाना अब बड़ी हो रही है और उनके हिसाब से “लड़की जितनी जल्दी अपने घर की हो जाए, उतना अच्छा।” यही सोचकर उन्होंने उसकी सगाई तय कर दी और जब यह सूचना मुस्कान संस्था एवं आंगनवाड़ी कार्यकर्ताको मिली, उस समय शादी की तारीख बस तय होने ही वाली थी।

मुस्कान संस्था की टीम ने तुरंत युवा समूह के साथ मिलकर रुकसाना के घर का रुख किया। वहां पहुंचकर बातचीत शुरू की गई और परिजनों ने साफ कहा, “हां, सगाई कर दी है, और अब जल्दी से शादी भी कर देंगे। हम कब तक बैठाए रखें इसे घर में?”

टीम ने बड़े ही संयम और समझदारी से बातचीत की। पहले रूकसाना के दस्तावेज़ देखे गए आधार कार्ड और जन्म प्रमाण पत्र। इससे यह स्पष्ट हुआ कि उसकी उम्र मात्र 16 साल है। टीम ने परिजन को बताया कि भारत में बालिकाओं की विवाह की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष है और इससे पहले विवाह करना गैरकानूनी है।

इसके बाद टीम ने बेहद संवेदनशीलता से बातचीत की। रुकसाना की भावनाओं और उम्र को ध्यान में रखते हुए परिजनों को समझाया गया कि लड़की के सजने-संवरने की रुचियां उसकी उम्र का हिस्सा हैं, लेकिन यह उसकी ज़िंदगी नहीं है। उसे अभी शिक्षा, आत्मनिर्भरता और अपने भविष्य को लेकर सोचने का अवसर मिलना चाहिए।

परिजनों को यह भी जानकारी दी गई कि यदि वे बाल विवाह के निर्णय पर अड़े रहते हैं, तो मुस्कान संस्था कानून के तहत उचित कदम उठाने के लिए पुलिस व अन्य विभागों से संपर्क करेगी।

सिर्फ एक दिन की बातचीत से बदलाव नहीं हुआ। मुस्कान संस्था एवं आंगनवाड़ी कार्यकर्तालगातार संपर्क में बने रहे, कई बार जाकर बात की, घरवालों को समय दिया और बच्ची के भविष्य के बारे में सोचने का अवसर भी। इस प्रयास के फलस्वरूप रुकसाना की शादी को रोक दिया गया।

आज रुकसाना बस्ती में खुद को संवारती है, लेकिन अब उसके सपनों में सिर्फ श्रृंगार नहीं, स्कूल, आत्मनिर्भरता और एक सुरक्षित भविष्य भी शामिल है।

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