छत्रपति शिवाजी और महाराज संभाजी राव के व्यक्तित्व, कृतित्व और त्याग बलिदान पर बनी छावा फिल्म धूम मचा रही है

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छत्रपति शिवाजी और महाराज संभाजी राव के व्यक्तित्व, कृतित्व और त्याग बलिदान पर बनी छावा फिल्म धूम मचा रही है. लोग इसकी सराहना कर रहे हैं. फिल्म औरंगजेब से लड़ते हुए संभाजी राव के बलिदान को जहां उजागर करती है, वहीं औरंगजेब की क्रूरता पर प्रहार करती है..!!
बस यहीं से सियासी औरंगज़ेब मैदान में आ गए. वोट बैंक सियासत चालू हो गई. औरंगजेब को महान बताने की प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई. समाजवादी पार्टी के महाराष्ट्र में विधायक अबू आज़मी ने यह कह दिया, कि औरंगज़ेब अच्छा मुगल शासक था. इसके बाद विवाद इतना बढ़ा कि आज़मी को महाराष्ट्र विधानसभा से पूरे सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया है.
औरंगज़ेब इस्लाम का प्रवर्तक नहीं था. यह एक मुगल शासक था. इसका इतिहास पिता शाहजहां को क़ैद करने और भाई का सिर कलम करने का रहा है. इतने अंधकार के इतिहास वाले शासक से सियासी प्यार, वर्तमान के साथ एक तरह का फ़रेब कहा जाएगा. कोई धर्मगुरु हो, धर्म का प्रवर्तक हो और उसके विरुद्ध कोई बात कही जा रही हो, तब तो प्रतिक्रिया समझ आती है, लेकिन इतिहास के शासक के लिए वर्तमान सियासी लोगों द्वारा विवाद की स्थिति बुरे वर्तमान की ओर इशारा कर रही है.
इतिहास का कोई ऐसा पक्ष हो, जो उजाले से भरा है, वीरता से भरा है, त्याग और बलिदान से भरा है, तो उसको तो उजागर होना चाहिए, लेकिन अगर इतिहास का कोई अंधकार है, तो उसको सिर पर ढ़ोने का औचित्य समझ नहीं आता. औरंगजेब पर हमेशा विवाद खड़े हो जाते हैं. औरंगाबाद का नाम जो औरंगज़ेब के नाम पर रखा गया था, उसको बदलकर संभाजी नगर कर दिया गया है. उस जिले में औरंगज़ेब की कब्र है, इस पर भी विवाद उठता रहता है.
सियासी औरंगज़ेब कब्र पर जाकर वोट बैंक की राजनीति करते हैं. वैसे तो क्रिया और प्रतिक्रिया साथ चलती है. अगर औरंगजेब समर्थक वोट बैंक की राजनीति कर रहे हैं, तो संभाजी के समर्थक भी इस लक्ष्य पर ही आगे बढ़ रहे हैं. यह बात अलग है, कि भारतीय संस्कृति और परंपरा की रक्षा के लिए बलिदान के भारतीय महापुरुषों के जीवन प्रकाश को वर्तमान में उजागर करना, स्थापित करना, समाज का बड़ा दायित्व है.
औरंगज़ेब भारत में मुगल शासक था. वह बाहर से आया हुआ था. उसने यहां शासन किया. उसके शासन को भारत ने कभी भी स्वीकार नहीं किया. जो लोग वर्तमान में भारत में रहते हैं, उनका यह राष्ट्रीय धर्म बनता है, कि वह कम से कम देश पर आक्रमण करने के लिए आए किसी बाहरी व्यक्ति पर श्रद्धा कर राष्ट्र के प्रति अपनी श्रद्धा को अपमानित नहीं करें.
मुगल शासकों का इतिहास और वर्तमान में इस्लाम के अनुयायियों को जोड़कर देखना सही नहीं है, लेकिन दुर्भाग्य से सियासत यही काम कर रही है.
जब भी चुनाव की बेला दिखाई पड़ती है, तो कहीं ना कहीं से हिंदू मुस्लिम के विवाद बढ़ा दिए जाते हैं. यह सब जानते हैं, यह विवाद चुनाव बाद अपने आप समाप्त भी हो जाते हैं, लेकिन इतिहास और विरासत के इस संघर्ष को राष्ट्रहित में तो नहीं कहा जा सकता.
साधारण सी दो कौड़ी की घटनाओं का नाम इतिहास है, जो आज तूफान की तरह उठती हैं और कल जिनका कोई निशान भी नहीं रह जाता. इतिहास तो धूल का बवंडर है. मुगल साम्राज्य का इतिहास भारत का इतिहास नहीं है, जो भारत का नहीं है, उसको आज भारत के लोग अपने सिर पर कैसे ढ़ो सकते हैं.
भारत में अलग-अलग धर्म हैं. धार्मिक मान्यताओं के लिए सबको स्वतंत्रता है. धार्मिक मान्यताओं को मुगल साम्राज्य के इतिहास से जोड़ना ना केवल अनैतिक है, बल्कि समाज और अपने साथ धोखा है.
अच्छी परंपरा, अच्छी संस्कृति, अच्छे शासन को उजागर करने की बात तो हो सकती है. लेकिन आक्रांता को अपने पिता के साथ ही दुर्व्यवहार करने वाले को आदर्श कैसे स्वीकार किया जा सकता है. सियासी कारणों से इतिहास के ऐसे अंधकार को आदर्श बनाना, किसी को भी शोभा नहीं देता.
ऐसा लगता है, सारा झगड़ा भारत की मान्यताओं का है. धर्म की मान्यताओं पर राष्ट्र का अस्तित्व सियासी दलों द्वारा लगा दिया गया है. कोई धर्म अगर अपनी मान्यता के लिए भारत को धूल-धूसरित करने वाले किसी शासक को अपना आदर्श मानता है, तो उसको भारत और भारतीयता कैसे स्वीकार करेगी. हर समाज में ऐसी बुद्धिमत्ता विकसित करनी होगी जो, इतिहास के नाम पर टकराने से बचे. जो सियासी औरंगजेब बनकर अपनी सियासत साधना चाहते हैं, उन्हें भारतीयता को समझना चाहिए.
भारत दुनिया के लिए आध्यात्मिक सूरज है. भारत दुनिया को सत्य को पाने की प्यास देने वाला देश है. जमीन पर कोई कहीं भी पैदा हो, अगर वह भीतर की खोज कर रहा है, तो फिर वह भारत का निवासी बन जाता है. यह कितना दुर्भाग्य जनक है, कि भारत जो दुनिया को आध्यात्मिक चेतना विकसित करने का अवसर दे रहा है, उसी भारत में रहने वाले भारतीयता के विरुद्ध अपराध करने वाले शासक को अपना आदर्श मान रहे हैं.
फ्री स्पीच को भारत में हमेशा से मान दिया जाता रहा है. फ्री स्पीच के नाम पर जिस तरह की सियासत हो रही है, उसने भारत की गरिमा और मर्यादा को नुकसान पहुंचाया है. अब तो हर वही स्पीच हिट होती है, जो हिंदू-मुस्लिम में विभाजन को हिट कर सके. जो जातिवाद को बढ़ाकर वोट बैंक साध सके. भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा महोत्सव महाकुंभ अभी प्रयागराज में संपन्न हुआ है.
वोट बैंक की राजनीति के चलते सनातन धर्म के सबसे बड़े आयोजन पर भी टीका-टिप्पणी सियासी औरंगजे़बों द्वारा की गईं. हर कदम पर विभाजन की राजनीति चली गई. यहां तक कि महाकुंभ में संगम स्नान पर जाने या नहीं जाने में भी विभाजन और वोट बैंक की रणनीति का ध्यान रखा गया.
सियासी औरंगजेब के चक्कर में ही सनातन धर्म और हिंदुत्व के विभिन्न त्योहारों और आयोजनों पर हिंदू मुस्लिम राजनीति का साया खड़ा हो जाता है. चाहे कांवड़ यात्रा हो, चाहे महाकुंभ हो, होली, दिवाली, दुर्गापूजा, शिवरात्रि और दूसरे त्योहारों पर हिंदू-मुस्लिमों के बीच तनाव, दंगे-फसाद भारतीय संस्कृति कभी स्वीकार नहीं करती. यह सब शायद इसलिए हो जाते हैं, क्योंकि अभी भी क्रूर शासकों को आदर्श मानने वाली मानसिकता कुछ लोग पाले हुए हैं.
इतिहास की धूल को चेहरों पर लगाने की अब क्या ज़रूरत है. अगर कोई उजला पक्ष है, तो उस पर तो बात स्वीकार हो सकती है, लेकिन भारत का रहने वाला, भारत विरोधी किसी भी कृत्य के लिए जिम्मेदार किसी भी शासक को अपना आदर्श कैसे स्वीकार कर सकता है. इतिहास के अंधकार से प्यार, अंधकार की ओर ही ले जाएगा. सभी समुदायों को सियासी विभाजन से अलग होने की जरूरत है. मेरिट की सियासत, इंसान में मेरिट का विकास करेगी. भारत का यह दुर्भाग्य समाप्त होना चाहिए, कि औरंगजेब का नाम लेकर सियासी लोग वोटो की फसल काट सकें.
बाबर की कब्र पर जाकर सजदा पढ़ने वाले भी सियासत में रहे हैं. यह सियासत अब टूट रही है, लेकिन इसकी गति और तेज़ होने की ज़रूरत है. औरंगजे़ब के चिन्ह भारत के चिन्ह नहीं हो सकते. कोई भारतीय इस चिन्ह से अपने को कैसे जोड़ सकता है.

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