*कर्मचारियों की मांगें सुनने कोई मंच नहीं
*कर्मचारियों की मांगें सुनने कोई मंच नहीं
*आयोग में अध्यक्ष नहीं,समिति भी है भंग
*सेतु का काम करते रहे आयोग व समिति
मध्य प्रदेश में पूर्ववर्ती शिवराज सरकार ने कर्मचारियों की मांगों को सुनने और उनके निराकरण कर सरकार को अनुशंसा करने कर्मचारी आयोग और कर्मचारी कल्याण समिति बनाई थी। जो सरकार व कर्मचारियों के बीच सेतु का काम करती रहीं..विधानसभा चुनाव के पहले तत्कालीन सरकार ने विभिन्न संवर्गों के कर्मचारियों के सम्मेलन बुलाए और कई घोषणाएं कीं। इसका लाभ भी भाजपा को चुनाव में मिला लेकिन लोकसभा चुनाव से पहले राज्य सरकार ने सभी बोर्ड,प्राधिकरण,समिति और परिषद में हुई नियुक्ति को निरस्त कर दिया था। तब से ही कर्मचारी कल्याण समिति नहीं है। वहीं, कमल नाथ सरकार में गठित हुए कर्मचारी आयोग का अस्तित्व तो सरकार ने बनाए रखा पर इसकी भूमिका सीमित कर दी। दिसंबर 2023 में इसकी अवधि एक वर्ष के लिए बढ़ा दी पर अध्यक्ष नियुक्त नहीं किया।अभी इसमें केवल वित्त विभाग के सलाहकार अजय चौबे सचिव हैं। आयोग पेंशन नियम और वेतन विसंगतियों को दूर करने के संबंध में अपनी रिपोर्ट शासन को दे चुका है। इसके कारण कर्मचारी से जुड़ी नेता समस्याओं की सुनवाई ही नहीं हो रही है। जो मामले सामान्य प्रशासन विभाग के संज्ञान में लाए जा रहे हैं,वे भी लंबित पड़े हैं। कर्मचारी संगठन सरकार से पुरानी व्यवस्था बहाली करने की मांग कर रहे हैं..माना जा रहा है कि सरकार जल्द ही निगम,मंडल,आयोग,प्राधिकरण और समितियों में राजनीतिक नियुक्ति करेगी..इस दौरान कर्मचारी कल्याण समिति भी बनेगी…लेकिन तब तक कर्मचारियों के पास अपनी बात रखने के लिए कोई मंच नहीं है..
