आत्मनिर्भर युवतियों ने संघर्ष के बजाए क्यों चुनी ख़ुदकुशी..?

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मध्यप्रदेश पुलिस में सूबेदार के पद पर कार्यरत नेहा शर्मा (मेढ़ा)ने ख़ुदकुशी कर ली.वो अपने पीछे चार साल के अबोध पुत्र और आठ महीने की बेटी को छोड़ गईं हैं.नेहा भरती सिपाही के पद पर हुईं थीं पर अपनी काबिलियत के बल पर सूबेदार बन गईं थीं.इसी काबिलियत और स्मार्टनेस के बल पर वो कौन बनेगा करोड़पति में सेलेक्ट हुईं और हॉट सीट तक पहुँच अमिताभ बच्चन के सामने बैठ गईं थीं.डेढ़ महीने पहले मध्यप्रदेश के ही जनसंपर्क विभाग में सहायक संचालक के पद पर कार्यरत पूजा थापक ने ख़ुदकुशी कर ली जिनके एक पुत्र है.
इन दो आत्मनिर्भर युवतियों के ऐसे पलायन से मैं बैचैन हूँ क्योंकि जनसंपर्क पैतृक विभाग है तो मप्र पुलिस में तेरह बरस संयुक्त संचालक(जनसंपर्क) के पद पर काम किया है.सवाल है की आर्थिक आत्मनिर्भरता,मायके की मजबूती और असरदार विभागों का हिस्सा होते हुए भी दोनों ने संघर्ष के बजाए मौत को क्यों चुना.?होना यह था की वो अलग होकर पति और ससुराल पक्ष को कठघरे में खड़ा कर सबक सिखातीं.यह उन असंख्य महिलाओं को हौसला देता जो उनकी तरह आत्मनिर्भर ना होने से अपने बच्चों के साथ सामूहिक ख़ुदकुशी कर लेती हैं.ऐसे दुखद हादसे इस प्रदेश में खूब हो रहे हैं.आर्थिक मजबूरियां भी पूरे परिवार को ख़ुदकुशी की तरफ धकेल रही हैं.
भोपाल में जोशी परिवार के पांच सदस्यों और यहीं के रातीबड़ में भूपेन्द्र विश्वकर्मा की पत्नी रितु और बच्चो ऋषिराज और ऋतुराज के साथ ख़ुदकुशी की दहलाने वाली घटनाएँ हो चुकी हैं.दो साल पहले की रिपोर्ट के मुताबिक मध्यप्रदेश ख़ुदकुशी के मामले में देश में तीसरे नंबर पर था. जिस तेजी से घटनाएं हो रही हैं,मुमकिन है हम पहले या दूसरे स्थान पर हों.? तब के मुख्यमंत्री शिवराज ने जनता की खुशहाली के लिए फरेबी आनंद विभाग बना डाला था.मोहन यादव सरकार ने पारिवारिक विवादों को सुलझाने के लिए प्रदेश के महिला थानों के परामर्श केन्द्रों और उर्जा डेस्क में होने वाली काउंसिलिंग ही बंद कर दी है.(दैनिक भास्कर/टाइम्स ऑफ़ इंडिया/एचटी की ख़बरें)sreeprakash dixet

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