मुआवजा लेने बनाए 2000 घर

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एमपी-यूपी के बीच सिंगरौली-प्रयागराज नेशनल हाईवे जहां से निकलना है, वहां पिछले एक महीने में ही मुआवजा इंडस्ट्री खड़ी हो चुकी है। भास्कर टीम ने 7 दिन यहां रहकर देखा तो पता चला कि यूपी, छत्तीसगढ़, झारखंड तक के लोग यहां किसानों की उसी जमीन पर घर बना रहे हैं, जहां से हाईवे निकलेगा। एक-एक व्यक्ति ने 32-32 मकान बना लिए। दलाल और अफसरों की मिलीभगत मुआवजे की गारंटी है।

ऐसे हैं ये मुआवजा घर

  • ईंट की 4 फीट ऊंची चहारदीवारी व टिन शेड रखकर बनाए गए घर
  • बाहर से स्थायी लगते हैं, पर इन सभी घरों में रहता कोई नहीं

एक महीने में ही बन गए पक्के मकान

सिंगरौली- प्रयागराज नेशनल हाईवे के लिए चितरंगी और दुधमनिया तहसील के जिन 33 गांवों की जमीन चिह्नित की गई है, वहां महीने भर पहले खेत ही खेत नजर आते थे, लेकिन अब पक्के मकानों की लाइन है। यहां करीब 70 किलोमीटर का नेशनल हाईवे बनना है। जमीनों का सर्वे पूरा होने के बाद भी बड़े मुआवजे के लिए पूरा सिस्टम ही सेट हो गया। दलाल किसानों की जमीनों का बाहरी लोगों के साथ स्टाम्प पेपर पर इकरारनामा करवा रहे हैं। इसमें लिखा जाता है कि जमीन पर निर्माण का मुआवजा मिलता है तो निर्माण करने वाले को 80 फीसदी मुआवजा राशि दी जाएगी।

20 फीसदी राशि जमीन के मालिक के पास रहेगी। ग्राहक लाने के लिए दलालों का पूरा नेटवर्क है। यह फॉर्मूला चल निकला। चितरंगी तहसील के बड़कुडु गांव के लोग बताते हैं कि एक पटवारी ने तो अपने भाई और रिश्तेदारों के नाम से कुछ जमीन लेकर मकान बनाए हैं। भास्कर ने चितरंगी के रेवेन्यू अफसर (आरआई) से भी मुआवजा वाली जमीन का जुगाड़ करने की बात की तो पहले तो उन्होंने इनकार कर दिया। लेकिन, बाद में आकर मिलने को कहा। स्थानीय लोग, पुलिस और नेशनल हाईवे अथॉरिटी के अफसर मानते हैं कि ऊपर से नीचे तक के अफसरों की मिलीभगत के बिना मुआवजे का ऐसा फर्जीवाड़ा हो ही नहीं सकता।

जिन 33 गांवों की जमीन चिह्नित की गई है, वहां महीने भर पहले खेत ही खेत नजर आते थे, लेकिन अब पक्के मकानों की लाइन है। फोटो : शान बहादुर
जिन 33 गांवों की जमीन चिह्नित की गई है, वहां महीने भर पहले खेत ही खेत नजर आते थे, लेकिन अब पक्के मकानों की लाइन है। फोटो : शान बहादुर

रजिस्ट्री-नामांतरण पर रोक, इसीलिए 80:20 का फॉर्मूला

सिंगरौली-प्रयागराज नेशनल हाईवे का सर्वे हो चुका है। मप्र में 70 किमी के हाईवे की जद में चितरंगी और दुधमनिया तहसील के 33 गांवों की जमीन आ रही है। अधिग्रहण की अधिसूचना मार्च में जारी हो गई थी। यानी, जमीन की खरीद-फरोख्त और नामांतरण नहीं हो सकता। फिर भी दोनों तहसीलों के गावों में पिछले 1 महीने में 2000 से अधिक ‘मुआवजा घर’ खड़े हो गए हैं।

किसानों के पास पैसा नहीं बचा तो उन्होंने मुआवजे का दूसरा गणित निकाल लिया। स्टाम्प पेपर पर वे दूसरे प्रदेशों के लोगों से निर्माण की एवज में निर्माण के मुआवजे में से 80% राशि देने का इकरारनामा कर रहे ​हैं। एनएचएआई के पीडब्ल्यूडी विंग के ईई शंकर लाल मानते हैं कि सर्वे पूरा होने के बाद बड़ी संख्या में निर्माणों की शिकायत मिली है। वे कहते हैं, हम इन्हें चिह्नित करेंगे।

80:20 यानी, किसान का डबल फायदा…

जमीन अधिग्रहण में आ रही है तो किसान को जमीन का मुआवजा तो मिलेगा ही। यदि उस पर निर्माण है तो उसका भी पैसा अलग से मिलता है। इकरारनामा करने वाला खेत पर पैसा लगाकर मकान बनवाएगा। मुआवजा मिलेगा तो किसान को इस मुआवजे में भी 20 फीसदी राशि मिलेगी और 80% हिस्सा बनवाने वाले को मिलेगा।

पटवारी पांच दिन पुराने मकान को 5 साल पुराना लिख दे तो मुआवजा

इस 80:20 फॉर्मूले को लेकर हमने एनएचएआई के एक वरिष्ठ अधिकारी से बातचीत की। उन्होंने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि किसी भी हाईवे के प्रोजेक्ट के लिए हम स्थानीय कलेक्टर या एसडीएम को कॉम्पिटेंट अर्थारिटी ऑफ लैंड एक्विजेशन (काला) नियुक्त करते हैं। वही सर्वे, दावे आपत्ति आदि करने के बाद रिपोर्ट देते हैं जमीन का कृषि, आवासीय या फिर औद्योगिक इस्तेमाल हो रहा है। इसी आधार पर मुआवजा तय होता है।

सर्वे के बाद मकान बन रहे हैं तो यह राजस्व अमले की मिलीभगत के बिना संभव नहीं हैं। क्योंकि, हमें तो एसडीएम की तरफ से ही जो रिपोर्ट दी जाती है, उसी के आधार पर मुआवजा बनाते हैं। यदि पटवारी किसी पांच दिन पहले बने मकान को पांच साल पुराना लिख देता है, तो हमें उसी आधार पर मुआवजा देना होता है। नियम के हिसाब से 3ए की अधिूसूचना जारी होने के बाद लैंड यूज बदल नहीं सकता है।

नोटिफिकेशन से पहले वालों को ही मुआवजा

चितरंगी एसडीएम सुरेश जाधव का कहना है कि अधिसूचना के नोटिफिकेशन से पहले जो मकान बने हैं, उन्हें ही मुआवजा मिलेगा। यदि कोई मुआवजा लेने के लिए मकान बना रहा है तो यह सही नहीं है। हम देखेंगे कि ये निर्माण कब बने हैं। सैटेलाइट मैप से इसे देखा जाएगा।

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