एक भक्त भगवान राम को अपना शिष्य मानते थे

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एक भक्त भगवान राम को अपना शिष्य मानते थे। वे जब भी मंदिर जाते, नई माला लेकर जाते, पहले स्वयं पहनते और फिर वही माला अपने गले से उतार कर श्री राम के विग्रह को पहना देते । अन्य लोगों ने इसका विरोध किया कि आप भगवान को कुछ भी मानो ये आपका भाव है किन्तु उनको अपनी प्रसादी माला पहनाने का अधिकार आपको मंदिर में नहीं है , उन्होंने कहा ठीक है , वे नयी माला लेकर आये और श्री राम के विग्रह को सीधे पहना दी लेकिन वो माला टूट कर गिर गयी , ऐसा तीन चार बार हुआ , माला विग्रह को पहनाई जाती किन्तु वो अपने आप टूट कर गिर जाती । भक्त ने कहा कि चूंकि वे गुरु हैं, इसलिए भगवान उनकी पहनी हुई माला (प्रसादी) ही धारण करेंगे। जब उन्होंने माला अपने गले से उतारकर भगवान को दी, तो वह माला टूट कर नहीं गिरी और सब लोग इस बात से आश्चर्य में पड़ गए , हमें इससे यह सीख मिलती है कि प्रभु को जिस भाव से पूजो प्रभु उस भाव में ही आपके सामने आते हैं।

राधे राधे

मार्गदर्शक – श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज
प्रेरणास्त्रोत – श्री श्री १०८ श्री स्वामी हरिहरानंद जी महाराज , होलीपुरा

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