औकात में कैसे रहते हैं? बार बार टूटता संयम ?

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औकात में कैसे रहते हैं? बार बार टूटता संयम ?

मध्यप्रदेश विधानसभा के बजट सत्र में जब अडाणी ग्रुप से जुड़े मुद्दे पर बहस शुरू हुई तो उम्मीद थी कि आंकड़ों और तथ्यों की टक्कर होगी। लेकिन हुआ वही जो अक्सर होता है बहस गरम हुई और भाषा फिसल गई। कैलाश विजयवर्गीय का “सब्र का बांध” टूट गया और एक विवादित टिप्पणी सदन में गूंज उठी। विपक्ष ने हंगामा किया, सत्ता पक्ष ने बचाव किया और लोकतंत्र की मर्यादा फिर कटघरे में खड़ी हो गई। बाद में खेद व्यक्त हुआ। मोहन यादव ने माफी मांगी। नरेंद्र सिंह तोमर ने संयम की सलाह दी। मामला शांत हो गया, लेकिन सवाल जिंदा है।

यह पहला मौका नहीं जब विजयवर्गीय का सब्र टूटा हो। उनका राजनीतिक स्वभाव आक्रामक रहा है और वे अक्सर तीखी भाषा के लिए चर्चा में रहते हैं। समर्थक इसे बेबाकी कहते हैं, विरोधी इसे अहंकार। लेकिन जब ऐसी टिप्पणी विधानसभा जैसे मंच पर हो, तो मामला निजी नहीं रहता। सदन कोई चुनावी सभा नहीं है जहां ताली और नारे से माहौल मापा जाए। सदन वह जगह है जहां शब्द कानून बनाते हैं, जहां वाक्य नीतियों में बदलते हैं।

वहां अगर संयम टूटेगा तो संदेश भी गलत जाएगा।
मुख्यमंत्री का माफी मांगना जिम्मेदारी का संकेत है, लेकिन यह भी सच है कि यह पहली बार नहीं जब उन्हें अपने ही सहयोगी की टिप्पणी पर स्थिति संभालनी पड़ी हो। सवाल यह है कि क्या हर बार माफी ही समाधान है? क्या मर्यादा का पालन अब स्थायी संस्कार नहीं बल्कि तात्कालिक औपचारिकता बन गया है? अगर कोई नेता बार-बार सीमा लांघता है और हर बार खेद जता देता है, तो क्या यह लोकतांत्रिक परिपक्वता है या राजनीतिक सुविधा?

राजनीति में आज आक्रामकता को लोकप्रियता समझ लिया गया है। जितना तीखा बयान, उतनी तेज सुर्खी। सोशल मीडिया के दौर में संयम से ज्यादा सनसनी बिकती है। ऐसे में “सब्र का बांध टूट गया” एक तरह का राजनीतिक वाक्य बन गया है, जो गलती को भावनात्मक रंग दे देता है। लेकिन जनप्रतिनिधि का सब्र निजी नहीं होता, सार्वजनिक होता है। उसका हर शब्द जनता की नजर में दर्ज होता है। जब वह नियंत्रण खोता है तो केवल विपक्ष नहीं, पूरी व्यवस्था प्रभावित होती है।

“औकात में रहो” राजनीति में अक्सर कहा जाता है। पर लोकतंत्र में औकात पद से नहीं, जिम्मेदारी से तय होती है। मंत्री की औकात इसलिए बड़ी नहीं कि उसके पास सत्ता है, बल्कि इसलिए कि उसके पास जवाबदेही है। विपक्ष की औकात इसलिए कम नहीं कि उसके पास संख्या कम है, बल्कि इसलिए कि वह सवाल पूछने का अधिकार रखता है। असली औकात जनता तय करती है, और जनता समय आने पर फैसला भी सुनाती है।

विधानसभा बहस का मंच है, बहसबाजी का अखाड़ा नहीं। अगर शब्दों की मर्यादा टूटेगी तो लोकतंत्र की विश्वसनीयता भी कमजोर होगी। अध्यक्ष की नसीहत जरूरी है, मुख्यमंत्री की माफी भी जरूरी है, लेकिन सबसे जरूरी आत्मसंयम है। राजनीति में ताकत दिखाने से ज्यादा जरूरी है संतुलन दिखाना। आक्रामक होना आसान है, मर्यादित रहना कठिन।

बार-बार अगर सब्र का बांध टूटे तो सवाल बांध पर नहीं, उसके निर्माण पर उठता है। क्या राजनीतिक संस्कृति ऐसी बन गई है जहां उग्रता को प्रोत्साहन मिलता है और संयम को कमजोरी माना जाता है? अगर ऐसा है तो यह केवल एक व्यक्ति की समस्या नहीं, पूरे तंत्र की चुनौती है।

आखिर में बात सीधी है। लोकतंत्र में कोई भी नेता कानून से ऊपर नहीं, मर्यादा से बड़ा नहीं और जनता से शक्तिशाली नहीं। सदन में बैठा हर व्यक्ति संविधान की शपथ लेकर आता है। वह शपथ सिर्फ सत्ता चलाने की नहीं, शब्दों को भी मर्यादित रखने की होती है। अगर भाषा की सीमा टूटेगी तो विश्वास की दीवार भी दरकेगी।

औकात में रहना अपमान नहीं, लोकतांत्रिक अनुशासन है। सत्ता को भी, विपक्ष को भी और हर जनप्रतिनिधि को यह याद रखना चाहिए कि जनता का सब्र भी असीमित नहीं है। जब जनता का बांध टूटता है तो राजनीतिक समीकरण बदल जाते हैं। इसलिए बेहतर है कि सब्र का बांध संभालकर रखा जाए, वरना इतिहास गवाह है कि टूटे हुए बांध सिर्फ पानी नहीं बहाते, दिशा भी बदल देते हैं। Jansampark Madhya Pradesh Dr Mohan Yadav PMO India Narendra Modi Zila Panchayat Bhopal अंतिम ख़बर @highlight

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