वो आँगनवाड़ी और दूध ब्रेड..?

0
Spread the love

वो आँगनवाड़ी और दूध ब्रेड..?

व्यंग्य – राजेन्द्र सिंह जादौन

प्रदेश में घोषणा हुई है कि अब 8वीं कक्षा तक के 72 हजार बच्चों को टेट्रा पैक दूध मिलेगा। सुनते ही मन सीधा बचपन की आंगनवाड़ी में पहुँच गया जहाँ दूध स्टील के भगोने में आता था, और ब्रेड कागज़ में लिपटी होती थी। उस समय सरकार थी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की, और दावा होता था कि बच्चों को “पूर्ण पौष्टिक” दूध और “ब्राउन ब्रेड” मिल रही है।

तब हमें यह नहीं पता था कि दूध की राजनीति भी होती है। हम तो बस लाइन में लगकर अपना गिलास आगे कर देते थे। कभी दूध पतला होता, कभी गाढ़ा लेकिन उसमें बचपन की सादगी घुली होती थी। ब्रेड कभी सूखी होती, तो कभी उस पर मक्खन का सपना लगा होता। पर पेट भर जाता था, और हमें लगता था कि देश का भविष्य सचमुच मजबूत हो रहा है।

अब समय बदल गया है। अब प्रदेश में सरकार है भारतीय जनता पार्टी की। घोषणा भी आधुनिक है टेट्रा पैक दूध! अब दूध भगोने से नहीं, पैकेट से निकलेगा। विज्ञान और तकनीक का युग है। बच्चा अब गिलास नहीं पकड़ेगा, स्ट्रॉ लगाएगा। विकास की असली पहचान यही है दूध वही, पर पैकिंग बदल गई।

कहा जा रहा है कि इससे प्रदेश में दुग्ध उत्पादन बढ़ेगा, किसानों को फायदा होगा, और बच्चे “अधिक पौष्टिक” होंगे। मुझे समझ नहीं आता कि पौष्टिकता दूध में बढ़ी है या भाषण में। पहले भी दूध “पूर्ण” था, अब भी “पौष्टिक” है। अंतर बस इतना है कि पहले ब्रेड के साथ फोटो नहीं खिंचती थी, अब टेट्रा पैक के साथ प्रेस नोट जारी होता है।

सच पूछिए तो हमारे देश में योजनाएँ बच्चों से ज्यादा पोस्टर के लिए बनती हैं। पहले आंगनवाड़ी में नाम लिखकर वितरण होता था, अब ऐप में एंट्री होगी। पहले शिक्षिका समझाती थी कि दूध पी लो, ताकत आएगी। अब अधिकारी बताएंगे कि यह योजना प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाएगी।

बचपन की वो आंगनवाड़ी याद आती है, जहाँ दूध से ज्यादा दोस्ती मिलती थी। कोई अपना गिलास आधा छोड़ देता, तो दूसरा पी जाता। ब्रेड का टुकड़ा बदलकर दोस्ती पक्की हो जाती। आज का बच्चा पैकेट खोलेगा, स्ट्रॉ लगाएगा, और शायद सेल्फी लेगा “देखो, सरकार का दूध!”

राजनीति का भी अजीब गणित है। जब कांग्रेस दूध देती थी, तो कहा जाता था कि यह वोट बैंक की राजनीति है। अब भाजपा दूध दे रही है, तो कहा जा रहा है कि यह न्यू इंडिया का न्यूट्रिशन मॉडल है। दोनों ही समय में बच्चा वही है उसकी भूख भी वही है, उसकी मासूमियत भी वही।

दूध की नदियाँ बहाने की बात नई नहीं है। हर चुनाव में कोई न कोई दुग्ध क्रांति लेकर आता है। कभी श्वेत क्रांति का हवाला दिया जाता है, कभी किसानों की आय दोगुनी करने का। पर गाँव के बच्चे की आँखों में आज भी वही सवाल है “दूध रोज मिलेगा या सिर्फ घोषणा में?”

मुझे याद है, जब ब्रेड के पैकेट पर एक्सपायरी डेट नहीं देखी जाती थी। अब हर चीज़ पर तारीख है, पर भरोसे की कोई तारीख नहीं। पहले दूध उबालकर दिया जाता था, अब सीधा पैक से आएगा। पहले आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की मुस्कान बोनस थी, अब पोषण का डेटा बोनस होगा।

हमारे यहाँ हर सरकार अपने समय को स्वर्ण युग बताती है। कांग्रेस के समय ब्राउन ब्रेड “पोषण क्रांति” थीभाजपा के समय टेट्रा पैक “सिस्टम सुधार” है। असल में क्रांति बच्चे की भूख में नहीं, शब्दों में होती है।

कभी-कभी सोचता हूँ, अगर बचपन में हमें टेट्रा पैक दूध मिलता तो क्या हम ज्यादा बुद्धिमान हो जाते? या फिर वही शरारती बच्चे रहते, जो ब्रेड को जेब में रखकर घर ले जाते थे? शायद फर्क सिर्फ इतना होता कि हम स्ट्रॉ से दूध पीते हुए भी राजनीति समझ जाते।

आज जब 72 हजार बच्चों के लिए योजना बनी है, तो मन खुश भी है। बच्चा चाहे किसी भी सरकार के समय का हो, उसे दूध मिलना चाहिए। पर व्यंग्य इसलिए जन्म लेता है, क्योंकि हर योजना के साथ राजनीति की मलाई भी जम जाती है।

कल को अगर कोई और सरकार आएगी, तो शायद कहेगी “अब बच्चों को ऑर्गेनिक दूध मिलेगा, ग्लूटेन फ्री ब्रेड के साथ।” और हम फिर याद करेंगे कि कभी आंगनवाड़ी में स्टील के गिलास में दूध मिलता था।

असल सवाल न कांग्रेस का है, न भाजपा का। सवाल यह है कि क्या बच्चे को रोज़, ईमानदारी से, बिना फोटो-सेशन के दूध मिलेगा? क्या ब्रेड सचमुच ब्राउन होगी, या सिर्फ कागज़ पर?

दूध और ब्रेड की कहानी दरअसल राजनीति की कहानी है। सरकारें बदलती हैं, पैकेट बदलते हैं, घोषणाएँ बदलती हैं पर बच्चा हर दौर में वही रहता है, जो लाइन में सबसे आगे खड़ा होकर पूछता है “भैया, आज भी मिलेगा ना?”

शायद यही लोकतंत्र की असली तस्वीर है जहाँ आंगनवाड़ी का दूध भी विचारधारा में बंट जाता है। पर उम्मीद यही है कि इस बार दूध सिर्फ बहस में नहीं, बच्चों के पेट में भी पहुँचे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *