छत्रपति शिवाजी व नरेन्द्र मोदी का राष्ट्रवादी विमर्श: संकीर्णता से परे एक समावेशी दृष्टि

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संपादकीय

छत्रपति शिवाजी व नरेन्द्र मोदी का राष्ट्रवादी विमर्श: संकीर्णता से परे एक समावेशी दृष्टि

लेखक – डॉ बृजेश कुमार

भारतीय राष्ट्रवाद की अवधारणा बहुस्तरीय, ऐतिहासिक और निरंतर विकसित होने वाली प्रक्रिया है। इसे समझने के लिए अतीत और वर्तमान के बीच गंभीर संवाद आवश्यक है। इस परिप्रेक्ष्य में छत्रपति शिवाजी महाराज और समकालीन भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के राष्ट्रवादी विमर्श का तुलनात्मक विश्लेषण एक महत्वपूर्ण अकादमिक आयाम प्रस्तुत करता है। दोनों भिन्न कालखंडों के प्रतिनिधि हैं—एक मध्यकालीन साम्राज्यवादी संरचनाओं के बीच उभरता क्षेत्रीय शक्ति-नायक, दूसरा लोकतांत्रिक गणराज्य का निर्वाचित नेतृत्व—फिर भी दोनों के विमर्श में सांस्कृतिक आत्मसम्मान, संस्थागत सुदृढ़ता और राष्ट्रीय पुनर्स्थापना की साझा आकांक्षा परिलक्षित होती है।

ऐतिहासिक संदर्भ और राष्ट्रवाद की प्रकृति

17वीं शताब्दी में शिवाजी का “स्वराज्य” मुग़ल केंद्रीकरण और दक्खिनी सल्तनतों की शक्ति-संरचनाओं के बीच राजनीतिक आत्मनिर्णय का घोष था। यह आधुनिक राष्ट्र-राज्य की अवधारणा नहीं, किंतु क्षेत्रीय स्वाधीनता, सांस्कृतिक गरिमा और जन-आधारित शासन का प्रारूप अवश्य था। उनका राष्ट्रवाद किसी धार्मिक प्रतिशोध पर आधारित नहीं था; बल्कि न्यायपूर्ण शासन, सुरक्षा और आत्मसम्मान की स्थापना पर केंद्रित था। सबका सम्मान के निर्देश तथा विविध समुदायों की प्रशासनिक भागीदारी इस बात की पुष्टि करते हैं कि उनका विमर्श बहिष्करणकारी नहीं था।

इसके विपरीत, समकालीन भारत एक संवैधानिक लोकतंत्र है, जहाँ राष्ट्रवाद की अवधारणा नागरिकता, अधिकारों और संस्थागत ढाँचे से जुड़ी है। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रवाद का विमर्श विकास, वैश्विक प्रतिष्ठा और सांस्कृतिक पुनर्पाठ के साथ संयोजित दिखाई देता है। “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” जैसे सूत्र समावेशी विकास के दावे को रेखांकित करते हैं।

संस्थागत निर्माण और शासन-दृष्टि

शिवाजी का राष्ट्रवादी मॉडल संस्थागत सुदृढ़ीकरण पर आधारित था। अष्टप्रधान परिषद, किलों का प्रशासनिक उपयोग और नौसेना का विकास यह संकेत करते हैं कि वे व्यक्ति-आधारित वीरता को स्थायी राज्य-व्यवस्था में रूपांतरित करना चाहते थे। उनका राष्ट्रवाद भावनात्मक आवेग से अधिक संरचनात्मक स्थिरता पर केंद्रित था।

इसी प्रकार, समकालीन शासन में संस्थागत क्षमता, डिजिटल अवसंरचना, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण प्रणाली, और वैश्विक कूटनीतिक सक्रियता को राष्ट्र-निर्माण के साधन के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यहाँ राष्ट्रवाद केवल सांस्कृतिक प्रतीकों का पुनरुत्थान नहीं, बल्कि प्रशासनिक दक्षता और विकास-उन्मुख राज्य की स्थापना से जुड़ा हुआ है।

सांस्कृतिक आत्मसम्मान और समावेशिता

शिवाजी का राज्याभिषेक भारतीय परंपराओं के अनुरूप संपन्न हुआ, जो सांस्कृतिक आत्मविश्वास का उद्घोष था। किंतु इस सांस्कृतिक आग्रह के साथ उन्होंने सामाजिक समरसता को भी जोड़ा। उनका स्वराज्य स्थानीय भाषा, परंपरा और जनशक्ति पर आधारित था।
समकालीन विमर्श में भी सांस्कृतिक विरासत, तीर्थ-पर्यटन, ऐतिहासिक स्थलों के पुनर्विकास और वैश्विक मंचों पर भारतीय पहचान को रेखांकित करने पर बल दिया जाता है। तथापि, लोकतांत्रिक संदर्भ में यह आवश्यक है कि सांस्कृतिक पुनर्स्थापना बहुलतावादी मूल्यों और संवैधानिक प्रतिबद्धताओं के अनुरूप हो।

अकादमिक दृष्टि से किसी भी राष्ट्रवादी विमर्श का मूल्यांकन आलोचनात्मक संतुलन के साथ किया जाना चाहिए। शिवाजी के समय में राष्ट्रवाद स्वाधीनता और आत्मरक्षा का उपकरण था; आज के भारत में यह सामाजिक न्याय, समान अवसर और संवैधानिक मर्यादाओं के अनुरूप होना चाहिए। यदि शिवाजी का स्वराज्य नैतिकता और उत्तरदायित्व पर आधारित था, तो समकालीन राष्ट्रवाद को भी पारदर्शिता, संस्थागत संतुलन और नागरिक अधिकारों की रक्षा के मानकों पर परखा जाना चाहिए।

शिवाजी और नरेन्द्र मोदी के राष्ट्रवादी विमर्श में एक साझा सूत्र सशक्त, आत्मसम्मानी और संगठित राष्ट्र की आकांक्षा है। किंतु राष्ट्रवाद की वास्तविक शक्ति उसकी समावेशिता, संवैधानिक प्रतिबद्धता और सामाजिक समरसता में निहित होती है। इतिहास और वर्तमान का यह तुलनात्मक संवाद यह संकेत देता है।
इस व्यापक परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रवाद केवल भावनात्मक नारा नहीं, बल्कि नैतिक शासन, सामाजिक समरसता और लोकतांत्रिक परिपक्वता का दीर्घकालिक प्रकल्प है।

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