जनसंवेदना : प्रेरणादायक दास्तान

विशेष – जनसंवेदना : प्रेरणादायक दास्तान
राजेंद्र सोनी, संपादक ( फोटो )
जनसंवेदना कल्याण समिति
अंधेरे में रोशनी की किरण – राधेश्याम अग्रवाल
गरीबो, वंचितों, दुखीजनों के मसीहा
जनसंवेदना कल्याण समिति की स्थापना के 21 वर्ष पूर्ण हो गये है और इस आनंद के उत्सव में जनसंवेदना परिवार का गौरवशाली प्रकाशन ” मानव सेवा ही माधव सेवा ‘ आपके हाथों में है I जनसंवेदना कल्याण समिति ने पिछले 21 वर्षों में हजारों – लाखों दुखी परिवारों, वंचितो, गरीबों के आंसूं पोंछने का पुण्य कार्य किया है जनसंवेदना कल्याण समिति के अध्यक्ष श्री राधेश्याम अग्रवाल किसी पहचान के मोहताज नहीं है, सिर्फ भोपाल ही नहीं बल्कि मध्य प्रदेश की एकमात्र संस्था है जनसंवेदना, जो लावारिश लाशों के अंतिम क्रिया करने के लिये संकल्पित है , उनका मानना है कि हम अगर नर की सेवा करेंगे तो हम नारायण तक अवश्य पहुँच जायेंगे I
सूरत बदलनी चाहिए ! कौन बदलेगा ? अंधेरे में भी रोशनी की किरण बन कर आये राधेश्याम अग्रवाल
हम चाहते तो हैं कि हमारे आस पास की जो सतही, भ्रष्ट व्यवस्था है, वो बदले, लेकिन हम बदलना नहीं चाहते परंतु बेठे बैठे ये जरूर सोचते हैं की सूरत बदलनी चाहिए ! लावारिश लाशों की समस्या बहुत विकट है, लावारिश लाशों के अंतिम संस्कार की सरकारी प्रक्रिया इतनी ज्यादा जटिल है कि लावारिश लाशों की दुर्दशा नाकाबिले बर्दाश्त है I इस सतही व्यवस्था में कहा जाता है कि जागरूक ,चैतन्य लोगों की अन्याय के खिलाफ ऊँची आवाजों को भी अनसुना कर दिया जाता है तो मुर्दो की तो कोई आवाज ही नहीं, उनके साथ हो रहे अत्याचार, दुराचार को कौन सुनेगा ?
लेकिन नहीं , इस अंधेरे में भी रोशनी की किरण बन कर आये राधेश्याम अग्रवाल एक आम इंसान , अन्य लोगों की तरह उन्होंने किसी अन्य स्वार्थ के लिये समाज सेवा नहीं की, ना ही उन्होंने भ्रष्ट, सतही व्यवस्था को कोसा, जीवन सफर में कंपाउंडर की नौकरी की और नजदीक से लावारिश लाशों की दुर्दशा तो देखी तो निकल पड़े इस अव्यवस्था को अपने दम पर सुधारने , लावारिश लाशों के साथ हो रहे अन्याय को अपने अंदाज में न्याय दिलाने I पेंशन मिल रही थी, परिवार था लेकिन सेवा का जज्बा ऐसा कि सारे अवरोधों , चुनौतियों के सामने झुके नहीं और आज राधेश्याम अग्रवाल अपने दम पर एक मिसाल बन चुके हैं I
उनकी संस्था जनसंवेदना का ब्रह्म वाक्य है ” मानव सेवा ही माधव सेवा है ” यानी मानव सेवा ही ईश्वर की सच्ची सेवा है। मानव यानी मनुष्य और माधव यानी ईश्वर। माधव की सेवा ही मनुष्य की सेवा है। जब राधेश्याम अग्रवाल जी BHEL से सेवानिवृत्त हो चुके थे ,उसके बाद घटी एक घटना ने राधेश्याम अग्रवाल जी का जीवन बदल कर रख दिया और उनके जीवन को सार्थकता से, सेवा, करुणा से भर दिया , आज उनकी निस्वार्थ सेवा भावना का ही कमाल है कि 78 वर्ष के हो चुके राधेश्याम अग्रवाल का उत्साह देखते ही बनता है , सेवा भाव ही उनका ईंधन है , उनके चेहरे पर तेज है, उनकी संस्था से लोग जुड़ रहे हैं, उनके सेवा कार्यों का निरंतर विस्तार हो रहा है, आइये राधे श्याम अग्रवाल जी को और उनकी संस्था को नजदीक से जानने की कोशिश करते हैं I
आरंभिक जीवन
राधेश्याम अग्रवाल का जन्म स्वर्गीय मूलचंद अग्रवाल और स्वर्गीय कमला अग्रवाल के घर में 15 जनवरी 1947 को मध्यप्रदेश के ब्यावरा में हुआ, राधेश्याम अग्रवाल के परिवार में 4 भाई और 2 बहन थी, बचपन संघर्षों में बीता, राधेश्याम अग्रवाल के पिता मूलचंद अग्रवाल स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे और उनका मूल रूप से पशु आहार का व्यापार था साथ ही जीविका चलाने हेतु अनेकों व्यापार में सफल असफल रूप से लिप्त रहे I
राधेश्याम अग्रवाल बताते हैं कि उनका बचपन बहुत अभावों में बीता, बड़ा परिवार और सीमित संसाधन बहुत बड़ी समस्या थी, बहुत गरीबी देखी , मेक्सिकन गेहूँ खाया , मलेशिया के कपड़े पहने , टायरों की चप्पलें पहनीं, राधेश्याम अग्रवाल अपनी भीगी आँखों के साथ, अपना बचपन याद करते हुए भर्राई हुई आवाज में बताते हैं कि मोहर्रम के दौरान उनकी मां पापड़ से भरा टोकरा उनके सर पर रख देती थी और राधेश्याम जी गली – गली पापड़ बेचा करते थे , खूब आर्थिक परेशानियाँ झेली , बहुत चुनौतियों का सामना किया और जीवन के घोर संघर्षों से जूझते हुए राधेश्याम जी ने उच्चतर माध्यमिक शिक्षा उत्तीर्ण कर ली और वर्ष 1964 में कंपाउंडर के प्रशिक्षण के लिये गाँधी मेडिकल कॉलेज में प्रशिक्षण हेतु भोपाल आ गये I
बी एच ई एल की नौकरी और पत्रकारिता का जुनून
कंपाउंडर की ट्रेनिंग के पश्चात वर्ष राधेश्याम अग्रवाल ने नौकरियां की, लेकिन तबादलों के चलते उनको रिटेल की नौकरी रास नहीं आई, यही कारण था की उन्होंने BHEL( भेल ) का चयन किया और 1974 में BHEL भोपाल के कस्तूरबा अस्पताल में पदस्थ हो गये I और यहीं से उनकी पत्रकारिता के जुनून को पंख मिले और ” संपादक के नाम पत्र लेखन ” के साथ उनकी पत्रकारिता की शुरुआत हुई I BHEL की नौकरी के साथ वो पत्रकारिता करते रहे, लेकिन पत्रकारिता के साथ उनकी लगाव और जोश के कारण उनको अपनी भेल की नौकरी में एक बार निलंबन और दो बार बर्खास्तता का सामना भी करना पड़ा I अपने निलंबन एवं बर्खास्त के समय का राधेश्याम जी ने भरपूर फायदा उठाया और दैनिक सातवीं दुनिया अखबार में भेल रिपोर्टर के तौर पर काम किया उसके बाद दैनिक भास्कर में वो क्राइम रिपोर्टर एवं BHEL के रिपोर्टर रहे , UNI में घनश्याम अग्रवाल जी के साथ भी उन्होंने काम किया I
राधे – कृष्णा की जोड़ी
राधेश्याम अग्रवाल जी गर्व से बताते हैं कि उन्होंने जीवन में बहुत उतार चढ़ाव देखें, 4 बच्चों का परिवार है, दो लड़कियाँ और दो लड़के, छोटी सी कंपाउंडर की नौकरी करी, जीवन के घोर संघर्ष के दौरान BHEL से दो बार बर्खास्त भी हुआ , जीवन में जब अंधेरे के सिवा कुछ भी नहीं नजर आता था तब मेरी पत्नि कृष्णा ने मेरा साथ बिना किसी स्वार्थ के दिया, मैं उसका राधा और वो मेरी श्याम है, जिसके घर में स्वयं कृष्ण हों , फिर कोई भी चुनौती मुझे कैसे तोड़ सकती थी, ये मेरी पत्नि की ही साधना है, उसका प्रेम पूर्ण साथ है कि मैं ये सब कर पाया और आज उनके ही समर्पण और उनकी बेशकीमती संगति के कारण ही आपके समक्ष बैठा हूं I
पत्रकारिता के जुनून के आगे नतमस्तक BHEL
राधेश्याम अग्रवाल गर्व के साथ बताते हैं कि भारत हेवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड के तत्कालीन कार्यपालक निदेशक एस के हांडा ने मेरे पत्रकारिता के जुनून को समझा और उनको नौकरी मे बहाल ही नहीं किया वरन उन्हें कस्तूरबा हॉस्पिटल से स्थानांतरण कर के जनसंपर्क विभाग में पदस्थ कर दिया गया I राधेश्याम जी याद करते हुए कहते हैं कि श्री हांडा साहब कहीं भी मिलते थे तो मुझे कहते थे ” ग्रेट मैन ऑफ इंडिया “और उनकी कही हुई अतिशयोक्ति आज कहीं ना कहीं कुछ तो सच हो गयी I जनसंपर्क विभाग में राधेश्याम अग्रवाल जी पत्रकारिता के अपने अनुभवों का भरपूर उपयोग किया लेकिन सीमित कार्यक्षेत्र होने के चलते उनका मन उचटने लगा और राधेश्याम अग्रवाल ने वर्ष 2000 में बी एच ई एल से VRS ( स्वेच्छा सेवा निवृति ) का निर्णय ले लिया और पत्रकारिता के वृहद संसार में उड़ने के लिये आजाद हो गये I
पत्रकारिता के साथ साथ जनसंवेदना की यात्रा
नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना के तहत सेवानिवृत्त होने के बाद राधेश्याम अग्रवाल ने स्वतंत्र पत्रकारिता की एवं राज एक्स्प्रेस भोपाल में भी नौकरी की, बाद में दैनिक भास्कर भोपाल में नियमित रूप से नौकरी करने लगे I वरिष्ठ पत्रकार महेश श्रीवास्तव के साथ अपने संबंधों पर राधेश्याम अग्रवाल बताते हैं कि उनसे उन्होंने बहुत कुछ सीखा है, खासकर उनके साथ बिताए हुए वो 15 दिन जब राधेश्याम जी, महेश श्रीवास्तव जी के साथ विश्व हिंदी सम्मेलन में सहभागिता हेतु यूरोप गये थे और उनके सामीप्य ने, उनके साथ जीवन के कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सार्थक चर्चा ने उनके जीवन पर व्यापक प्रभाव डाला I
राधेश्याम अग्रवाल बताते हैं कि उनके जीवन में केंद्रीय बदलाव तब आया, जब वो वर्ष 2002 में मुंबई गये, परेल स्टेशन के 2 नंबर प्लेटफॉर्म पर उतरा, मुझे 1 नंबर पर जाना था और में पता नहीं किस धुन में पटरियों से ही 1 नंबर प्लेटफॉर्म की तरफ बढ़ गया, दूसरी तरफ से एक सुपर फास्ट ट्रेन आ रही थी, मुझे मालूम ही नहीं चला, एक सज्जन ये सब देख रहे थे, वो मेरे पास आकर चिल्ला कर बोले कि तुम बच गए नहीं तो तुम्हारे परखच्चे उड़ जाते, राधे श्याम अग्रवाल वो घटना याद कर के सिहर उठे और बोले कि वो प्रभु स्वरूप सज्जन ने मुझे जोर से डांटते हुए कहा कि 2 सेकंड में तुम लावारिश लाश बन जाते I
जीवन के सार्थक उद्दैश्य की प्राप्ति और सेवा का संकल्प
राधेश्याम अग्रवाल बताते हैं कि झोला टांगे हुए उस देव स्वरूप सज्जन के शब्द ” लावारिश लाश ” मेरे जहन में गूंजते रहे , मैं भोपाल आ गया, चूंकि में दैनिक भास्कर में अपराध से जुड़ी खबरों की रिपोर्टिंग करता था , तो पुलिस विभाग में पहचान होने के चलते, मेरी मुलाकात डॉ डी के सत्पथी से हुई जो कि मेडिको लीगल इंस्टिटूट के निदेशक थे, डॉ सत्पथी का बहुत योगदान है मेरी जिंदगी को सार्थक बनाने में, डॉ सत्पथी के अनुसार लावारिश लाशों की भोपाल में बहुत दुर्दशा है, पुलिस चंदा कर कर के लावारिश लाशों का जैसे तैसे ठेलों में अंतिम क्रिया कर्म करती है I राधेश्याम अग्रवाल के चेहरे पर सुकून का भाव था, वो आगे बताते हैं कि डॉ सत्पथी गंभीरता पूर्वक बोले राधेश्याम तुम अपने जीवन को बदल सकते हो, लावारिश लाशों के अंतिम कफन – दफन का जिम्मेदारी ले लो, जीवन को सार्थकता दो, निष्काम सेवा कार्य से बड़ा कोई सार्थक कर्म नहीं और उसके बाद राधेश्याम अग्रवाल ने कुछ मुट्ठी भर लोगोँ के साथ मिलकर जनसंवेदना कल्याण समिति की स्थापना की, अग्रवाल जी बताते हैं कि जैसे मेरे अंदर पत्रकारिता का जुनून था वैसे ही मेरे जीवन में सामाजिक सरोकार का, निस्वार्थ जन सेवा का पागलपन सवार हो गया, मेरे साथ लोग जुड़ते गये और संस्था शुरू करने के समय कई देवदूत के रूप में मेरे मित्र मिले और उन्होंने 50000 से 1 लाख तक का अमूल्य सहयोग कर दिया और कभी पैसे वापस नहीं मांगे , उनके सहयोग को मैं कभी भूल नहीं सकता, अगर वो मेरा उस समय सहयोग नहीं करते तो शायद मैं जनसंवेदना को इस मुकाम तक नहीं पहुंचा पाता I इसी भावना के चलते 2007 में भोपाल के डॉक्टर्स क्लब ने मुझे जनसंवेदना कल्याण समिति के कार्यालय हेतु जेल घाटी, जहांगीराबाद में जमीन दी I
मध्य प्रदेश में अपनी तरह की एकमात्र संस्था जनसंवेदना
जनसंवेदना संस्था के अध्यक्ष राधेश्याम अग्रवाल बड़े ही ठहराव के साथ बताते हैं कि मध्यप्रदेश में उनकी संस्था अपने तरह की एकमात्र संस्था है जो लावारिश लाशों का अंतिम संस्कार करती है, भोपाल के किसी भी क्षेत्र में कहीं भी पुलिस को लावारिश शव मिलता है तो जनसंवेदना को सूचित कर दिया जाता है, उसके बाद पुलिस और जनसंवेदना संस्था मिल जुल कर लाश का कफन – दफन करते हैं, राधे श्याम जी बताते हैं वो पिछले 20 सालों में लगभग 9500 लाशों का जनभागीदारी से अंतिम संस्कार कर चुके हैं I
जनसंवेदना संस्था को मध्य प्रदेश शासन द्वारा उत्कृष्ट संगठन 2013 में नवाजा जा चुका है और दर्जनों सामाजिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है I
अपने साथ आईडेंटिफिकेशन अवश्य रखें – राधेश्याम अग्रवाल
अग्रवाल जी जनता को आगाह करते हुए कहते हैं कि कि हमेशा सभी को अपने साथ कोई ना कोई आईडेंटिफिकेशन अवश्य रखना चाहिए, जब लाश के साथ उसका आई कार्ड होता है तो उसके परिजनों तक पहुंचने का अवसर होता है, दूसरा अगर परिजनों तक नहीं भी पहुँच पाते हैं तो उसका नाम, धर्म आदि तो पता लग ही सकता है, उसके आधार पर धर्मानुसार अंतिम संस्कार किया जाता है, राधेश्याम जी आगे बताते हैं कि अगर लाश से कोई परिचय पत्र प्राप्त नहीं होता तो वो लाश लावारिश हो जाती है और फिर उस लाश को दफनाया जाता है I
मानव सेवा ही एकमात्र लक्ष्य
राधेश्याम अग्रवाल का सफर तो लावारिश लाशों के अंतिम क्रिया से शुरू हुआ था , लेकिन अब उनके जीवन का एक मात्र लक्ष्य है सेवा, वो बताते हैं कि भोपाल में कहीं भी किसी भी अत्यंत गरीब परिवार में किसी की मृत्यु होती है और अगर हमको सूचना आती है तो हम उसका विधि विधान से अंतिम संस्कार करवाने की व्यवस्था करवाते हैं I
प्रतिभावान बच्चों की सहायता
राधेश्याम अग्रवाल की संस्था प्रतिभावान बच्चों के भविष्य को लेकर कटिबद्ध है, जो बच्चे प्रतिभावान तो हैं लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर होने के चलते उनके पढाई में व्यवधान आता है तो संस्था उनकी पढाई का पूरा व्यय वहन करती है I अगर किसी की भी नजर में कोई ऐसे प्रतिभावान बच्चे हो तो वो जनसंवेदना से संपर्क कर सकते हैं, संस्था उनकी निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था करती है I
जनसंवेदना का बीड़ा ” देहदान – महादान ”
राधेश्याम अग्रवाल बताते हैं कि देह दान बहुत लोग करना चाहते हैं और अनेक लोगों की सोच होती है कि मृत्यु के बाद भी उनकी देह किसी जरूरतमंद के काम आ सके लेकिन सच तो ये है कि देह दान की प्रक्रिया को अधिकांश लोग समझ नहीं पाते हैं और सोचते ही रह जाते हैं , इसके लिये जनसंवेदना ने बीड़ा उठाया है, हमारी संस्था लोगों को देह दान करने के लिये प्रेरित करती है , अगर वो संस्था तक आ सकते हैं तो उनका संस्था में देह दान का फॉर्म भरवाते हैं और अगर किसी कारणवश वो संस्था तक नहीं आ पाते हैं तो हम उनके घर जाकर उनका फॉर्म भरवाते हैं I
राधेश्याम जी आगे बताते हैं कि मृत शरीर की देह से 36 प्रकार के ऑर्गन, चमड़ी, आँखे आदि से दूसरों को नया जीवन मिल सकता है, दो लोगों को जीवन में रोशनी मिल सकती है, किडनी, लिवर , हृदय आदि का ट्रांसप्लांट हो सकता है, एक मृत देह कई लोगों को के लिये जीवन दायी हो सकती है I
निराश्रितों , गरीबों को भोजन वितरण
जनसंवेदना कल्याण समिति नियमित रूप से उपासना स्थलों, अस्पतालों जैसे AIIMS में गरीब मरीजों और उनके परिजनों को भोजन वितरण करती है , जनसंवेदना संस्था की गाड़ी नियमित रूप से AIIMS अस्पताल के गेट नंबर 3 पर भोजन वितरण करती है I भोजन वितरण जन भागीदारी से होता है, जनसंवेदना संस्था के सेवक संस्था से जुड़े लोगों को , आम जनता को, उनके प्रिय परिवार जनों के जन्मदिवस, वर्ष गाँठ और पुण्य तिथि पर जरूरतमंद लोगों की मदद करने हेतु प्रेरित करते हैं और इस तरह भोजन वितरण अनवरत रूप से चलता रहता है I
वस्त्र वितरण और गरीब कन्याओं की शादी का प्रबंध
राधेश्याम अग्रवाल जी सिर्फ लावारिश लाशों का अंतिम संस्कार ही नहीं करते , वो गरीब प्रतिभावान बच्चों को निशुल्क शिक्षा का प्रबंध ही नहीं करते हैं, वो लोगों को देह दान के लिये प्रेरित ही नहीं करते हैं , वो निशुल्क भोजन का वितरण ही नहीं करते बल्कि वो गरीब कन्याओं के हाथ पीले करने का प्रबंध भी करते हैं , राधेश्याम अग्रवाल के अनुसार जनसंवेदना संस्था कई कन्याओं का विवाह संपन्न करा चुकी है I जनसंवेदना संस्था वस्त्रों का संकलन करती है और अत्यंत गरीब लोगों को वस्त्रों का वितरण करती है , राधेश्याम जी के अनुसार उनकी संस्था ऐसे स्थानों को चिन्हित करती है जहां निराश्रित, असहाय या बहुत गरीबों का बसेरा होता है , वहां कपड़ो का वितरण किया जाता है I
पोर्टेबल मर्चरी बॉक्स और मुक्ति वाहन
जनसंवेदना कल्याण समिति पोर्टेबल मर्चरी बॉक्स और मुक्ति वाहन सेवाएं 24 घंटे उपलब्ध कराती है I सेवाएं हेतु संस्था के दिये हुए नंबर पर संपर्क करें I
बचपन होम्स – प्रस्तावित भवन
जनसंवेदना कल्याण समिति शीघ्र ही बचपन होम्स प्रारंभ किये जाने का प्रयास कर रही है, जिसको जनभागीदारी से संचालित किया जायेगा, जिसमें 3 से 6 वर्ष तक के शिशुओं का सरंक्षण कर पालन पोषण किया जायेगा I बचपन होम्स का बहुमंजिला भवन प्रस्तावित है, भवन निर्माण हेतु रुपए 1100.00 की राशि सहयोग स्वरूप प्रेषित कर सकते हैं I
जनभागीदारी
जनसंवेदना कल्याण समिति का पूरा सेवा कार्य जन भागीदारी से चलता है, राधेश्याम अग्रवाल जी के अनुसार आज जनसंवेदना से हजारों दानदाता पूरे हिंदुस्तान से जुड़े हैं, कश्मीर से कन्याकुमारी तक सभी जगह से उनके पास सहयोग राशि आती है, विभिन्न संस्थाएं भी CSR के तहत उनको अनेकों प्रकार से जरूरत के संसाधन उपलब्ध कराती रहती हैं I भोपाल के गणमान्य नागरिक भी संस्था को दान देने हेतु हमेशा आगे रहते हैं I
हमारे आग्रह करने पर जनसंवेदना परिवार की महिला सेवाकर्मियों ने हमें कुछ सम्मानीय दान दाताओं के नाम बताये ;
1. पंजाब नेशनल बैंक : वर्ष 2008 में बस प्रदान की
2. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया : मारुति वेन डोनेट की
3.. श्री एस. एन गुप्ता ( कमला नेहरू स्कूल ) भोपाल : वर्ष 2010 में मारुति वेन जनसंवेदना संस्था को प्रदान की
4. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया : वर्ष, 2011 , टेम्पो ट्रेवलर संस्था को डोनेट की
5. मेघराज जैन, पूर्व सांसद
6. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया : वर्ष 2024 , बोलेरो New + एंबुलेंस संस्था को डोनेट की
7. राम विलास त्रिपाठी
8. गोविंद गोयल
9. डी के कोहली
10. रफीक खान सिग्मा इंडस्ट्री
11. संजय सेनगुप्ता एयर टेल
जनसंवेदना संस्था के सम्मानीय नियमित दानकर्ता एवं सरंक्षक
1. अनुपम राजन IAS
2. सुषमा सिंह IAS
3. लखनलाल IPS
4. अतुल सिन्हा IAS
जनसंवेदना कल्याण समिति को अंशदान चेक या कोर बैंकिंग द्वारा कर सकते हैं :
PAN No : AATJ9091 Regd Under CSR
PNB Account : 1257000199952622
SBI Account : 3066515090901
IFSC Code : SBIN0007932
जनसंवेदना कल्याण समिति को मिलने वाला हर अंशदान धारा 80 – G के अंतर्गत कर मुक्त है I
संपर्क
जनसंवेदना कल्याण समिति
डॉक्टर्स क्लब भवन, सी आई कॉलोनी,
जहांगीराबाद, भोपाल
फोन : 0755- 2576007
मोबाइल :98260 13975
ईमेल : jansamvedna.bpl@gmail.com
Web : www.jansamvedna.org
मुक्तहस्त से सहयोग कर सेवा कार्य में सहयोगी बनें
