“मध्यप्रदेश निर्माण भवन में हो रहा अधिकारियों का निर्माण”?
“मध्यप्रदेश निर्माण भवन में हो रहा अधिकारियों का निर्माण”?
(व्यंग्य : राजेन्द्र सिंह जादौन)
भोपाल का “निर्माण भवन” अब सिर्फ़ इमारतें नहीं, अधिकारी भी गढ़ रहा है वो भी ऐसे कि पत्थर भी शरमा जाएं। जहाँ पहले ईंट-गारा से पुल बनते थे, अब सोने-चाँदी के पुल रिटायरमेंट के बाद घरों तक जुड़ जाते हैं।
पूर्व मुख्य अभियंता मेहरा जी के यहाँ जब लोकायुक्त का छापा पड़ा तो प्रदेश की नौकरशाही की रगों में जैसे एक साथ “सीमेंट मिक्सर” घूम गया। तीन करोड़ का सोना, सत्रह टन शहद और नोटों की गठरियों ने बता दिया कि “निर्माण भवन” दरअसल “निधि निर्माण भवन” है।
कहते हैं, मेहरा साहब का नाम तो बस एक ट्रेलर है, पूरी फ़िल्म अभी रिलीज़ नहीं हुई है। कई “बागड़ बिल्ले” अब बिलों में नहीं, बंगले में पल रहे हैं और हर किसी के पास अपना-अपना “शहद वाला फार्महाउस” है। शहद भी ऐसा कि मधुमक्खियाँ भी शर्मिंदा हो जाएं उन्हें मालूम ही नहीं था कि इंसान इतना मीठा जाल भी बुन सकता है।
सरकारी फ़ाइलों में जो पुल और सड़कें दिखती हैं, वो ज़मीन पर नहीं, शायद बैंक लॉकरों में बनी हैं। जिन ठेकेदारों की बोली सबसे ऊँची जाती है, वहाँ बोलने की ज़रूरत नहीं बस रिश्ता गाढ़ा होना चाहिए।
छापे के बाद से ही “निर्माण भवन” में सन्नाटा है कोई फाइल खोलने से पहले आस-पास देखता है कि कहीं कैमरा तो नहीं, कोई अफसर किसी दूसरे को “चाय पिलाने” से पहले पूछ लेता है “शुगर तो नहीं है ना?”क्योंकि अब शहद से भी डर लगने लगा है।
जनता पूछ रही है अगर एक रिटायर अधिकारी के यहाँ इतना मिला, तो जो अभी सेवा में हैं, उनकी सेवा किस देवता को प्राप्त होगी?
प्रदेश का निर्माण हो न हो, पर “अधिकारियों का निर्माण” दिन-ब-दिन मज़बूत होता जा रहा है नींव नीचे जनता की है, और मंज़िल ऊपर भ्रष्टाचार की।
