संघ का शताब्दी वर्ष
संघ का शताब्दी वर्ष
संघ का स्वयंसेवक निष्ठावान, मेहनती और ईमानदार होता हैँ, उसे जो भी कार्य दिया जाये उसे पूरी निष्ठा के साथ पूरा करता हैँ, उसे संघ की शाखाओ मे ऐसे ही संस्कार मिलते हैँ, ये संस्कार ही उसे शीर्ष पर पंहुचाते हैँ, जो व्यायाम हम वृद्ध होने पर करते हैँ संघ इसे बाल्यवस्था, युवावस्था मे करने का अभ्यास करा देते हैँ. इस कारण संघ का स्वयंसेवक स्वस्थ रहता हैँ. संघ की शाखाओ मे कभी राजनीती की बाते नहीं बताई जाती हैँ वरन आप अपने पसंद के राजनैतिक दल मे जा सकते है. बोलने भाषण देने की कला संघ से ही आती हैँ, संघ के आद्द संघचालक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार स्वतंत्रता आंदोलन मे दो बार जेल गए उन्हें एक साल और 9 महीने की सजा हुयी थी, अटल जी का भी स्वतंत्रता आंदोलन मे योगदान से इंकार नहीं किया जा सकता, युद्ध और आपदा की स्थिति मे संघ के स्वयंसेवक सबसे आगे आते हैँ. संघ का प्रचारक एक ऋषि हैँ. उसके पास केवल दो या तीन जोड़ी कपडे होते हैँ, वे भी संघ के स्वयंसेवक उन्हें भेट देते हैँ, भोजन रोज अलग अलग स्वयंसेवक के यहाँ होता हैँ, प्रचारक उच्च शिक्षित होते हैँ, दिन भर संघ के कार्य मे लगे रहते है, अपने परिवार से बहुत दूर रहते हैँ, संघ अपने स्वयंसेवक को आगे बढ़ाने मे अपनी शक्ति लगाता हैँ. आज संघ को 100 वर्ष हो गये, इस अवधि मे संघ ने बहुत यातना सहन की, पहली बार सरकार की तरफ से 1962 मे नेहरू जी ने गणतंत्र दिवस की परेड मे भाग लेने बुलाया था, महात्मा गाँधी ने संघ को निकट से देखा और उसके कार्य को सराहा हैँ. संघ की बहुत गतिविधियों चलती हैँ, जैसे शिक्षा के क्षेत्र मे सरस्वती नंदिर, श्रमिक क्षेत्र मे, भारतीय मजदूर संघ, वनवासी कल्याण, विश्वहिंदू और विद्यार्थी परिषद आदि, संक्षेप कहाँ जाए तो यह कहाँ जा सकता हैँ देश का हर 10 वा व्यक्ति संघ के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संघ से जुड़ जाता हैँ. मै जानता हुँ कि इस पर काफ़ी आलोचना होंगी क्योंकि आलोचनाकर्ता ने कभी संघ की गतिविधियों को समीप से देखा ही नहीं हैँ. यदि समीप से देखे तो निश्चित ही संघ उनके लिये सराहनीय होगा. राम कस्तूर
