सड़क किनारे बचपन

सड़क किनारे बचपन
उसके बस्ते में भरी थीं
ढेरों जिम्मेदारियाँ
किताबों के लिए उसमें जगह ही कहाँ थी।
उसके छोटे हाथों में
सपने दबे हुए थे,
और छोटे कंधों पर
दुनिया का बोझ।
ज़िम्मेदारियों ने
बस्ते में भर दी
पन्नियाँ, रद्दी, प्लास्टिक,
खाना नहीं, भूख…
हर रोज़ का संघर्ष
उसके छोटे पैरों के नीचे बिछा है।
सड़क उसकी पाठशाला है,
सड़क की धूल उसकी किताब,
और कचरा उसके शिक्षक।
सिंपल जीवन के छोटे-छोटे टुकड़े
उसके हाथों में आकर कहानी बन जाते हैं।
हर बोतल, हर कागज़ का टुकड़ा
उसकी नजरों में मूल्य रखता है,
लेकिन उसकी आँखों में
छुपा रहता है सपना
एक ऐसी दुनिया का, जहाँ वह भी पढ़ सके,
जहाँ वह भी हँस सके।
सुबह की हल्की धूप,
शाम की थकान,
बारिश में भीगे दिन,
सब उसके हिस्से हैं।
और कोई नहीं पूछता
कि इस मासूम बच्चे का मन
कितना भारी है।
भूख उसके रोज़ का साथी है।
रद्दी और कचरा
उसके खेलने के खिलौने हैं।
हर कदम एक संघर्ष,
हर मुस्कान हिम्मत की कहानी।
और उसके सपनों की किताब
हर दिन टूटती और बुनती जाती है।
यह बस्ता केवल बोझ नहीं है,
यह उसकी कहानी है,
इस समाज की कहानी है।
जहाँ बच्चे पढ़ने के बजाय
सड़क किनारे जीवन बीन रहे हैं।
जहाँ मासूमियत
कचरे की गंध और धूल में गुम हो जाती है।
फिर भी वह चलता है।
सपनों की ओर,
उम्मीद की ओर।
शायद कोई दिन आएगा,
जब उसकी उँगलियाँ किताब थामेंगी,
न कि केवल रद्दी और प्लास्टिक।
सड़क किनारे बचपन
एक कहानी है,
जिसे सुनना और समझना जरूरी है।
क्योंकि हर बोझ के पीछे
एक मासूम हृदय धड़कता है,
हर रद्दी में
एक सपना दबा है,
और हर भूख में
एक जीवन की चुनौती छिपी है।
और हम
जो सड़क की सुरक्षित राहों पर चलते हैं,
जो घरों और स्कूलों में सुरक्षित हैं
हमें देखना होगा,
समझना होगा,
और इस मासूम बचपन को उसकी हक़ीकी दुनिया देने का प्रयास करना होगा।
