पत्रकारिता का मख़ौल उड़ाता मध्यप्रदेश
*झोला छाप ख़बरी*
*पत्रकारिता का मख़ौल उड़ाता मध्यप्रदेश …?*
वैसे तो मध्यप्रदेश सब से सुंदर और शान्त प्रदेश है ..? इसलिए इसे शांति का टापू भी कहा जाता है …?
लेक़िन यहाँ के अधिकतर पत्रकार ज्ञापन ,और रूटीन खबरों को ही पत्रकारिता कहते है ?
चार लाईन लिखी स्क्रिप्ट और नेता जी के तलवे चाटने और जी हुजूरी के बाद मिली एक बाईट को बड़ी खबर मानते है …?
आज हमारे भोपाल के एक वरिष्ठ पत्रकार राधेश्याम अग्रवाल को भी ये लिखना पड़ा कि “भांड गिरी पत्रकारिता देखनी हो तो मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में देखें लोकसभा के चुनाव के दौरान यूट्यूब चैनल एवं प्रिंट मीडिया के आलेख आपको वास्तविकता बता देंगे आप सहमत है कि नहीं”
आज जिसतरह की पत्रकारिता डिग्री धारी कर रहे है उसे भांड गिरी की परिभाषा दी जा सकती है …?
पत्रकारिता निष्पक्ष हो समाज के हित के लिए हो सरकारी कुर्सी पर बैठे चोरों और लुटेरों की कहानी हो तो पत्रकारिता है …? वर्ना ट्रान्सफ़र और प्रमोशन की दलाली के लिए तो ढेरो अनपढ़ ,गुंडे ,बदमाश ,माफ़िया ,पत्रकार बनकर घूम ही रहे है …?
भ्रष्टाचार में लिप्त नेता ,बाबा,पांडे , भू माफिया ,खनन माफिया ,मंत्री इनके साथ मिलकर चेनल और अखबार चला ही रहे है …?
अगर सच मे पत्रकार हो तो ज़मीर को ज़िंदा रखो ,अपनी कलम के समझौता नही समझदारी दिखाओ ….?
मंत्री ,मिनिस्टर,नेता,अधिकारीयो चाटने से अच्छा है कि चाय की होटल खोल कर भजिये बनाओ …?
या प्रसिद्ध लेखक की ये बात सही मानी जाये ….?
“कोठे की तवायफ़ और एक बिका हुआ पत्रकार दोनों एक ही श्रेणी में आते हैं, लेकिन इनमें तवायफ़ की इज़्ज़त ज़्यादा होती है” ये कथन किस प्रख्यात लेखक का है?
