जिन पठारों में घांस नही उगती थी वे आज हरियाणा,पंजाब को मात दे रहे है।

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शाजापुर,आगर, गुना,राजगढ़ के जिन शुष्क, मृत पत्थरों में कभी घांस नहीँ उगी। वे विश्व विख्यात जल तीर्थो-मोहनपुरा,कुंडालिया, रिंसी, जैसे विशाल बांधो के बूते अब गेंहू सहित रवी, खरीब की अन्य फसलों के उत्पादन में पंजाब,हरियाणा को मात दे, किसानों की आर्थिक समृद्धि में जबरजस्त योग दे रहे है। हालात ये है कि गेहूं कटाई की मजदूरी 03 सो से बढ़ कर 05 सो तक आ पहुची है। 01 बीघा की कटाई के बदले किसानों को 01.30 से लेकर 01.50 किवंतल तक चुकाना पड़ रहा है। ऊपर से लेबर के 10 नखरे झेलने की मजबूरी अलग। ये जिले काम करने वालों की तंगी से जूझ रहे है।
स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलने से राजस्थान, गुजरात पलायन की गति 20% ही रह गयी। अब से 01 दशक पूर्व राजगढ़ के हजारों लोग गेंहू की कटाई के लिए विदिशा,अशोकनगर, रायसेन, नर्बदापुरम, सीहोर आदि जाते रहे है। इस लेबर को चेतवे कहते थे। इस मौसम में चेतवो के टुल्लरो से बस स्टैंड,रेलवे स्टेशन खासे गुलजार रहते थे। जब ये मई के प्रारंभ में वापसी करते थे तब ये साल भर का गेंहू का बोझा साथ लेकर लौटते थे।
पर अब सब कुछ बदल चुका है। अब चेतवे नाम मात्र को जाते है।इस क्रांतिकारी बदलाव की नींव में है करीब 08 हजार करोड़ की लागत वाली 2.70 लाख हेक्टर सिंचाई क्षमता की मोहनपुरा, कुंडालिया सिंचाई प्रणाली। इन दोनों जल तीर्थो ने आगर, शाजापुर,राजगढ़ के पठारों में जान डाल दी। कभी घास तक के लिए तरसाने वाले ये पठार जम कर गेंहू सहित रवी,खरीब की अन्य फसलों के अलावा बतौर तीसरी फसल मूंग, सब्जियों को उगल मस्त कर रहे है।
ये परिवर्तन केवल 10 साल में ही आ गया। इसका असर जमीन की कीमतों में आए उछाल के अलावा आगर, शाजापुर,सुसनेर, नलखेड़ा,सारंगपुर, पचोर, कुरावर, सीहोर, बैरसिया, सुठालिया, लटेरी, ब्यावरा, जीरापुर, खिलचीपुर, माचलपुर, गोघटपुर, राजगढ़, खुजनेर,छापीहेड़ा, चाचौड़ा, बीनागंज,राघोगढ़,कुंभराज के बाजारों पर पड़ा। इन नगरों, कस्बो में कदम कदम पर खुले इलेक्ट्रिक उपकरणों, चार, दो पहिया वाहनों, टेक्टरों, ज्वेलर्स के शो रूम्स, माल आदि पर लगी भारी भीड़ अटूट आर्थिक समृद्धि की गाथा गाते है। उल्लेखित नगरों, कस्बो में 100 रुपए का पेट्रोल फूंक 05 रुपये की चाय पीने बिना नागा रोज आते है।
Cm मोहन यादव तक पठारों के चहकने,महकने से खासे गदगद है। हालिया राजगढ़ प्रवास के दौरान पठारों की बदली तस्वीर, तकदीर का विस्तार से जिक्र करते हुए cm यादव ने कहाकि किसी काल मे 05 हजार बीघा में भी कोई पूछने वाला आज उसी जमीन को 10 लाख बीघा में खरीदने को उतावला है। इतने ऊंचे दामों में भी समझदार, दूरदर्शी किसान बेचने को तैयार नही है। उसकी वजह है। लहराते रवी फसलों का सागर।
अभी तो कुंडालिया, मोहनपुरा के प्रताप से किसानों की आर्थिक तस्वीर बदली है। अभी पार्वती पर 1900 करोड़ की लागत से 45 हजार हेक्टर सिंचाई क्षमता का बन चुका रिंसी बांध, इतनी ही लागत से इतनी ही सिंचाई सिंचाई क्षमता की सुठालिया, कुंभराज पर प्रस्तावित सिंचाई परियोजना। सुठालिया परियोजना का काम तेजी से जारी है। नदी से नदी जोड़ने से पार्वती,काली सिंध नदियां सदानीरा हो जाएगी। सूखा और पेयजल संकट अतीत में बदल जायेगा। राजगढ़,शाजापुर,आगर, गुना,भोपाल,विदिशा के पेयजल संकट ग्रस्त हजारों गांवों के कंठ तर करने के लिए इन बांधो के अलावा अन्य बांधो से पाइप लाइन डाली जा रही है। जगह जगह ऊचे पानी के विशाल टैंक बन रहे है।
ब्यावरा जैसे अभिशप्त किंतु जिंदा नगर के कंठ तर करने के लिए 40 करोड़ की लागत से पेयजल योजना को हरी झंडी दी जा चुकी है। 2026 में इसका लाभ मिलना तय है। कुरावर,खुजनेर,माचलपुर, पचोर,सारंगपुर, खिलचीपुर, कालीपीठ जैसे परम्परागत पेयजल संकट ग्र्स्त कस्बे,नगर भी कंठ तर होने से मस्त है।
Cm मोहन यादव ने सांसद रोडमल नागर, राज्यमंत्री नारायण सिंह पवार, गौतम टेटवाल, विधायक अमर सिंह यादव, मास्टर हजारीलाल दांगी, मोहन शर्मा, के कर्मयोग को राजगढ़ के विकास,निर्माण के हित मे मील का पत्थर बताया।
Cm यादव ने राजगढ़ में बड़े उद्योगों की स्थापना और फिजूल पड़ी हजारों एकड़ सरकारी जमीन का रोजगार मूलक दोहन पर बल दिया। उद्योग विभाग इस दिशा में सक्रिय भी है। उम्मीद है। अम्बानी जैसे अन्य उद्योगिक घराने राजगढ़ के बेरोजगारों के लिए व्रहस्पति साबित होंगे।
Cm यादव के मुताबिक रामगंज-भोपाल रेलवे लाइन राजगढ़,भोपाल, आगर के यातायात, परिवहन,विकास को पंख लगा राहत देगी। कृषि, सिंचाई, शिक्षा, उच्च, विधि, चिकित्सा, तकनीकी शिक्षा,पशु पालन,मत्स्य पालन, मानव संसाधन, महिला बाल कल्याण, कौशल में भी राजगढ़ में सिरमौर बनने की क्षमता,ऊर्जा है। इस क्षमता, ऊर्जा के दोहन में बीजेपी का एक एक प्रहरी सजग, समर्पित है।
सनद रहे 2005 तक लोग राजगढ़ ने बेटी ब्याहने से कतराते थे। पर अब ललायित रहते है। राजगढ़ की गिनती जल विहीन, व्रक्ष विहीन यानी अभिशप्त जिलों में होती थी। जबकि इसी राजगढ़ ने 1984 में राजा दिग्गी को राष्ट्रीय,अंतरराष्ट्रीय पहचान, रुतबा दिया था। मगर राजा दिग्गी अपनी कर्म भूमि से न्याय करने में विफल रहे।

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