पहलगांव या दूसरा पुलवामा ??
यह वह जगह है जहां आतंकियों ने 18 निर्देश लोगों की हत्या कर एक बार फिर इंसानियत को शर्मसार कर दिया है,, इस जगह को मिनी स्विट्जरलैंड के नाम से जाना जाता है,, यहां पहुंचने के लिए लगभग 2 घंटे घोड़े पर बैठकर जाना पड़ता है,, बहुत शांत और सुकून वाली जगह,,, अगर हम सुरक्षा की बात करें तो,, यहां किसी भी तरह की कोई सुरक्षा व्यवस्था नज़ऱ नहीं आती,, यह हम खुद अपनी आंखों से देख चुके हैं अब बात करते हैं यहां पर हुए आतंकी हमले की,, इस हमले को लेकर मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार परवेज इकबाल साहब ने जो लिखा है उसे पर जरूर गौर करिये,,,,
पहलगांव या दूसरा पुलवामा ??
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कश्मीर मुद्दे को देखने के लिए आपके पास कई नज़रिए हो सकते हैं…सामाजिक/राजनैतिक/भौगोलिक या फिर धार्मिक…किसी भी नज़रिए के पक्ष और विपक्ष में लोगों की राय हो सकती है…कौन सही है या कौन गलत…इसे हम छोड़ देते हैं…आप कश्मीर मुद्दे को किसी भी नज़रिए से देखते हों लेकिन इस बिंदु से तो सभी सहमत होंगे कि धारा 370 हटना कश्मीर समस्या के जन्म से अब तक सबसे बड़ी घटना थी…एक ऐसा ज्वलंत मुद्दा जो दशकों से सुलग रहा था…ऐसा लगा था मानो धारा 370 के हटने से कश्मीर में राजनैतिक सामाजिक विस्फोट होगा…कश्मीर में आतंक फैलाने वाले संगठन बर्फ की घाटी में आग़ बरसा देंगे…लेकिन निसंदेह मोदी सरकार की सफल रणनीति और कूटनीतिक प्रयासों से कश्मीर लगभग शांत रहा…कुछ दिनों की हलचल के बाद हालात सामान्य हो गए…कश्मीर की ज़िन्दगी अपनी पटरी पर लौटने लगी…सभी राजनैतिक आशंकाओं को खारिज करते हुए घाटी में कोई बड़ी आतंकवादी घटना नहीं घटी…ऐसे में सवाल यह उठता है कि कश्मीर के जो अलगाववादी धारा 370 हटने पर लगभग शांत रहे वो अब सामान्य हालात में पहलगाम जैसी घटना को क्यूं अंजाम देंगे ??…जो लोग कश्मीर को जानते हैं वो शायद इस बात जानते होंगे कि कश्मीर घाटी में जिन दिनों बंदूक की गूंज और बारूद की गंध थी तब भी पर्यटक कभी निशाना नहीं बनाए गए…पर्यटकों को कश्मीरी अपनी रोज़ी रोटी समझते हैं…बर्फीली वादियों की सैर करने वाले हों या अमरनाथ के दर्शनार्थी…आम कश्मीरी ने सब को सर माथे पर बैठाया है…अभी कुछ दिन पहले बर्फीले तूफान में फंसे लोगों के लिए कश्मीरियों ने जैसे अपने घर मकान और मस्जिदें खोली थीं अभी तो उन सुर्खियों की स्याही भी नहीं सुखी होगी…और पहलगाम तो सुलगते कश्मीर के वक्त भी शांत इलाका हुआ करता था…फिर भला आज यह कैसे…? घटना घटी है…खून बहा है…लेकिन यह बड़ा सवाल है कि खून बहाया किसने है…?
लेकिन क्या इस घटना की साजिश करने वालों का कभी पर्दाफाश हो सकेगा ? 14 फरवरी 2019 को हुए पुलवामा कांड पर तत्कालीन राज्यपाल सत्यपाल मलिक काफी कुछ कह चुके हैं…साजिश को लगभग बेपर्दा भी कर चुके हैं…पुलवामा का राजनैतिक फायदा किसे हुआ यह सारा देश जानता है…और इस घटना का भी फायदा किसे मिल रहा है इस पर देश को विचार करना चाहिए…अन्य पहाड़ी इलाकों द्वारा कश्मीर की पर्यटन कारोबार को बर्बाद करने की साजिशों से भी शायद ही कोई अंजान हो..भले ही यह मौजूदा घटना का शायद कमज़ोर और बचकाना पहलू हो…लेकिन दुश्मन की बर्बादी की साजिश रचने की हैसियत न होने पर भी दुश्मन की बर्बादी पर खुश होना भी तो इस देश की परम्परा बनता जा रहा है…साम्प्रदायिक रंग देकर अपने वोटबैंक को धार्मिक गुंडों और मूर्ख अंधभक्तों की फौज में तब्दील करने की कोशिशें सर्वविदित हैं ही…विकासपुरुष की लोकप्रियता में गिरावट की भरपाई कैसे की जाती है इससे कोई अनभिज्ञ नहीं है…एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी याद रखना चाहिए कि धारा 370 हटने के मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 23 दिसंबर 2023 को केंद्र सरकार को आदेश दिया था कि कश्मीर में 30 सितंबर 2024 से पहले चुनाव करवाए जाएं और राज्य का दर्ज भी जल्द बहाल किया जाए…सरकार ने विधानसभा चुनाव तो करवा दिए…लेकिन केंद्र सरकार खास तौर पर भाजपा कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देना नहीं चाहती…वैसे भी देश में नफरत की सियासत करने वालों के लिए कश्मीर की अशांति हमेशा से राजनैतिक फायदे का विषय रही है…वर्तमान घटना को किन ज़लीमों ने अंजाम दिया है यह जांच का विषय है…मारने वालों या मरने वालों धर्म मज़हब क्या है यह सवाल अपनी जगह है….लेकिन इस घटना को अंजाम देने वाले कारण…इस घटना के पीछे छुपे मास्टरमाइंड का मूल मकसद तो इस मुल्क में नफरत का ज़हर घोलना ही है….जिस आई टी सेल और मीडिया की अतिरंजित खबरें सार्थक करती दिख रही हैं….देश के नफरती आई टी सेल के पिछले कुछ दिनों से कश्मीर पर आ रही कुछ पोस्ट…और घटना के तुरंत बाद आई टी सेल द्वारा अपने चिरपरिचित अंदाज़ में सोशल मीडिया पर नफरत का ज़हर उगलना…हालांकि ताज़ा घटना में मारे गए लोगों में मुस्लिम भी शामिल हैं लेकिन “नाम (धर्म) पूछ कर मारने की बात कह कर नफरत का खेल खेला जा रहा है….गोदी मीडिया में घटना को पूरी तरह साम्प्रदायिक रूप से अतिरंजित करके दिखाना बहुत से सवाल खड़े करता है…और फिर किसी भी देश में इस तरह की आतंकी घटनाएं क्या उस देश की सरकार का निकम्मापन नहीं है ??
हो सकता है सरकार से यह सवाल पूछने की हिम्मत चंद लोग ही जुटा पाएं…लेकिन यह सवाल नफरती अंधभक्तों को छोड़ कर हर सच्चे देशभक्त के मन में ज़रूर उठ रहे होंगे….और उठना भी चाहिए…क्योंकि लोकतंत्र को ज़िंदा रखने के लिए सवाल उठाना ज़रूरी है..।
परवेज़ इक़बाल
एडिटर:- “इंडिया09”
(HelloDay Media Group)
