श्रीराम कथा के ‘पँचम दिवस’ की कथा सुनाते हुए पूज्य गुरुदेव जी

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जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर पूज्यपाद स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज “पूज्य प्रभुश्री जी” के श्रीमुख से रामलीला दशहरा मैदान, नरेला (दिल्ली) में आयोजित ‘श्रीराम कथा’ के ‘पँचम दिवस’ का कथा सार ।

श्रीराम कथा के ‘पँचम दिवस’ की कथा सुनाते हुए पूज्य गुरुदेव जी कहते हैं कि प्रभु श्रीराम सनातन मंत्र हैं। वह भारत की कालजयी, वैदिक हिन्दू सनातन संस्कृति के उच्चतम प्रतिमान हैं। राम जैसा शील, संयम, मर्यादा, पवित्रता और दिव्य चरित्र और कहाँ? राम भारत के भोर का प्रथम स्वर हैं। राम तारक मंत्र हैं। राम अविद्या और भ्रम-भय के नाशक हैं। यदि राम के नाम का गायन, कीर्तन, वाचन, लेखन हो सके, तो यह जीव के भाग्य का कपाट खोल देता है। राम मुक्ति व मोद प्रदाता हैं। राम जिसके मन-मानस में, चित चेतना, मति-गति, गुण स्वभाव, व्यवहार और आचरण के रूप में प्रतिष्ठित हो जायें, वह मुक्ति का पूर्ण अधिकारी बन जाता है।

माया का अर्थ है – जो नहीं है। लेकिन भास में, आभास में जो प्रतीत होता है। इसलिए राम मायापति हैं। राम हमारे संस्कृति के महानतम, उत्तम, महनीय और पूज्य सत्ता हैं। प्रभु श्रीराम तारक सत्ता हैं।

भगवान का विधान सर्वथा हितकर व सुखकर है। भगवान मंगलकारी है। मंगल का अर्थ उद्धार से है। भगवान का विधान अभ्युदय कारक है। अभ्युदय का अर्थ है – जो हमारे पास है, जो उपलब्ध है और जो वर्तमान है। हमारे प्रकृति के साथ अन्तःसम्बन्ध रहे। हम प्रसन्नता में रहें। प्रकृति के साथ रहें। भौतिकीय उत्कर्ष का अर्थ साधन सम्पन्नता से है। हम कर्तव्यों से विमुख न हो जायें। “यतो अभ्युदय नि:श्रेयस सिद्धि धर्म: ..”। भगवान का विधान जैव-उद्धार के लिए है। श्रेयस का अर्थ है – परलोक की सिद्धि। हमारे यत्न केवल वर्तमान के लिए ही नहीं, बल्कि भविष्य को भी सुधारने के लिए हों। हम मन और इन्द्रियों से ऊँचे उठें। इन्द्रियाँ हमें वस्तु पदार्थों में उलझा कर रखते हैं। अहंकार हमारे एहलौकिक व पारलौकिक उन्नति में बड़ी बाधा है। तप का अहंकार भी बड़ी बाधा है। शरीर के साथ मन और बुद्धि भी तपे। सत्य को समझने की एक प्यास दिखे।

राम महर्षि भारद्वाज के आश्रम में पहुँच गए। राम प्रसन्न हैं कि वनवास का परम लाभ मिलेगा। महापुरुषों का संग, उनके सत्संग और शास्त्र विचार सुनने को मिलेंगे। इसलिए महापुरुषों से पूछें कि उचित-अनुचित क्या है? क्या करें? कहाँ जायें? कौन सा साधन करें? कौन सा मंत्र फलीभूत होगा? फिर प्रभु श्रीराम वाल्मीकि के आश्रम में आए। राम ऋषि के चरणों में साष्टांग प्रणाम करते हैं। साधु का धर्म है – आशीर्वाद देना। चार प्रकार के आश्रम हैं – गृहस्थ आश्रम, ब्रह्मचर्य आश्रम वान्यप्रस्थ आश्रम और संन्यास आश्रम।

श्रीराम विनय भाव से और आदेश की मुद्रा में महर्षि वाल्मीकि के सामने बैठ गए, और मुनि से पूछा कि इन 14 वर्षों में मैं कहाँ रहूँ। कुटिया कहाँ बनाऊँ। महर्षि वाल्मीकि ने कहा कि आप तो अंतर्यामी हैं। आप तीनों लोगों को जानते हैं। फिर भी आप चित्रकूट में निवास करें।

सुमंत्र की प्रतिक्षा में दशरथ हैं। दशरथ को पूर्ण विश्वास है कि चतुर सुजान सुमंत्र राम, सीता और लक्ष्मण को वन का दर्शन करा कर अयोध्या लौटा लायेंगे। जब सुमंत्र राम से कहेंगे कि आपके वन आ जाने से सकल जीव-जन्तु, गौएँ मौन हैं, मानो जड़वत हो गई हैं, वे श्वांस नहीं ले रही हैं। उन्होंने भोजन का त्याग कर दी हैं। तो कदाचित राम वापस अयोध्या लौट आयें। अयोध्यावासी रोदन-चीत्कार कर रहे हैं, सरयू का नीर मानो ठहर गया है। जिस अयोध्या में देवगण आने को लालायित रहते हैं, उस अयोध्या में अब जीवन नहीं है, प्राण नही हैं। माताओं ने जल का त्याग कर दिया है। क्या आप अयोध्या के इस दृश्य को कैसे देख सकते हैं? जब सुमंत्र यह सब समझायेंगे तो कदाचित राम वापस आ जायें। यह सब दशरथ अपने कल्पनाओं में देख रहे हैं। लेकिन राम अपने प्रयोजन की सिद्धि के लिए, ऋषि-मुनियों के दर्शन और दुष्ट असुरों से धरती को मुक्त कराने के लिए मानो अयोध्या को विस्मृत कर दिये हों।

शुभ-अशुभ कर्मों का फल मिलता ही है। और, राजा दशरथ को भी अंतिम क्षणों में अपने किए गए कर्म याद आ रहे हैं। ब्राह्मण बालक श्रवण कुमार और उनके अंधे माता-पिता की अनायास हत्या का पापकर्म उनका पीछा कर रहा है। अब पुत्र वियोग में राजा दशरथ के प्राण जा रहे हैं। राम-राम कहते हुए उनके प्राण निकल गए। अन्तिम क्षणों में जैसी मति होगी, वैसे ही गति होगी। “अन्ते या मतिः सा गति: ..”

गुरु वह जो हरपल आपका कल्याण करें। जो आपके मंगल की सोचें। गुरु वशिष्ठ भरत को संदेश भिजवाते हैं कि प्रिय भरत ! यथाशीघ्र अवध लौटो। भरत रात्रि में भयानक स्वप्न देखते हैं। वे व्याकुल हो गए। अयोध्या में भयानक चुप्पी है। माता कैकेयी ने भरत को सीधे अपने भवन में लेकर गई। पिता दशरथ के मरण एवं भाई राम, लक्ष्मण और सीता के वनगमन का समाचार सुनकर भरत अचेत हो गए, मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़े।

पिता का अंत्येष्टि संस्कार कर भरत राम को अयोध्या वापस लाने का विचार किया। माताओं, गुरु, मंत्री, सामन्तों तथा चतुरंगिणी सेना लेकर भरत राम को मनाने चित्रकूट चल पड़े।

“राम ही केवल प्रेम पियारा ..” चित्रकूट में भरत राम को अयोध्या वापस लौटने के लिए मनाते हैं। भगवान करुणा और प्रेम के अधीन हैं। भरत राम के सामने छोटे बच्चे जैसा बिलखने लगते हैं। प्रभु श्रीराम भरत के इस बात से रिझ गए। “जेहि विधि प्रभु प्रसन्न मन होई। करुणा सागर कीजिये सोई ।।”

भरत जी कहते हैं – हे प्रभु ! आपको जिसमें प्रसन्नता हो, हे करुणा सागर ! आप वही कीजिए। राम ने वही किया, जो भरत चाहते थे। राम जी ने अपनी चरण पादुका भरत को दिया कि मेरे इस पादुका को लेकर जाओ और मेरे प्रतिनिधि के रूप में सिंहासन पर रखकर शासन चलाओ। राम तो नहीं लौटे, लेकिन राम का पादुका लेकर भरत अयोध्या लौटकर प्रभु श्रीराम के चरण पादुका को राज सिंहासन पर स्थापित किया। भरत नंदीग्राम में पर्णकुटीर बनाकर 10 हाथ नीचे भूमि में रहने लगे

राम महर्षि अत्रि के आश्रम में पहुँचे। माता सीता ने देवी अहिल्या की चरण वन्दना की। महर्षि अत्रि राम की पूजन-स्तुति करने लगे। “नमामि भक्त वात्सल्म्, कृपालु शील कोमलं ..”

इस अवसर पर आज के मुख्य यजमान आदरणीय श्री सुरेन्द्र गर्ग जी, आदरणीय श्री ईश्वर सैनी जी, आदरणीय श्री सुशील जी, आदरणीय श्री मोहन जी, आदरणीय श्री अनिरुद्ध त्यागी जी, आदरणीय श्री पंकज वैष्णव जी, आदरणीय श्री योगराज जी, आदरणीय श्री राम निवास अत्री जी, काशी से पधारे विद्वान पूज्य श्री स्वामी दयानन्द गिरि जी महाराज, महामण्डलेश्वर पूज्य श्री स्वामी अपूर्वानन्द गिरि जी महाराज, पूज्य श्री स्वामी कल्याणानन्द जी महाराज, पूज्य श्री स्वामी ज्ञानानन्द गिरि जी महाराज, पूज्य श्री स्वामी रामात्मानन्द गिरि जी महाराज समेत अनेक पूज्य सन्त गण, प्रभु प्रेमी संघ के पदाधिकारी गण, शासन-प्रशासन के अनेक अधिकारी गण एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालु भक्तों की उपस्थिति रही।

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