क्या ट्रंप अमेरिकी विदेश नीति को डीप स्टेट से मुक्त करा पायेंगे ?

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विगत दशकों में अमेरिका पर अनेक देशों में लोकतांत्रिक रूप से चुनी सरकारों का भी तख्ता पलट करने का आरोप लगा है । इस तख्ता पलट के पीछे वाइट् हाउस को संचालित करने वाले डीप स्टेट का हाथ होने की बात बात सामने आती है। पाकिस्तान में लोकततांत्रिक रूप से चुनी इमरान सरकार को हटवाया और इमरान को जेल भेज दिया गया । इमरान ने स्पष्ट कहा था कि उसको हटाने में अमेरिका के दक्षिण और सेंट्रल ऐशिया अफेयर के सहायक सचिव डोनाल्ड ल्यू का षणयंत्र था। अफगानिस्तान ,इरान,इराक,पाकिस्तान ,बंगलादेश पश्चिम एशिया , सेंट्रल एशिया, अफ्रिका, दक्षिण अमेरिका के अनेक देशों में होनेवाली राजनीतिक उथल पुथल और तख्तापलट में डीप स्टेट का हाथ होने के संकेत मिलते हैं । हाल ही में बंगलादेश में लोकतान्त्रिक रूप से चुनी शेख हसीना सरकार का तख्ता पलट कर मोहमद यूनूस को एक सलाहकार के रुप में गद्दी पर बैठा दिया। राजनीतिक विश्लेषकों‌ का कहना है कि हसीना के तख्ता पलट में विद्यार्थी आंदोलन तो एक टूल किट था मूलतः बंगलादेश के पूर्व राजदूत पीटर हास, मोह. यूनूस और डोनाल्ड ल्यू को इस तख्ता पलट का सूत्रधार माना जाता है। समीक्षकों के अनुसार युनूस क्लींटन ग्लोबल इनिसियेटिब के एजैंट के रुप में बंगलादेश में माइक्रोफाइनैंस बैंकों का संचालन करते थे।क्लेम तो युनूस ने यह किया था कि वे पूरे बंगलादेश को गरीबी रेखा से मुक्त कर देंगे। लेकिन 35% जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे ही रह गयी। इसका अधिकतम मुनाफा क्लींटन फावंडेसन को जाता रहा।बंगलादेशियों के इस आर्थिक शोषण पर हसीना ने युनूस पर अपराध दर्ज किया। युनूस बाइडन की डेमोक्रेटिक पार्टी और डीप स्टेट के नजदीक थे।फलत: योजनाबद्ध तख्ता पलट हो गया । शेख हसीना ने तख्ता पलट का कारण अमेरिका द्वारा बंगलादेश के सेंट मार्टिन द्वीप की मांग बताया। हसीना इस मांग से सहमत नहीं थी। डीप स्टेट ने मुल्ला युनूस को टूल किट बनाया। यहां मुल्ला युनूस कहना इसलिए प्रसांगिक है युनूस ने सेक्यूलर बंगलादेश को जमायते इस्लाम जैसे जिहादी संगठन के भरोसे छोड़ दिया।
भारत में भी डीप स्‍टेट को लेकर कई बार सुर्खियां सामने आ ही जाती हैं। कहा जाता है कि देश में होने वाले किसान आंदोलन या आरक्षण के लिए होने वाले आंदोलन बाहर विदेशों से ऑपरेट होते हैं और इनके जरिये डीप स्‍टेट की मदद से भारत में उथल पुथल मचाई जा सकती. २०२४ में डीप स्टेट और उसके भारतीय राजनितिक दलों से सम्बन्ध पर खुल कर विवाद भारतीय संसद में भी उठा.
यूँ तो डीप स्टेट के सारे पेरोकार धर्मनिरपेक्ष, समानता, मानव अधिकार, लोकतंत्र की बात करते हैं लेकिन व्यवहारिक रुप से वे अपने हितों का आंकलन करते हैं। ये हित हैं हथियारों का बाजार, उन्मुक्त ब्यापार, आर्मी बेस और अन्य देशों कि अर्थव्यवस्था को अपने हितों के अनुरूप ढालना आदि आदि। किसी भी देश की आन्तरिक और बाह्य नीति को प्रभावित करने के लिए डीप स्टेट विद्यार्थी संगठन, मजदूर संगठन, विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों ,स्वयंसेवी संगठन, अध्यापक, राजनीतिज्ञ, कलाकार, धार्मिक नेता,मीडिया हाउसेज, सास्कृतिक संगठनों को टूल किट के रुप में उपयोग करते हैं।मिथ्या प्रचार, उग्र आन्दोलन भड़काना,यहां तक कि आतंकवादी और अतिवादी संगठनों को अपने लक्ष के लिए मदद करने में ये परहेज नहीं करते। जार्ज सोरेस फाउंडेशन, फोर्ड फाउंडेशन , क्लींटन ग्लौबल इनिसियेटिब , हार्वर्ड और आक्सफोर्ड विश्वविद्यालयों के कार्यक्रमों के माध्यम से दूसरे राज्यों की नीतियों और नेतृत्व को अपने हितों के अनुरुप ढालते हैं।‌
आखिर ये डीप स्टेट क्या है? इसे कौन लोग संचालित करते हैं।समीक्ष्यकों के अनुसार यह
विशेष रूप से गैर-निर्वाचित सरकारी अधिकारियों और कभी-कभी निजी संस्थाओं (जैसे वित्तीय सेवाओं और रक्षा उद्योगों में) का एक कथित गुप्त नेटवर्क जो सरकारी नीति को प्रभावित करने और लागू करने के लिए गैर-कानूनी रूप से काम करता है।एफ बी आई ( Foreign Intelligence Surveillance) और सीआईए ( Central Intelligence Agency ) गैर सरकारी प्रभावशाली संगठनों का एक दूसरे के हितों की पूर्ति के लिए उपयोग करते हैं।‌ डेविड रोथकोफ़ के अनुसार ‘ डीप स्टेट की शक्ति अनुभव, ज्ञान, रिश्तों, अंतर्दृष्टि, शिल्प, विशेष कौशल, परंपराओं और साझा मूल्यों से आती है। साथ में, ये कथित गुण नामहीन नौकरशाहों को एक सुपरगवर्नमेंट में बदल देते हैं जो किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है। यह एक डरावनी संभावना है।, 2014 में, पूर्व कांग्रेसी कर्मचारी माइक लोफग्रेन ने आरोप लगाया कि एक डीप स्टेट है जो “शक्तिशाली निहित स्वार्थों” की रक्षा कर रहा है और “अमेरिकी सरकार और उसके बाहर के हितों का एक जाल … अमेरिका के रक्षा निर्णयों, व्यापार नीतियों और प्राथमिकताओं को अमेरिकी लोगों के वास्तविक हितों या इच्छाओं के प्रति कम सम्मान के साथ निर्देशित करता है”।
डोनाल्ड ट्रंप ने 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में डीप स्टेट कि भूमिका कि खुल कर आलोचना कि थी और कहा था कि डीप स्टेट उनके देश को खोखला कर रहा है. ये सरकार के बाहर रहती वो ताकतें हैं, जो बाहरी होकर भी उनके फैसले तक बदल सकने की ताकत रखती हैं. कई देश डीप स्टेट की साजिशों का शिकार होते रहे.नव निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने डीप स्टेट को यूएस समेत दुनियाभर की डेमोक्रेसी के लिए बड़ा खतरा बताया. यहां तक कि ट्रंप पर हुए हमले में भी डीप स्टेट की भूमिका कही जा रही । दिसंबर 24 में ट्रंप ने तुलसी गबार्ड को नेशनल इंटेलिजेंस एजेन्सी का मुखिया घोषित किया है। तुलसी ने डिमोक्रेटिक पार्टी की राष्ट्रपति उम्मीदवारकमला हैरिस को डीप स्टेट का एजेन्ट (“new figurehead for the deep state”.) बताया था ।तुलसी अब नई भूमिका में अमेरिका में 18 जासूसी एजेंसियों की देखरेख करेंगी, जिनमें दुनिया में भर में अपने मिशन के लिए बदनाम सीआईए से लेकर संघीय एजेंसी एफबीआई भी शामिल है।पूर्व में तुलसी गबार्ड ने सितंबर 2019: राष्ट्रपति चुनाव अभियान के दौरान तुलसी ने सीआईए पर आरोप लगाया कि यह एजेंसी अपने एजेंडे के तहत काम करती है और अमेरिका की जनता के हितों के बजाय विदेशी सरकारों के मामलों में हस्तक्षेप करती है. उनका यह बयान अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के प्रति उनके अविश्वास को दर्शाता है.अक्टूबर 2020: तुलसी ने अमेरिका की पैट्रियट एक्ट जैसी नीतियों की आलोचना करते हुए कहा कि ये नीतियां नागरिक स्वतंत्रता को दबाने के लिए इस्तेमाल की जा रही हैं. उन्होंने कहा, डीप स्टेट की शक्तियां अमेरिकी संविधान की अवहेलना कर रही हैं.उनका मानना है कि सीआईए जैसी एजेंसियां अपने अधिकार का दुरुपयोग कर रही हैं और इसे नियंत्रित करने की आवश्यकता है. तुलसी के साथ ट्रम्प ने टेस्ला, स्पेसएक्स और सोशल मीडिया X के CEO एलन मस्क और व्यवसायी व राजनीति के उभरते चेहरे विवेक रामास्वामी को ‘Department of Government Efficiency (DOGE)’ का नेतृत्व सौंपा गया है.एलन मस्क अपने स्पष्ट और विवादास्पद बयानों के लिए जाने जाते हैं. वो अक्सर सरकार की कार्यशैली, नौकरशाही और अमेरिकी खुफिया एजेंसियों पर तीखी टिप्पणियां करते रहे हैं. विवेक रामास्वामी ने सितंबर 2023: विवेक ने अमेरिका की विदेश नीति में सीआईए की भूमिका पर सवाल उठाया और कहा कि अमेरिका को दूसरे देशों में सत्ता पलट और अस्थिरता फैलाने से दूर रहना चाहिए. उनके अनुसार, यह नीति अमेरिका की छवि को नुकसान पहुंचाती है और लंबे समय में हानिकारक साबित होती है.फरवरी 2024 में एक इंटरव्यू में विवेक ने सुझाव दिया कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों में व्यापक सुधार होने चाहिए ताकि ये संस्थाएं जनता के हित में काम करें. उन्होंने कहा, हमें अमेरिकी संस्थाओं को उनके गुप्त एजेंडे से दूर कर वास्तविक राष्ट्रीय हित में काम करना चाहिए . ट्रम्प 20 जनवरी को राष्ट्रपति पद की शपथ ग्रहण करेंगे उनके तथा उनकी टीम के चुनावी उद्घोषणा से सारी दुनियाँ को लगा कि अमेरिकी निति सञ्चालन से अब डीप स्टेट बाहर हो जायेगा. क्या व्यावहारिक रूप से यह संभव है ?
विदेश निति के पंडितों का मानना है कि सत्ता में आने के बाद इनकी असली परीक्षा होगी. अमेरिकी प्रशासन में गहरी पैठ रखने वाले डीप स्टेट की ताकत इतनी जल्दी कमजोर नहीं होगी. यह देखना दिलचस्प होगा कि ट्रंप की टीम किस हद तक अपने विचारों को लागू कर पाती है.ट्रंप की नयी टीम के फैसलों पर निर्भर करेगा कि अमेरिका की विदेश नीति में कितना बदलाव आता है? क्या अमेरिका अब दूसरे देशों में सत्ता परिवर्तन या हस्तक्षेपकारी नीतियों से बचेगा?जबकि सीआईए जैसी एजेंसियां लंबे समय से दुनिया भर में सत्ता पलट और जासूसी गतिविधियों के लिए कुख्यात रही है.
जनवरी 2024 में तुलसी ने अमेरिकी खुफिया एजेंसियों और डीप स्टेट कि नकेल कसने कि मूल चर्चा को यह कह कर यू टर्न दे दिया कि “कांग्रेस में मेरे कार्यकाल के बाद से इन मुद्दों के समाधान के लिए महत्वपूर्ण खुफिया निगरानी अधिनियम (FISA) सुधार लागू किए गए हैं। यदि मुझे डायरेक्टर नेशनल इंटेलिजेंस के रूप में पुष्टि की जाती है, तो मैं अमेरिकियों के चौथे संशोधन के अधिकारों को कायम रखूंगी, साथ ही अमेरिकियों की सुरक्षा और स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए धारा 702 जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा उपकरणों को बनाए रखूंगी।”
तुलसी ने 2024 के चुनाव से पहले अनेक बार The Foreign Intelligence Surveillance Act of 1978 के धारा 702 में परिवर्तन की बात कही थी . ‌विदेशी खुफिया निगरानी अधिनियम की धारा 702 की आलोचना का मुख्य कारण अमेरिकी सरकार को बिना किसी वारंट के देश के बाहर स्थित गैर-अमेरिकी लोगों के इलेक्ट्रॉनिक संचार को एकत्रित करने की अनुमति देना था अब चूकि तुलसी को राष्ट्रीय खुफिया निदेशक पद पर नियुक्ति की पुष्टि रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों सीनेटरों से समर्थन से प्राप्त करना है.सीनेट की इंटलीजैंस कमेटी इसकी सुनवाई करेगी। इस प्रक्रिया से मंजूरी मिलने के बाद ही तुलसी डीएनआइ बन पायेंगी इसलिए उसने अपने पुराने स्टैंड पर यू टर्न लिया है. Kenneth C. Brill जो नेशनल इंटलिजैंस से जुड़े विदेश सेवा से जुड़े अधिकारी रहे हैं ने 14 जनवरी को “द हिल ” में लिखे लेख में तुलसी को राष्ट्रीय आसूचना का निदेशक बनाये जाने की गहन आलोचना की उसे अनुभवहीन और अयोग्य बताया साथ ही उसकी अयोग्यता में भारतीय संस्थाओं और प्रधान मंत्री मोदी का समर्थन देना भी बताया।। यह लेख अमेरिकी नीति निर्धारकों और डीप‌ स्टेट का भारत के प्रति नजरिया स्पष्ट करता है।
अब 20जनवरी को ट्रंप राष्ट्रपति की शपथ लेंगे।
आने वाला समय यह बताएगा कि कामकाज शुरू करने के बाद ट्रंप के ये नये कमांडर अपनी बातों पर टिके रहते हैं या फिर सत्ता के दवाब में उन्हें भी पुराने तरीकों को ही मानने के लिए मजबूर होना पड़ता है. अमेरिकी सत्ता पर करीब से नजर रखने वालों का मानना है कि अमेरिका का राजनीतिक ढांचा और वहां मौजूद ताकतवर लॉबी समूह इस परिवर्तन को आत्मसात करने नहीं देगा. ट्रम्प को द्रण इच्छा शक्ति का परिचय देना होगा .

डॉ गिरिजा किशोर पाठक, आईपीएस
अन्तर्राष्ट्रीय राजनीती के अध्येता

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