जो सबकी नज़र में सबसे बुरा आदमी है, वही ईमानदार है? व्यंग्य – राजेन्द्र सिंह जादौन
जंसम्पर्क गाथा…
जो सबकी नज़र में सबसे बुरा आदमी है, वही ईमानदार है?
व्यंग्य – राजेन्द्र सिंह जादौन
जंसम्पर्क विभाग… नाम सुनते ही एक ऐसी तस्वीर उभरती है, जहाँ खबरों से ज्यादा “खबर बनाने वालों” की चर्चा होती है। यहाँ शब्दों का खेल चलता है, छवियाँ गढ़ी जाती हैं और कभी-कभी सच्चाई को इस तरह सजाया जाता है कि वो पहचान में ही न आए। लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक और कहानी भी चलती रहती है ईमानदारी और बेईमानी की, जो अक्सर उलटी दिखाई देती है।
कहते हैं, इस विभाग में काम करने वाले अधिकारी अपनी मासिक तनख्वाह से ही अपने बच्चों को महंगे स्कूलों में पढ़ाते हैं, घर चलाते हैं, बचत करते हैं और फिर उसी बचत से आलीशान मकान भी खड़े कर लेते हैं। अब यह सुनकर आम आदमी के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है क्या सच में इतनी “कुशल आर्थिक योजना” संभव है या फिर इसके पीछे कोई और कहानी छिपी है?
कागजों में सब कुछ साफ-सुथरा दिखाई देता है। वार्षिक संपत्ति विवरण में हर चीज़ इतनी व्यवस्थित और संतुलित होती है कि लगता है मानो ईमानदारी की मूर्ति खुद फॉर्म भरकर गई हो। कुछ संपत्ति “पूर्वजों की देन” होती है, कुछ “ससुराल पक्ष का आशीर्वाद” और बाकी सब “कड़ी मेहनत का परिणाम।” अब सवाल यह नहीं है कि संपत्ति कहाँ से आई… सवाल यह है कि सवाल कौन उठाता है?
यहीं से शुरू होती है असली कहानी। इस विभाग में एक अजीब परंपरा है जो अधिकारी ज्यादा सवाल पूछता है, जो फाइलों को ध्यान से पढ़ता है, जो हर आंकड़े को परखता है… वही अचानक सबकी नजरों में “बुरा आदमी” बन जाता है। उसे कहा जाता है।काम में अड़ंगा लगाने वाला, माहौल खराब करने वाला, सिस्टम को न समझने वाला।
और जो बिना सवाल किए हर चीज़ पर “ठीक है” लिख देता है, वो बन जाता है सबका चहेता। उसे समझदार कहा जाता है, व्यवहार कुशल कहा जाता है, और सबसे बड़ी बात “सिस्टम में फिट” बताया जाता है। यही विडंबना है जंसम्पर्क विभाग की… यहाँ ईमानदारी एक गुण नहीं, बल्कि एक “समस्या” बन जाती है।
पूर्व आयुक्त दीपक सक्सेना की याद इसलिए आती है क्योंकि उन्होंने इस उल्टी धारा को थोड़ी देर के लिए ही सही, लेकिन मोड़ने की कोशिश की थी। उन्होंने कमान ऐसे व्यक्ति को सौंपी, जो सवाल पूछने की हिम्मत रखता था। शायद उन्हें पता था कि सिस्टम को सुधारना है तो किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत है, जो “हाँ में हाँ” मिलाने के बजाय “क्यों” पूछ सके।
लेकिन “क्यों” पूछना आसान नहीं होता। “क्यों” पूछने वाला आदमी अकेला पड़ जाता है। उसके खिलाफ फुसफुसाहटें शुरू हो जाती हैं, फिर धीरे-धीरे वही फुसफुसाहटें आरोपों में बदल जाती हैं। और देखते ही देखते, वह आदमी “सबकी नजर में बुरा” घोषित कर दिया जाता है।
अब जरा सोचिए… अगर कोई व्यक्ति ईमानदारी से काम करता है, नियमों का पालन करता है और हर चीज़ को पारदर्शी रखना चाहता है तो क्या वह सच में बुरा है? या फिर वह उन लोगों के लिए बुरा है, जिनकी सुविधा उसके सवालों से प्रभावित होती है?
जंसम्पर्क विभाग की यह गाथा हमें यही सिखाती है कि हर चमक सोना नहीं होती और हर “बुरा आदमी” गलत नहीं होता। कई बार सच्चाई इतनी असहज होती है कि उसे स्वीकार करने के बजाय हम उसे गलत ठहराना ज्यादा आसान समझते हैं।
आज हालात यह हैं कि विभाग में “माला-माल” होने की होड़ लगी है। हर कोई अपने-अपने तरीके से तरक्की कर रहा है, और इस दौड़ में ईमानदारी कहीं पीछे छूटती जा रही है।
लेकिन इतिहास गवाह है जब भी सिस्टम पूरी तरह से चुप्पी में डूब जाता है, तब एक आवाज जरूर उठती है। वो आवाज भले ही शुरुआत में “बुरी” लगे, लेकिन वही आगे चलकर बदलाव की वजह बनती है।
तो अगली बार जब आप किसी अधिकारी के बारे में सुनें कि वह “बहुत बुरा आदमी है”, तो एक बार यह जरूर सोचिए कहीं वह सच में ईमानदार तो नहीं? क्योंकि इस विभाग में, और शायद इस व्यवस्था में भी… ईमानदार होना सबसे बड़ा अपराध बन चुका है।
