बलात्कार और अपराधों की राजनीति ?

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भाजपा की ‘बेटी बचाओ’ की पोल खोलता सत्य ?

व्यंग्य – राजेन्द्र सिंह जादौन

भारतीय राजनीति में नारे हमेशा बड़े होते हैं और सच अक्सर छोटा। चुनावी मंचों पर भाषणों की गूंज इतनी तेज होती है कि कई बार पीड़ितों की चीखें भी उस शोर में दब जाती हैं। महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा भी कुछ ऐसा ही है।हर दल इसे अपने भाषणों में सबसे ऊपर रखता है, लेकिन जमीन पर तस्वीर अक्सर उलटी दिखाई देती है।

2014 के बाद देश में “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” का नारा बड़े जोर-शोर से दिया गया। पोस्टर लगे, विज्ञापन चले, और मंचों से कहा गया कि यह देश की बेटियों के सम्मान का संकल्प है। लेकिन जब वास्तविक घटनाओं, आंकड़ों और राजनीतिक व्यवहार को देखा जाता है, तो यह सवाल खड़ा हो जाता है कि यह नारा वास्तव में बेटियों को बचाने के लिए था या राजनीति को चमकाने के लिए।

राजनीति का यह पुराना नियम है कि जो बात जितनी ज्यादा कही जाती है, कई बार वह उतनी ही कम निभाई जाती है। महिलाओं की सुरक्षा के मामले में भी यही विरोधाभास देखने को मिलता है। एक ओर सरकारें बड़े अभियान चलाती हैं, दूसरी ओर उन्हीं दलों के कई नेताओं पर महिलाओं के खिलाफ गंभीर आरोप सामने आते हैं।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की रिपोर्टें पिछले कुछ वर्षों से लगातार राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों के आपराधिक मामलों का विश्लेषण करती रही हैं। इन रिपोर्टों में सामने आया कि संसद और विधानसभाओं में ऐसे प्रतिनिधियों की संख्या लगातार बढ़ रही है जिन पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें महिलाओं के खिलाफ अपराध भी शामिल हैं।

2024 की रिपोर्ट के अनुसार देश में 151 वर्तमान सांसद और विधायक ऐसे हैं जिन पर महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामले दर्ज हैं। इनमें से कई पर बलात्कार जैसे गंभीर आरोप भी शामिल हैं। आंकड़ों में यह भी सामने आया कि विभिन्न दलों के कई नेताओं पर ऐसे आरोप हैं, लेकिन संख्या के हिसाब से सबसे ज्यादा मामले सत्ताधारी दल से जुड़े नेताओं के खिलाफ पाए गए।

इन आंकड़ों का मतलब यह नहीं कि हर आरोप सिद्ध हो चुका है, लेकिन यह सवाल जरूर उठाता है कि जब किसी व्यक्ति पर इतना गंभीर मामला हो, तो क्या उसे चुनाव लड़ने का टिकट दिया जाना चाहिए?

राजनीति में अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि “जब तक अदालत दोषी साबित न करे, तब तक व्यक्ति निर्दोष है।” यह तर्क कानूनी तौर पर सही हो सकता है, लेकिन नैतिक तौर पर क्या यह पर्याप्त है? लोकतंत्र में प्रतिनिधि सिर्फ कानून से नहीं, बल्कि नैतिकता और सार्वजनिक विश्वास से भी चुने जाते हैं।

“बेटी बचाओ” का नारा सुनने में जितना प्रेरक लगता है, उतना ही दुखद तब लगता है जब किसी दल के ही नेता पर महिलाओं के खिलाफ गंभीर आरोप सामने आते हैं और पार्टी तुरंत कठोर कार्रवाई करने के बजाय राजनीतिक नुकसान-फायदे का हिसाब लगाने लगती है।

कई मामलों में देखा गया है कि जब तक जनदबाव नहीं बनता, तब तक राजनीतिक दल अपने नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करने से बचते रहते हैं। विरोध बढ़ने पर निलंबन या निष्कासन जैसी कार्रवाई होती है, लेकिन तब तक मामला राष्ट्रीय बहस बन चुका होता है।

यही वह बिंदु है जहाँ राजनीति की नैतिकता पर सवाल उठते हैं। अगर किसी पार्टी का दावा है कि वह महिलाओं की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है, तो सबसे पहले उसे अपने संगठन के भीतर शून्य सहिष्णुता की नीति अपनानी चाहिए।

भारतीय राजनीति में अपराध और सत्ता का रिश्ता नया नहीं है। कई दशकों से यह देखा गया है कि प्रभावशाली लोग अपने राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल जांच को प्रभावित करने या मामलों को कमजोर करने के लिए करते हैं।

जब किसी सामान्य व्यक्ति पर अपराध का आरोप लगता है, तो कानून तेजी से सक्रिय हो जाता है। लेकिन जब वही आरोप किसी प्रभावशाली व्यक्ति पर लगता है, तो प्रक्रिया लंबी और जटिल हो जाती है। यही असमानता जनता के मन में अविश्वास पैदा करती है।

महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामलों में यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है, क्योंकि पीड़ित अक्सर पहले से ही सामाजिक दबाव और भय का सामना कर रही होती हैं। अगर आरोपी शक्तिशाली हो, तो न्याय की राह और कठिन हो जाती है।

पिछले कुछ वर्षों में कई हाई-प्रोफाइल मामलों में यह देखा गया कि शुरुआत में राजनीतिक दल आरोपों को “साजिश” या “राजनीतिक बदनामी” कहकर खारिज करने की कोशिश करते हैं।

लेकिन जैसे-जैसे सबूत सामने आते हैं और जनता का दबाव बढ़ता है, तब जाकर कार्रवाई होती है। यह पैटर्न लगभग हर दल में देखने को मिलता है। फर्क सिर्फ इतना है कि सत्ता में रहने वाले दल पर सवाल ज्यादा उठते हैं, क्योंकि जिम्मेदारी भी उसी की अधिक होती है।
महिलाओं की सुरक्षा: नारे से आगे

महिलाओं की सुरक्षा सिर्फ कानून बनाने से सुनिश्चित नहीं होती। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक जवाबदेही और सामाजिक जागरूकता तीनों जरूरी हैं।
अगर किसी भी दल को सचमुच महिलाओं की सुरक्षा की चिंता है, तो उसे कुछ ठोस कदम उठाने होंगे

आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों को टिकट देने से बचना

महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामलों की तेज सुनवाई

पुलिस और न्याय व्यवस्था को राजनीतिक दबाव से मुक्त रखना

पीड़ितों की सुरक्षा और पुनर्वास की मजबूत व्यवस्था करना

लोकतंत्र में असली ताकत मतदाता के पास होती है। राजनीतिक दल वही करते हैं जो उन्हें चुनावी रूप से फायदेमंद लगता है। अगर जनता ऐसे उम्मीदवारों को नकारना शुरू कर दे जिन पर गंभीर आरोप हैं, तो राजनीतिक दल भी मजबूर होकर अपने मानदंड बदलेंगे।
यह सवाल सिर्फ किसी एक दल का नहीं है। लगभग हर दल में ऐसे उदाहरण मिल जाते हैं जहाँ आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को टिकट दिया गया। इसलिए यह लड़ाई किसी पार्टी के खिलाफ नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति के खिलाफ होनी चाहिए।

महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा किसी भी सभ्य समाज की बुनियादी जिम्मेदारी है। इसे सिर्फ चुनावी नारा बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता।

अगर “बेटी बचाओ” सच में एक राष्ट्रीय संकल्प है, तो उसे सबसे पहले राजनीति के भीतर लागू करना होगा। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि सत्ता की कुर्सी से ज्यादा महत्वपूर्ण समाज का विश्वास है।
जब तक राजनीति अपराध से दूरी नहीं बनाएगी, तब तक नारे और वास्तविकता के बीच यह दूरी बनी रहेगी। और तब तक देश की बेटियाँ पोस्टरों में सुरक्षित दिखेंगी, लेकिन वास्तविक जीवन में उन्हें न्याय के लिए संघर्ष करना पड़ेगा।

समय आ गया है कि राजनीति अपने नारों को आईने में देखे क्योंकि लोकतंत्र में जनता सिर्फ सुनती ही नहीं, याद भी रखती है।

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