जो नाम बेचता है वो मीडिया है, जो सच लिखता है वो पत्रकार?

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जो नाम बेचता है वो मीडिया है, जो सच लिखता है वो पत्रकार?

झोला छाप ख़बरी

जिस पत्रकार की कीमत आपको याद रह जाए, तो समझ लीजिए उसने अपनी कलम को तराजू पर रख दिया है। उसकी पहचान उसके शब्दों से नहीं, उसके पैकेज से होती है। वह खबर लिखता नहीं, बेचता है। उसकी प्राथमिकता सच नहीं होता, बल्कि यह होता है कि किस खबर से किस दरवाज़े तक पहुँच बनेगी, किस सवाल से कौन नाराज़ होगा और किस चुप्पी से कौन खुश रहेगा। ऐसे पत्रकार की भाषा में धार नहीं होती, उसमें हिसाब-किताब होता है। वह सत्ता के गलियारों में सहज दिखाई देता है, क्योंकि उसने सवाल पूछने का जोखिम बहुत पहले छोड़ दिया होता है। उसकी खबरें पढ़ते समय पाठक को कुछ भी चौंकाता नहीं, कुछ भी झकझोरता नहीं, क्योंकि सब कुछ पहले से तय, सधा हुआ और सुरक्षित होता है।

इसके उलट जिस पत्रकार की कलम आपको पढ़ने पर मजबूर कर दे, वही असल में पत्रकार है। आप उसका नाम जानें या न जानें, उसकी शक्ल पहचानें या न पहचानें, लेकिन उसके शब्द आपको रोक लेते हैं। उसकी पंक्तियाँ आपको असहज करती हैं, सोचने पर मजबूर करती हैं, कई बार गुस्सा दिलाती हैं और कई बार शर्मिंदा भी करती हैं। यही असली पत्रकारिता की पहचान है। सच्चा पत्रकार पाठक की सुविधा नहीं देखता, वह समाज की बीमारी पर उँगली रखता है। उसे यह चिंता नहीं होती कि उसकी खबर से कौन नाराज़ होगा, बल्कि यह चिंता होती है कि अगर वह चुप रहा तो इतिहास उसे कैसे याद करेगा।

आज के समय में पत्रकारिता को पेशा कम और कारोबार ज़्यादा बना दिया गया है। बड़े-बड़े चैनल, मोटे विज्ञापन, चमकदार स्टूडियो और ऊँची सैलरी ने पत्रकार की आत्मा को धीरे-धीरे गिरवी रख दिया है। अब खबर वही बनती है जो बिकाऊ हो, जो ट्रेंड करे, जो किसी न किसी एजेंडे को साधे। ऐसे माहौल में सच्चा पत्रकार अकेला पड़ जाता है। उसे न पुरस्कार मिलते हैं, न मंच, न सुरक्षा। उसके हिस्से में सिर्फ़ खतरे आते हैं कभी मुकदमे, कभी धमकियाँ, कभी बेरोज़गारी। लेकिन फिर भी वही पत्रकार ज़िंदा रहता है, क्योंकि उसकी ताकत उसकी कलम होती है, उसका ज़मीर होता है।

चाटुकार पत्रकार सत्ता को आईना नहीं दिखाता, वह आईने पर पर्दा डाल देता है। वह सवालों को कुशलता से घुमा देता है, मुद्दों को भावनात्मक शोर में दबा देता है और जनहित को राष्ट्रहित के नाम पर कुर्बान कर देता है। उसकी पत्रकारिता का लक्ष्य सत्ता के करीब रहना होता है, ताकि कल को कोई कुर्सी, कोई पद, कोई सुविधा मिल सके। वह खुद को पत्रकार कहलवाता है, लेकिन व्यवहार में वह प्रवक्ता बन चुका होता है। ऐसे लोगों की कीमत याद रहती है, क्योंकि वे हर जगह एक ही भाव में उपलब्ध होते हैं।

वहीं सच्चा पत्रकार सत्ता के लिए असुविधा होता है। वह हर सरकार के लिए, हर व्यवस्था के लिए खटकता है। उसकी लेखनी किसी पार्टी, किसी नेता या किसी कॉरपोरेट की गुलाम नहीं होती। वह सवाल पूछता है कि विकास किसका हुआ, फायदा किसे मिला, नुकसान किसने झेला। वह आंकड़ों के पीछे छिपे सच को सामने लाता है। वह उस किसान की आवाज़ बनता है जिसकी खबर टीआरपी नहीं लाती, उस मज़दूर की पीड़ा लिखता है जिसकी मौत पर कोई ब्रेकिंग न्यूज़ नहीं चलती।

सच्ची पत्रकारिता का काम खुश करना नहीं, जागरूक करना है। उसका धर्म तालियाँ बटोरना नहीं, चेतावनी देना है। यही कारण है कि सच्चा पत्रकार अक्सर अकेला दिखाई देता है। उसके साथ भीड़ नहीं होती, लेकिन इतिहास उसके साथ खड़ा होता है। समय के साथ चाटुकार पत्रकार भुला दिए जाते हैं, क्योंकि उन्होंने कुछ भी ऐसा नहीं लिखा होता जो आने वाली पीढ़ी को याद रखने लायक हो। लेकिन सच्चा पत्रकार, चाहे गुमनाम ही क्यों न रहा हो, अपने शब्दों के ज़रिए जिंदा रहता है।

जिस पत्रकार की कीमत आपको याद रहती है, वह आपको कभी बेचैन नहीं करेगा। वह आपको सोचने नहीं देगा, क्योंकि सोचने वाला नागरिक सवाल करता है। और सवाल सत्ता को पसंद नहीं होते। इसलिए ऐसे पत्रकारों का काम समाज को सुलाना होता है, बहलाना होता है, डराना या भटकाना होता है। इसके उलट सच्चा पत्रकार नींद तोड़ता है। वह आरामदेह झूठ की चादर खींच लेता है और नंगे सच से सामना कराता है।

आज जरूरत इस बात की है कि पत्रकार को उसके दाम से नहीं, उसके दामन से पहचाना जाए। उसकी निष्ठा देखी जाए, उसकी निर्भीकता देखी जाए। पत्रकारिता अगर सच के साथ खड़ी है तो वह पत्रकार है, वरना वह सिर्फ़ सूचना का व्यापारी है। कलम जब तक सवाल पूछती है, तब तक ज़िंदा है। जिस दिन वह समझौता करने लगे, उस दिन वह स्याही नहीं, सिर्फ़ दाग छोड़ती है।

अंत में फर्क बस इतना सा है चाटुकार पत्रकार की पहचान उसकी पहुँच से होती है, सच्चे पत्रकार की पहचान उसकी चोट से। एक सत्ता की भाषा बोलता है, दूसरा जनता की पीड़ा लिखता है। एक की कीमत याद रहती है, दूसरे की बातें। और इतिहास हमेशा कीमत नहीं, बातें याद रखता है।

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