☀ प्रभु प्रेमी संघ ? 28 मई, 2024 (मंगलवार)

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पूज्य सद्गुरुदेव आशीषवचनम्

।। श्री: कृपा ।।
? पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – श्रेष्ठता के सुभग शिखरों पर आरूढ़ होने के लिए विचार सम्पन्नता और चारित्रिक उच्चता नितान्त अपेक्षित है। अतः सत्याचरण के साथ शुभ विचारों का आह्वान कीजिए। सत्य ईश्वरीय सत्ता है जो नित्य विद्यमान है और सत्यनिष्ठा ही आनन्द साम्राज्य की कुंजी है। अत: सत्यनिष्ठ रहें …! परमात्मा सत्य है, जो मनुष्य सत्यनिष्ठ है, परमात्मा उसके अत्यंत निकट है। सत्यनिष्ठा सम्पन्न व्यक्ति का आचरण लगभग हर स्थिति में उसके नैतिक सिद्धांतों के अनुरूप होता है। सत्यनिष्ठ ही अभयता, शाश्वत-सुख और अखण्ड-आनन्द का अधिकारी है। सत्यनिष्ठा ही ब्रह्मनिष्ठा है। स्वाध्याय और सत्संग जीवन के सत्य को उजागर करते हैं। आनन्द इन्द्रियों से नहीं सत्य की अनुभूति से मिलता है। सद्, चित्त और आनन्द ही सच्चिदानन्द है। अनासक्त और निष्काम व्यक्ति ही सत्यनिष्ठ है। तनावमुक्त वही रह सकता है, जो अनासक्त भाव से सत्यनिष्ठा के साथ जीवन यापन करे। स्पष्ट है कि यदि निरोगी रहना है तो मन-वाणी-कर्म से सत्यनिष्ठ रहा जाय, सत्कर्मों के प्रताप से दैहिक, दैविक और भौतिक ताप दूर रहेंगे। यही सर्वमान्य है, जीवन का माधुर्य सत्य में ही है। सुख को मनुष्य अनुभव करता है, लेकिन आनन्द इन्द्रियों से नहीं, बल्कि सत्य की अनुभूति से मिलता है। इन्द्रियों पर आश्रित सुख क्षणिक होता है और कभी पास नहीं रहता। सत्यनिष्ठ, जितेन्द्रिय और आत्म-विश्वासी साधक के जीवन में असम्भव सम्भव और प्रतिकूल अनुकूल होने लगता है …।

? पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा – सत्संग हमें सत्य की और उन्मुख करता है। सत्य जीवन को सुन्दर व उपयोगी बनाता है। बनावटीपन से दूर करता है। जीवन स्वयं में एक मंत्र है। 68 विभूतियाँ मनुष्य के आसपास रहती हैं, जिनको गुरुत्व के जगाने पर प्राप्त किया जा सकता है। योग्यता का अर्थ – परमार्थ है। दूसरों का भला करने से ही जीवन-दर्शन समझ में आता है। जन्म से ही मनुष्य को यह अधिकार प्राप्त है कि वह समूचे विराट में समग्र अस्तित्व को पहचाने। अपने देवत्व को अनुभूति करना ही मनुष्य का लक्ष्य है। जीवन-दर्शन समझने के तीन मार्ग अहम हैं। ज्ञान मार्ग, उपासना-भक्ति तथा निष्काम कर्मयोग। पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा कि साधना का अर्थ यह नहीं कि मुझे परलोक मिले। दीप जला कर प्रकाश न हो तो यह आपकी साधना में कोई कमी है। अर्पण, तर्पण तथा समर्पण जीवन के लिए आवश्यक अंग हैं। भगवान ने अपने विराट रूप को अर्जुन को दिखाया कि मुझ में ही सब कुछ है, तेरे में भी है। आपकी सोच गुरु जैसी होनी चाहिए। तभी आप चरित्र, चिन्तन व स्वभाव से गुरु जैसे हो जायेंगे …।

? पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा – सत्य की महिमा अपार है। शास्त्रों और ऋषियों ने उसे धर्म और अध्यात्म का आधार माना है और कहा है – ‘सत्यमेव जयते नानृतम्… अर्थात्, सत्य की ही जय होता है, असत्य की नहीं। चिरस्थायी सफलताओं का आधार सत्य पर रखा गया है। असत्य के सहारे कोई व्यक्ति थोड़े समय तक लाभ प्राप्त कर सकता है, परन्तु, जब वस्तुस्थिति प्रकट हो जाती है, तब उस लाभ को समाप्त होते हुए भी देर नहीं लगती। सत्य की सत्ता अखण्ड है, कभी वह पराजित नहीं हो सकता। यदि सत्य को जानना है तो असत्य को पूर्ण रूप से पहचानना परम आवश्यक है। इसी तरह जब परमात्मा को जानना हो तो पहले माया को पहचानना होगा, जिसने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को आवृत कर रखा है। सपने में यह जान लेना कि मैं सपना देख रहा हूँ असम्भव सा है, लेकिन इसी असम्भव को सम्भव बनाना ही आत्म-जागृति है। मोक्ष मन की स्थिति है और मन को बोध होगा – भागवत कथा से, सत्संग से। और, जब मन को बोध होगा तब कोई भी घटना आपको विचलित नहीं करेगी .

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