☀ प्रभु प्रेमी संघ ? 25 मई, 2024 (शनिवार)

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पूज्य सद्गुरुदेव आशीषवचनम्
।। श्री: कृपा ।।
? पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – “तपः स्वाध्याय निरतं तपस्वी वाग्विदां वरम् । नारदं परिपप्रच्छ वाल्मीकिर्मुनिपुंगवम् ।।”
प्राणीमात्र के उद्धार हेतु विविध ब्रह्माण्डों में भ्रमणशील अज्ञानजन्य दुःखों से दुःखित मनुष्यों को सन्मार्ग की ओर प्रवृत्त करने वाले ज्ञान, भक्ति, योग के प्रणेता दिव्यताओं के प्रसार में प्रवृत्त देवर्षि नारद जी के आविर्भाव दिवस “नारद जयन्ती” पर हार्दिक शुभकामनाएँ ..। नारद मुनि का नाम आते ही कानों में एक ही शब्द प्रतिध्वनित होता है – ‘नारायण-नारायण’। नारद मुनि जो नारायण के परम भक्त व देवताओं के बीच संवाद तंत्र थे, वह हिन्दू शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों में से एक माने गए हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार ब्रह्माण्ड के पहले पत्रकार कहे जाने वाले देवर्षि नारद जी का जन्म सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी के कंठ से हुआ था। इन्हें तीनों लोकों में वायु मार्ग द्वारा विचरण करने का वरदान प्राप्त है। समस्त लोकों के सभी प्राणियों के उद्धार हेतु परमात्मा की अभिप्रेरणा से सर्वत्र विचरण करते हुए सांसारिक दुविधाओं में उलझे मनुष्यों को ज्ञान, भक्ति और कर्म के दिव्य मार्ग की ओर प्रवृत्त करने वाले ब्रह्मविद्या की समस्त विधाओं में पारंगत, अहर्निश वंदनीय, लोकोपकार में प्रवृत्त भगवदीय स्मृति प्रदाता, शास्त्र के अनुसार “ईश्वरीय मन” देवर्षि नारद के आविर्भाव दिवस “नारद जयन्ती” पर श्रद्धापूर्वक सहस्र नमन ! जब संसार से सारे द्वार बंद हो जाते हैं तब भी भगवान का द्वार खुला रहता है। समस्त भव व्याधियों का एक ही समाधान है, और वह है – भगवन्नाम का जाप। भगवान जिसे दर्शन देना चाहते हैं उसके जीवन में कोई महात्मा भेज देते हैं। ध्रुव के जीवन में देवर्षि नारद आए। उन्होंने ध्रुव को द्वादशाक्षरी मंत्र की दीक्षा दी और मंत्र जाप के प्रभाव से ध्रुव को परमात्मा के दर्शन हुए। आज भी यदि आप खगोलीय स्थिति का अवलोकन करें तो सम्पूर्ण नक्षत्र और निहारिकाएँ ध्रुव की प्रदक्षिणा कर रही हैं । इसका अर्थ यह हुआ कि गुरु का अनुग्रह और मंत्र जाप की सामर्थ्य आपके पास हैं तो सम्पूर्ण संसार आपकी प्रदक्षिणा करता फिरेगा। परमात्मा सब कुछ देने को व्याकुल है, आप पात्र तो बनिए …।
? पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा – समाचार के देवता देवर्षि नारद हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्मा के छः पुत्रों में से छठे हैं।उन्होंने कठिन तपस्या से ब्रह्मर्षि पद प्राप्त किया। वे भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों में से एक माने जाते है। साथ ही वे भगवान विष्णु के अवतार हैं। देवर्षि नारद धर्म के प्रचार तथा लोक-कल्याण हेतु सदैव प्रयत्नशील रहते हैं। शास्त्रों में इन्हें भगवान का ‘मन’ कहा गया है। इसी कारण सभी युगों में, सभी लोकों में, समस्त विद्याओं में, समाज के सभी वर्गो में नारद जी का सदा से एक महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। मात्र देवताओं ने ही नहीं, वरन् दानवों ने भी उन्हें सदैव आदर किया है। समय-समय पर सभी ने उनसे परामर्श लिया है। श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय के 26वें श्लोक में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने इनकी महत्ता को स्वीकार करते हुए कहा है – “देवर्षीणाम् च नारद:”। देवर्षियों में मैं नारद हूँ। श्रीमद्भागवत महापुराणका कथन है कि सृष्टि में भगवान ने देवर्षि नारद के रूप में तीसरा अवतार ग्रहण किया और सात्वततंत्र (जिसे नारद-पांचरात्र भी कहते हैं) का उपदेश दिया जिसमें सत्कर्मो के द्वारा भव-बन्धन से मुक्ति का मार्ग दिखाया गया है। नारद जी मुनियों के देवता थे और इस प्रकार, उन्हें ऋषिराज के नाम से भी जाना जाता था। कहते हैं कि ब्रह्मा से ही इन्होंने संगीत की शिक्षा ली थी। भगवान विष्णु ने नारद को माया के विविध रूप समझाए थे। नारद अनेक कलाओं और विद्याओं में निपुण हैं। ये वेदान्तप्रिय, योगनिष्ठ, संगीत शास्त्री, औषधि ज्ञाता, शास्त्रों के आचार्य और भक्ति रस के प्रमुख माने जाते हैं। देवर्षि नारद को श्रुति-स्मृति, इतिहास, पुराण, व्याकरण, वेदांग, संगीत, खगोल-भूगोल, ज्योतिष और योग जैसे कई शास्त्रों का प्रकांड विद्वान माना जाता है। भगवान की अधिकांश लीलाओं में नारद जी उनके अनन्य सहयोगी बने हैं। वे भगवान के पार्षद होने के साथ देवताओं के प्रवक्ता भी हैं। नारद जी वस्तुत: सही मायनों में देवर्षि हैं। भक्त प्रह्लाद, भक्त अम्बरीष, ध्रुव आदि भक्तों को उपदेश देकर इन्होंने ही भक्तिमार्ग में प्रवृत्त किया। इनकी समस्त लोकों में अबाधित गति है। इनका मंगलमय जीवन संसार के मंगल के लिये ही है। ये ज्ञान के स्वरूप, विद्या के भण्डार, आनन्द के सागर तथा सब भूतों के अकारण प्रेमी और विश्व के सहज हितकारी हैं। हिन्दू संस्कृति के दो अमूल्य ग्रन्थ रामायण और भागवतके प्रेरक नारद जी का जन्म लोगों को सन्मार्ग पर मोड़ कर भक्ति के मार्ग पर खींचकर, विश्व-कल्याण के लिए हुआ था..

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