☀??सद्गुरु संत शिरोमणि आचार्य श्री महामंडलेश्वर जी के मुखारविंद के मोती?हे,भारत श्रेष्ठ.!

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☀??सद्गुरु संत शिरोमणि आचार्य श्री महामंडलेश्वर जी के मुखारविंद के मोती?हे,भारत श्रेष्ठ.!

हम सब और हमारा परिवार,मोहल्ला,नगर,देश,तथा पूरा विश्व और सारे Planets…. May all the beings in all the worlds become happy?इस संसार में जो कुछ भी गतिशील है,उस सबमें परमेश्वर का वास है।प्रभु द्वारा मिले हुए पदार्थों का त्याग से उपभोग करें।लोभ ना करो भला धन सम्पति किसके साथ जानी है।इस तरह का जीवन जीयें कि देवता आप से ईर्ष्या करने लगे,इतने ऊँचे विचार हो,ऐसा चिन्तन,ऐसी पवित्रता हमारे आस पास हो जाए.! क्योंकि,संकल्प से हमारी दशा और दिशा तय होती है।हमारा संकल्प जैसा है,वैसा ही हमारा जीवन बन जाता है।संकल्प शुभ और सत्य होगा तो कई उच्च कोटि की उपलब्धियाँ मिल जायेंगी ..!भारतीय मनोविज्ञान और पश्चिमी मनोविज्ञान एकमत होते हुए यह कहते हैं कि हम अपनी सोच का परिणाम है।हमारा वर्तमान हमारी सोच का परिणाम है।प्रारब्ध कर्म योग्यता हमारे यत्न या पुरुषार्थ हमारे जीवन को एक फल देता है कि महानता के लिए प्रमादभंजन के लिए आत्म-विश्वास जगाने के लिए सत्य को उपलब्ध होने के लिए तैयार होना है,तब कुछ होता है,जैसा संकल्प होता है वैसी सिद्धि होती है।परहित की भावना ही भजन है।जिसके भीतर की पशुता चली गयी है वही सच्चे अर्थों में मनुष्य कहलाने के योग्य है।जिस दिन भी सुध वापिस आ गयी,स्मृति लौट आयी फिर आप कोई और नहीं”चिदानन्द रूप:शिवोऽहम् शिवोऽहम्।ईश्वर के ही अंश है”जीवन की धन्यता तभी मानी जाएगी जब मन के विकार,उसके बीज,व उसके होने का कारण ध्वस्त कर दिए जायेंगे जो स्वयं पर नियंत्रण रखेंगा,वे ही धन्य हैं जो सभ्य सुशील है,जो अपरिग्रही है।आपके संग्रह में जो बहुत अधिक है,उसे बाँटिये।धन्य है भारत भूमि!भारत की संस्कृति कहती है कि हे,मनुष्यो.!भोग,दान,नाश यही प्रकृति करवा रही है।पर,धन्य वे ही हैं,जिनमे देने की भावना है और ऐसा भक्ति से ही सम्भव हो पायेगा।भक्ति वस्तुओं को प्रसाद बनाती है।प्रसाद की एक ही Philosophy है,वह बटना चाहता है।प्रसाद भोगा नहीं,बाँटा जाता है।जो बाँटा जाये,वो प्रसाद है और जो संग्रह किया जाये,वो विषाद है।यह बात मायने नहीं रखती की अपने सामने वाले को क्या दिया है,उपहार मूल्यवान ही हो यह जरूरी नहीं,लेकिन उपयोगी हो यह जरूरी है।याद रखना.!निर्मल भाव के आगे किसी मूल्यवान वस्तु की कोई कीमत नहीं!?कोई सफलता बिना ज्ञान के प्राप्त नहीं होगी।साधना की उच्चता के लिए पहला साधन यदि कोई है तो वह है-परदोष दर्शन का अभाव।साधना में एक दिन थोडा ऊँचा उठें और अपने आप को देखें,अपने विचारों को,अपने मन की मूढ़ता को,अपने दुर्गुणों पर भी चिन्तन करें।प्रतिदिन आत्म-निरक्षण करें।प्रपंच का और संग्रह कोई अंत नहीं है,साधना का अंत है-साध्य की प्राप्ति।Quality Of Life बनायें।थोड़ी चीजें हो पर अच्छी हो।जीवन की लम्बाई मायने नहीं रखती और चौड़ाई पर विश्वास ना करें,जीवन में जागरूकता,पवित्रता,दिव्यता होनी चाहिये।ऐसा जीवन जीयो कि जीवन भी प्रसाद बन जाये।ब्रह्माण्ड का जो छोटा अणु है वही है-प्रकृति का रहस्य।वही है-प्रकृति का सत्य।‘विष्णु’जल में अणु थल में, हवा-अग्नि मेंआकाश में अणु,अणु से जब मिलता है अणु तब सृष्टि का विस्तार होता है,ऐसे अणु कई सहस्रार जड़ बनते।फिर बनते चेतन फिर बनते जलचर,थलचर,नभचर और नाना प्रकार के सभी जीवों की उत्पति जल से ही हुई है।हमारी बात तो छोड़ो जो प्रथम पुरुष नारायण है उसकी भी उत्पति जल से ही हुई है।आचमन बिना जल के नहीं होता।संकल्प के लिए,अर्पण के लिए और तर्पण के लिए हमें जल चाहिये होता है।अर्पण,तर्पण, समर्पण में त्याग है।समाज मानवता के लिए किया गया त्याग अर्पण कहलाता है।पितरों और माता-पिता के लिए किया गया त्याग’तर्पण’कहलाता है।प्रभु एवं उसके मार्ग दर्शन के सिदान्त के लिए किया गया त्याग’समर्पण’ कहलाता है।परोपकार एक ऐसा विनियोग है,जिसका ब्याज आपको जीते जी तो मिलता ही हैं, मृत्योपरान्त भी उसका ब्याज आपके उत्तराधिकारियों को प्राप्त होता रहता है?परोपकार कभी व्यर्थ नहीं जाता।यदि आपके पास तन की शक्ति है,तो समाज में दीन-दुखियों की सेवा,परोपकार का पुनीत कार्य करो और यदि धन की शक्ति है,तो यथाशक्ति दान दें।यही नहीं किसी भटके प्राणी को सही राह दिखानाभी बहुत बड़ी सेवा है।यदि आप धन के द्वारा सेवा करने में सक्षम नहीं हैं तो धैर्य बंधाइये,उचित परामर्श दीजिये।इन सभी कार्यो से एक आत्मिक सुख एक आत्मिक आनंद का अनुभव होगा और समाज और राष्ट्र में सौहार्द्र का वातावरण बनेगा??जय राजेश्वर राधे-राधे जय श्री कृष्णा राम राम हरि”ॐ”??

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