दिल्ली दरबार की हाज़िरी
डॉ. मोहन यादव की सत्ता को आज पूरे बीस महीने हो चुके हैं। इन बीस महीनों के कुल 608 दिनों में मुख्यमंत्री महोदय लगभग चार सौ दिनों तक दिल्ली दरबार की हाज़िरी देने पहुँचे। कहते हैं मुख्यमंत्री की कुर्सी भोपाल में होती है, पर उसके फैसले दिल्ली से तय होते हैं। लगता है अब मध्यप्रदेश का भाग्य भी दिल्ली की फ़ाइलों में लिखा जाने लगा है, और मुख्यमंत्री साहब का सरकारी विमान “भोपाल से दिल्ली – दिल्ली से भोपाल” की स्थायी रूट पर चल पड़ा है।
मोहन यादव सरकार जब बनी थी तो उम्मीद थी कि यह सरकार “स्थानीय निर्णय, स्थानीय ज़रूरत और स्थानीय प्राथमिकता” पर चलेगी, पर अब लगता है यह सरकार “केंद्रीय संकेत, केंद्रीय समर्थन और केंद्रीय स्वीकृति” के भरोसे सांस ले रही है। मुख्यमंत्री का दिल्ली जाना अब कोई खबर नहीं रह गया, बल्कि एक दिनचर्या बन गया है। कभी प्रधानमंत्री से मुलाक़ात, कभी पार्टी आलाकमान के निर्देश, कभी चुनावी रणनीति, कभी विकास योजनाओं की मंज़ूरी कारण चाहे जो हो, मंज़िल हमेशा एक ही रहती है, दिल्ली।
भोपाल के गलियारों में अब लोग मज़ाक में कहते हैं कि मुख्यमंत्री निवास अब “ट्रांज़िट हाउस” बन गया है। सुबह दिल्ली की उड़ान, शाम को समीक्षा बैठक, और रात को सोशल मीडिया पर एक तस्वीर “मुख्यमंत्री ने दिल्ली में वरिष्ठ नेताओं से सौजन्य भेंट की।” जनता सोचती रह जाती है कि इस “सौजन्य” से प्रदेश के किस जिले में सड़क बनेगी, या किस गाँव में पानी पहुँचेगा। क्योंकि जनता की नज़र में तो यह हाज़िरी अब महज़ रस्म बन चुकी है, जैसे किसी बड़े साम्राज्य के गवर्नर को अपने सम्राट के दरबार में उपस्थित होना पड़े।
बीस महीनों में सरकार ने घोषणाओं का अम्बार लगाया नई योजनाएँ, नए मिशन, नए उद्घाटन पर ज़मीन पर असर कम और यात्राओं की गिनती ज़्यादा रही। अब तो नौकरशाही भी समझ चुकी है कि असली मुहर कहाँ लगती है, इसलिए फाइलें भी भोपाल में नहीं, दिल्ली में मंजूरी के इंतज़ार में रहती हैं। यह वही दौर है जहाँ राज्य की राजनीति एक तरह से “संघ कार्यालय की शाखा” बन गई है, और मुख्यमंत्री को खुद अपनी नीति समझाने के लिए भी दिल्ली का दरवाज़ा खटखटाना पड़ता है।
जनता धीरे-धीरे इस यात्रा की भाषा समझने लगी है। अब हर बार जब विमानतल पर मुख्यमंत्री की तस्वीर आती है, लोग पूछते हैं फिर दिल्ली?” पहले उत्साह था, अब व्यंग्य है। पहले स्वागत था, अब सवाल हैं। प्रदेश की जनता को चाहिए विकास, रोज़गार, राहत लेकिन मुख्यमंत्री साहब का कैलेंडर राजधानी के नहीं, दरबार के हिसाब से भरा हुआ है।
बीस महीने में दिल्ली के इतने चक्कर लगाना किसी रिकॉर्ड जैसा है। अगर इस अवधि का एक हिसाब रखा जाए तो पाएँगे कि मुख्यमंत्री ने भोपाल में जनता दरबार से ज़्यादा दिन दिल्ली दरबार में गुज़ारे हैं। इस बीच प्रदेश की नौकरशाही, प्रशासनिक योजनाएँ और बजट प्रस्ताव सब वहीं अटके पड़े हैं जहाँ से चले थे। लेकिन सत्ता के केंद्र की राजनीति में सक्रिय रहना शायद आज के समय की अनिवार्यता बन गया है क्योंकि दिल्ली से दूरी, सत्ता से दूरी मानी जाती है।
यह कहानी किसी एक मुख्यमंत्री की नहीं, बल्कि उस प्रवृत्ति की है जिसमें “राज्य” अब “निर्भर इकाई” बनता जा रहा है। सत्ता की आत्मा दिल्ली में बस गई है और प्रदेश की आवाज़ वहाँ तक पहुँचते-पहुँचते फाइल बन जाती है। जनता के मुद्दे अब सिर्फ़ बयानों की पंक्तियों में दर्ज हैं, और घोषणाओं का भविष्य बस स्वीकृति की प्रतीक्षा में है।
कहते हैं कि मुख्यमंत्री अपने राज्य का चेहरा होता है, लेकिन जब चेहरा ही बार-बार दरबार की ओर झुकता है, तो जनता यह सोचने पर मजबूर हो जाती है कि असली शासन कहाँ हो रहा है भोपाल में या दिल्ली में? और यही सवाल अब हर गली, हर चौराहे पर घूम रहा है “मुख्यमंत्री हैं, या मध्यप्रदेश के दूत?”
बीस महीने की सत्ता, छह सौ आठ दिन का शासन और चार सौ दिन की यात्राएँ आंकड़े बस यही कहते हैं कि यह सरकार चल रही है, पर किस दिशा में, यह कोई नहीं जानता। दरबार की हाज़िरी जारी है, जनता की फ़ाइलें भी। फर्क बस इतना है कि दरबार में तारीफें मिलती हैं, जनता के बीच सवाल ? राजेंद्र सिंह जादौन
