सत्ता, प्रशासन और इतिहास की जीवंत धरोहर

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सत्ता, प्रशासन और इतिहास की जीवंत धरोहर
“वल्लभ भवन: जहां बनती है प्रदेश की तक़दीर”
अलीम बजमी. 03 जुलाई 2025 भोपाल।
शहर की अरेरा पहाड़ी पर शान से विराजमान बहुमंजिला वल्लभ भवन सिर्फ एक सरकारी इमारत नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश की राजनीतिक धड़कनों, प्रशासनिक निर्णयों और ऐतिहासिक उतार-चढ़ावों का मूक गवाह है। इसे कोई राज्य सचिवालय कहता है, कोई मंत्रालय, तो कोई वल्लभ भवन कहता है। तीन नाम से पहचान रखने वाली इस इमारत की दीवारों में केवल फ़ाइलों की सरसराहट नहीं, बल्कि राज्य हित में फैसले होते हैं। यहां नीतियां गढ़ी जाती हैं, योजनाओं को अमल में लाया जाता है और पूरे राज्य की प्रशासनिक धारा को दिशा मिलती है। यहीं से पूरे प्रदेश की नीति और नज़रिया तय होता है। यह इमारत नीति निर्धारकों का कार्यक्षेत्र नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश की दिशा और दशा गढ़ने वाली एक जीवित धरोहर है।
वल्लभ भवन सिर्फ कार्यालयों का जमावड़ा नहीं, बल्कि वह स्थान है, जहां से मध्यप्रदेश की तक़दीर लिखी जाती है-एक ऐसी धरोहर, जो समय के साथ-साथ सत्ता के कई सूरज उगते और डूबते देख चुकी है। इसकी हर दीवार कुछ कहती है, हर कोना कोई किस्सा बयां करता है।
आज जानिए, इसकी कहानी।
इस पांच मंजिला इमारत में मुख्यमंत्री, मंत्री मंडल सदस्य, मुख्य सचिव, अपर मुख्य सचिव, सचिव, उप सचिव समेत प्रदेश के अन्य अधिकारी और कर्मचारी बड़ी संख्या में बैठते हैं। यहां से राज्य के सभी विभागों, संचालनालयों और विभागाध्यक्षों की गतिविधियों की निगरानी होती है। सभी महत्वपूर्ण रिपोर्टें यहीं पहुंचती हैं और यहीं से तय होता है कि राज्य किस दिशा में अग्रसर होगा।
इतिहास की गर्द में चमकती इमारत
करीब 60 साल पुरानी यह इमारत भोपाल की अरेरा पहाड़ी पर बसी है, जो कभी नवाबी दौर में “अब्बास गढ़” के नाम से जानी जाती थी। यह पहाड़ी क्षेत्र शहर के मध्य और दक्षिणी हिस्सों को जोड़ता है। वल्लभ भवन जब अस्तित्व में आया, तब भोपाल एक उभरता हुआ नगर था- लेकिन काफी हद तक पिछड़ा हुआ था। उस दौर में भोपाल राजधानी तो था लेकिन जिला नहीं बना था। यह सीहोर जिले की एक तहसील हुजूर नाम से था।
इस ऐतिहासिक इमारत की नींव वर्ष 1958 में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने रखी थी। यह वह दौर था जब भोपाल को राजधानी बने महज दो वर्ष ही हुए थे। सचिवालय के लिए शहर में कई स्थल देखे गए, लेकिन अरेरा पहाड़ी की निर्जनता, ऊंचाई और रणनीतिक स्थिति ने इसे सर्वश्रेष्ठ विकल्प बना दिया।
डॉ. काटजू ने किया था चयन
कहा जाता है कि अरेरा पहाड़ी पर राज्य सचिवालय भवन निर्माण स्थल का चयन तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. कैलाश नाथ काटजू की दूरदृष्टि का परिणाम था। डॉ. काटजू ने ही इस भवन का नामकरण सरदार वल्लभ भाई पटेल के नाम पर किया था। प्रसंगवश यह बताना भी उचित होगा कि डॉ. काटजू स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के दौरान ख्यातलब्ध वकील होने के साथ ही एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड के संस्थापक सदस्य रहे। इस संस्था ने ही नेशनल हेराल्ड जैसे समाचार पत्र को प्रकाशित किया था। ऐसा भी कहा जाता है कि डॉ. काटजू, पंडित नेहरू के बेहद विश्वस्त माने जाते थे और दिल्ली से चयनित होकर सीधे भोपाल भेजे गए पहले ‘पैरा शूट सीएम’ के रूप में जाने जाते हैं। वर्ष 1993 में जब दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बने, तब इसे ‘मंत्रालय’ कहा जाने लगा और तभी से सरकारी दस्तावेजों में लिखा जाने लगा। हांलाकि वल्लभ भवन, राज्य सचिवालय और मंत्रालय-तीनों नाम एक ही भवन की पहचान हैं।
सियासी इतिहास का मूक साक्षी
वल्लभ भवन ने अब तक 18 मुख्यमंत्रियों का शासनकाल देखा है-कई बार राजनीतिक भूचाल के बीच सत्ता का बदलता चेहरा भी। इस भवन ने सत्ता की ऊंचाइयों को भी देखा है और उनके पतन की खामोश दास्तानों को भी सीने में दफन कर रखा है। यहां जर्रे आफताब बनते हैं, और कभी-कभी आफ़ताब भी गर्द में मिल जाते हैं।
स्थापत्य और सौंदर्य का संगम
वल्लभ भवन का निर्माण कार्य सात वर्षों में पूरा हुआ। जब तक यह भवन तैयार नहीं हुआ, तब तक सचिवालय पुराने शहर स्थित कलेक्टोरेट से संचालित होता रहा। यह उस दौर की सबसे ऊंची इमारत मानी जाती थी, जिसकी ऊंचाई लगभग 100 फीट है और यह 2,79,140 वर्ग फुट क्षेत्र में फैली हुई है।
पारंपरिक और आधुनिक शैली का है वास्तुशिल्प
इस भवन की वास्तुशिल्पीय भव्यता इसकी विशेषता है, यह पारंपरिक और आधुनिक शैली का अद्वितीय संगम है। हर मंजिल पर लम्बे हवादार गलियारे हैं, हर कमरे में प्राकृतिक प्रकाश की भरपूर व्यवस्था है। इसकी विशेषता यह भी है कि यहां से अरेरा पहाड़ी का दिलकश मंजर और हरियाली का मनमोहक दृश्य दिखाई देता है। यह दृश्य नज़ारा ही इस भवन को एक अलग ही शान बख़्शता है।
हर कोने में है एक दास्तान
वल्लभ भवन सिर्फ एक संरचना नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश की प्रशासनिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक पहचान है-एक जीवंत दस्तावेज़, जिसकी हर दीवार कुछ कहती है, हर कोना एक दास्तां बयां करता है।
अलीम बजमी. भोपाल

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