०प्रतिदिन विचार(01/05/2024) खेती में मुक्त व्यापार ? -राकेश दुबे

0
Spread the love
मुक्त व्यापार को लेकर दबाव का सिलसिला बढ़ता जा रहा है। इस साल की शुरुआत में यूरोप में विशाल किसान आंदोलन हुए। 27 यूरोपीय देशों में से 24 किसी न किसी स्तर पर विरोधों का सामना कर रहे हैं। इन आंदोलनों में फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (एफटीए) को ‘उखाड़ फेंकने’ का आह्वान कर रहे थे जिसकी वजह से यूरोप में भोजन व फल-सब्जियां सस्ते हो गये व घरेलू किसानों की आजीविका सुरक्षित करना मुश्किल हो रहा था।
फ्रांस अकेले अपनी फल और सब्जी की जरूरत का 71 प्रतिशत आयात करता है। भारत में, किसान आंदोलन 2.0 मुख्य रूप से कृषि उपज के लिए कानूनन बाध्यकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की मांग कर रहा है, और इसकी अन्य मांगों में भारत को विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) से हटने के लिए कहना भी शामिल है।
अमेरिकी वित्त समिति की हालिया सुनवाई में, सीनेटरों के सवालों का जवाब देते हुए, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) कैथरीन टाई ने कहा-‘हम कड़ी मेहनत करने वाले अमेरिकी परिवारों और समुदायों, विशेष रूप से हमारे ग्रामीण समुदायों के लिए बाजार खोल रहे हैं। बातचीत के माध्यम से, हमारे प्रशासन ने पिछले तीन वर्षों में नए कृषि बाजारों तक 21 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक की पहुंच सुनिश्चित की है,’ और आगे कहा, ‘इसमें वृद्धिमान बाजार, भारत के साथ 12 टैरिफ श्रेणियां शामिल हैं जो अमेरिकी निर्यातकों के लिए तरक्की का मौका हैं।’मेहनतकश अमेरिकी परिवारों और ग्रामीण समुदायों की सुरक्षा को लेकर अमेरिका की रुचि समझी जा सकती है, लेकिन भूमंडलीकरण के तहत हर देश को उन दसियों हजारों किसानों की आजीविका की भी रक्षा करनी चाहिए जो दुनिया के किसी और हिस्से में सस्ते आयातों के चलते तबाह हो जाते हैं।
एक बार जर्मन किसानों से भी कमोबेश इसी तरह का प्रश्न पूछा गया था, जो दक्षिणी जर्मनी के लैंड्सफुहल में एक फार्म हाउस में डिनर के दौरान जीएटीटी निर्यातकों के एक छोटे समूह से मिलने आए थे यह 1990 के दशक के मध्य में किसी समय का वाकया है। ‘तब खा गया था आप सरप्लस खाद्यान्न का उत्पादन करते हैं जिसके लिए आप दक्षिण में एक स्थाई बाजार की तलाश कर रहे हैं, लेकिन शायद आपको इस बात का अहसास नहीं है कि आप यहां जो सरप्लस अनाज पैदा करेंगे, वह भारत जैसे देशों में लाखों छोटे और सीमांत किसानों को उनके खेतों से दूर कर देगा। उन व्यापार वार्ताकारों के उलट, जो नष्ट हो रही कृषि आजीविका के बारे में दूर-दूर तक चिंतित हुए बिना, आजकल व्यापार वार्ता की अगुवाई करते हैं, वहां किसानों से जो उत्तरआया था , वह अत्यधिक समर्थन प्रदान करने वाला था। भारतीय किसानों के साथ एकजुटता व्यक्त करते हुए उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि उनका अधिशेष खाद्यान्न भारत में आजीविका को नष्ट कर देगा।
अब अमेरिका को भी उस असर का आकलन करना चाहिये जो बादाम, अखरोट और सेब समेत अन्य चीजों पर प्रतिरोधात्मक आयात शुल्क वापस लेने के बाद भारत पर पड़ेगा। समाचार रिपोर्टों के अनुसार, 20 प्रतिशत आयात शुल्क वृद्धि वापस लेने के बाद जब पहली खेप भारत के लिए रवाना हुई तो सिएटल बंदरगाह पर उत्सव मनाया गया। भारत वाशिंगटन के सेब के लिए 120 मिलियन डॉलर का बाजार प्रदान करता है, जिससे अमेरिका में 68,000 सेब उत्पादक किसानों को लाभ होगा। रिपोर्ट्स के मुताबिक, नवंबर 2023 में आयात शुल्क आंशिक रूप से वापस लेने के एक महीने के भीतर 19.5 मिलियन डॉलर मूल्य के वाशिंगटन सेब भारत भेजे गए।
यूएस कांग्रेस की सुनवाई में एक सीनेटर को यह कहते हुए उद्धृत किया गया था कि भारतीय गेहूं सब्सिडी कीमतों को बिगाड़ रही है और इससे अमेरिकी किसानों को नुकसान हो रहा है। एक अन्य सीनेटर ने चावल सब्सिडी के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि अगर चावल सब्सिडी डब्ल्यूटीओ के मापदंडों के भीतर होती, तो इससे अमेरिकी धान किसानों के लिए 850 मिलियन डॉलर के व्यापार के अवसर खुल जाते। ये सीनेटर भारत में एमएसपी व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं जिसके तहत खासकर पंजाब और हरियाणा में गेहूं और चावल उत्पादक किसान, उच्च सुनिश्चित कीमतों से लाभान्वित होते हैं। अमेरिका ने बार-बार कहा है कि भारत किसानों को उत्पाद-विशेष के लिए समर्थन की 10 प्रतिशत की सीमा से अधिक एमएसपी भुगतान करके डब्ल्यूटीओ की शर्तों का उल्लंघन करता है।
आश्चर्यजनक तौर पर, ये आक्षेप बार-बार उस देश द्वारा लगाये जाते हैं जो दुनियाभर के कपास उत्पादकों को हानि पहुंचाने के लिए अपने देश के कपास उत्पादकों को दी जाने वाली भारी-भरकम सब्सिडी को बंद करने में विफल रहा हो। अमेरिका द्वारा अपने किसानों को प्रदान की जाने वाली कपास सब्सिडी का विवादास्पद मुद्दा पश्चिमी अफ्रीका के देशों और भारत में लाखों कृषकों की आजीविका को खत्म करने के लिए जाना जाता है, साल 2003 में असफल कैनकन डब्ल्यूटीओ मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में एक प्रमुख मुद्दे के रूप में सामने आने के वक्त से अनसुलझा बना हुआ है

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *


Notice: ob_end_flush(): failed to send buffer of zlib output compression (0) in /home2/lokvarta/public_html/wp-includes/functions.php on line 5481