आंगन का काफल ट्री

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मैंने अपने बचपन में भी इसे ऐसा ही देखा था सुंदर ,युवा और फलदार। तब भी चैत- बैशाख में सारे गांव के बच्चे इसकी छांव में बैठते थे पेड़ पर चढ़ कर खूब काफल खाते थे।‌ वास्तव में यह आंगन के पीछे यानि (करयाड़ी) में है। आज भी काफल ट्री वैसा ही है। इसके देखते देखते एक दो पीढ़ियां पलायन कर चुकीं है। इसके अनेक पुराने साथी दुनियां छोड़ कर जा चुके हैं।इसके सामने के लगभग खेत बंजर हैं लेकिन यह यह शाश्वत सत्य की तरह खड़ा है। वैसी ही हरियाली और वैसी ही ताजगी।शायद इसे अपनी तरुणाई पर नाज भी होगा। गांव के बच्चे आज भी इसकी छांव में इकठ्ठे होते हैं ,बैठते हैं और ताजे फल खाते हैं।कुछ लोग बाजार में बेच भी आते हैं। कहने को यह हमारा है। लेकिन परमार्थ के लिए यह सबका है। लेकिन बैशाख में इसकी लालिमा पथिकों को भी आकर्षित करती है।
पता नहीं आगे और कितनी पीढ़ियां चैत बैशाख में इसकी छांव और स्वादिष्ट फलों का का आनन्द लेंगी। एक चिड़ियां “काफल पाको ” की धुन से सुबह -सुबह हमें जगा देती है। न जाने इसका भी कितनी पीढ़ियों से इस काफल ट्री की टहनियों में वास रहा होगा हम नहीं जानते।
मैंने अपनी आमा ( दादी ) और पिताजी के साथ भी इसके फल खाये थे। आज इसने उनकी स्मृतियां को भी जगा दिया।

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