जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर

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जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर पूज्यपाद स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज “पूज्य प्रभुश्री जी” के श्रीमुख से रामलीला दशहरा मैदान, नरेला (दिल्ली) में आयोजित ‘श्रीराम कथा’ के ‘तृतीय दिवस’ का कथा सार ।

 

श्रीराम कथा के ‘तृतीय दिवस’ की कथा सुनाते हुए पूज्य गुरुदेव जी कहते हैं कि भगवान श्रीराम भारत की संस्कृति के उच्चतम प्रतिमान हैं। राम भारत के भोर का प्रथम स्वर हैं, तथा भारत की सार्वकालिक अनुगूँज हैं। काशी में भगवान विश्वनाथ तारक मंत्र “राम” नाम बाँट कर जीव को मुक्ति प्रदान कर रहे हैं। “रामो विग्रहवान् धर्म: ..”

 

प्रभु श्रीराम के दिव्य चरित्र, उनकी महानता, करूणा, औदार्य को महर्षि वाल्मीकि ने देवर्षि नारद जी की प्रेरणा से श्रीमद् रामायण लिखते हैं। इसलिए आदिकवि ब्रह्मा जी को कहा गया है। ब्रह्मा जी ही अपनी सकल सत्ता का निवेश वाल्मीकि जी में करते हैं। ब्रह्मा जी ही महर्षि वाल्मीकि बनकर आते हैं।

 

जीवन में हमें वेद-विहित, शास्त्र सम्मत, महापुरुषों द्वारा आचरित और गुरू द्वारा उपदेशित मार्ग का अनुसरण करना चाहिए। सन्तों के दर्शन को महापुण्य बताया गया है। साधु-सन्त जन वेदमूर्ति होते हैं, क्योंकि वे हरपल ब्रह्म के आनन्द में रहते हैं। जैसे जितनी भी छोटी-बड़ी नदियाँ नित्य प्रति सागर की ओर दौड़ रही हैं, और अन्त में सागर में अपना सम्पूर्ण अस्तित्व मिटा दे रही हैं, ठीक वैसे ही जीव भी अन्त में उसी एक ब्रह्म में समाहित हो जाता है।

 

कोई भी साधन बिना श्रद्धा के सम्पन्न नहीं होता और बिना श्रद्धा के वह परम तत्व, निर्गुण-सगुण ब्रह्म साकार नहीं होता। समर्पण सर्वोत्तम साधना है। समर्पण के लिए श्रद्धा, विश्वास और शरणागति चाहिए। ईश्वर से जो हमारा सम्बन्ध वह कभी अलग नहीं है। जीवात्मा और परमात्मा के बीच में गुरु, मंत्र, साधना और महात्मा की आवश्यकता होती है। जीवात्मा और परमात्मा के बीच में गुरु, मंत्र और साधना ईश्वर से जोड़ता है, जिससे हम मंत्र के स्पंदन से, तरंगों से जुड़ जाते हैं। फिर हम मंत्र के माध्यम से उस ईश्वरीय सत्ता से जुड़ जाते हैं।

 

शास्त्र गुरु के बिना अधूरे हैं, क्योंकि बिना गुरु के शास्त्र समझ में नहीं आयेगा। गुरु परम्परा का नाम है। गुरु जीव का ब्रह्म से सम्बन्ध स्थापित कराकर पृथक हो जाते हैं। गुरु मार्ग का नाम है। “कौन बतावे मार्ग बिना गुरु …” गुरु नारद के रूप में, शिव के रूप में, ब्रह्मा के रूप में हैं। गुरु से जुड़ जाने के बाद दु:ख नहीं रहता, अज्ञान नहीं रहता, न्यूनतम मिट जाती है और अल्पता-अभाव का नाश हो जाता है।

 

विवेक हमें पाप कर्म से बचाता है। अन्न ब्रह्म है। यह अन्नपूर्णा का प्रसाद है। इसलिए अन्न का भोग लगाकर प्रसाद बनाइये। ज्ञान वैराग्य की सिद्धि के लिए अन्न का भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करना चाहिए। इससे बुद्धि शुद्ध रहती है। विद्या इष्ट की निकटता का बोध कराती है। विद्या विनय, समता, समन्वय और एकात्मता लाती है। विद्या हमारे आचरण से, वाणी-व्यवहार से तथा भाषा से प्रकट होनी चाहिए। “प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते । प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ।।”

 

अपना गुरु मंत्र, इष्ट मंत्र हरपल जपते रहें, जबतक कि यह आपका अभ्यास न बन जाए। ईश्वर का विधान सर्वथा निर्दोष है। उनके विधान में न्यूनता नहीं, दीनता और कोई अभाव नहीं रहता। आपका सम्बन्ध शास्त्र से, वेद से, गुरु से, धर्म से और सत्य से होना चाहिए, फिर आपका सम्बन्ध उस ब्रह्म से, ईश्वर से अपने आप हो जायेगा। ” श्रद्धावन लभते ज्ञानम् ..”। श्रद्धा से ज्ञान अपने आप चला आता है। इसलिए श्रद्धा सम्भाल कर रखें।

 

जब आप दूसरों को मान-सम्मान देंगे तो आपको भी दूसरों से मान-सम्मान, प्रतिष्ठा मिलेगी। जैसे – जब हम भगवान के लिए चन्दन घिसते हैं, तब पहले चन्दन हमारे हाथ में लगता है, भगवान के माथे पर तो बाद में लगता है। आपको अपनी दुर्बलता का पता होना चाहिए। “कर्म प्रधान विश्व रचि राखा। जो जस करहिं, तासु सफल चाखा ..”।। महर्षि विश्वामित्र जी अयोध्या में आए। राजा दशरथ ने ऋषि विश्वामित्र की पूजा-अर्चना कर हाथ जोड़कर खड़े हो गए। यज्ञ की रक्षा के लिए और ताड़का वध के लिए विश्वामित्र ने राम लक्ष्मण को माँग लिया।

 

पूज्य गुरुदेव जी कहते हैं कि आश्रम में जीवन जीने की कला सिखाई जाती है। आश्रमों में अध्ययन, अध्यापन, अभ्यास और व्यवहार का कार्य निरन्तर चलता रहता है। पूज्य गुरुदेव जी ने देवी अहिल्या उद्धार की बड़ी ही मार्मिक और कारुणिक प्रसंग सुनाया। क्रोध मारक होता है, हिंसक होता है। क्रोध में हमेशा हानि ही होती है। क्रोध, आवेश और तूफ़ान के समाप्त होने के बाद ही पता चलता है कि कितनी क्षति हुई, अथवा कितनी हानि हुई है। और यही स्थिति महर्षि गौतम के साथ हुआ। अब वे पश्चाताप में हैं। फिर वे देवी अहिल्या को भगवान श्रीराम के द्वारा उनकी मुक्ति का उपाय बताते हैं। मुक्ति के 5 प्रकार हैं – सायुज्यता, शारूप्यता, शालोक्यता, सामीप्यता और कैवल्य। उद्धार के बाद भगवान श्रीराम ने देवी अहिल्या को उनके पतिलोक भेज दिया। अहिल्या उद्धार के बाद श्रीराम ने गंगा स्नान-पूजन किया। तत्पश्चात, गुरु विश्वामित्र जी राम-लक्ष्मण के साथ मिथिला पधारे।

 

मिथिला में राजा जनक जी गुरु के साथ दोनों भाइयों को देखकर चकित हैं। मानो उन्हें समाधि लग गई हो, उन्हें लगा कि मेरे यहाँ तो साक्षात परब्रह्म परमात्मा ही आ गए हैं। सभी नगरवासी, युवतियाँ आदि अपने झरोखों से राम को निहार रहे हैं। गुरु विश्वामित्र जी से आज्ञा लेकर राम अपने भाई लखन जी के साथ पुष्प वाटिका में पूजा के पुष्प लेने गए। वहीं पुष्प वाटिका में जगत जननी माँ जानकी से भगवान राम का साक्षात्कार होता है। और, सीता जी अपने मनोकामना की पूर्ति के लिए माता पार्वती की पूजन के लिए मन्दिर गई हैं।

 

धनुष यज्ञ सभा में एक से बढ़कर एक राजा, महाराजा आये थे। लेकिन किसी से भी धनुष तिल भर भी नहीं हिला। तब गुरु विश्वामित्र जी की आज्ञा पाकर राम ने मन ही मन गुरु को प्रणाम किया तथा बड़े ही सहज भाव से धनुष को तोड़ दिया। सीता जी ने प्रभु श्रीराम जी के गले में जयमाला डाल दिया। देवताओं ने पुष्प वर्षा की। पूरे जनकपुर में हर्षोल्लास और आनन्द छाया है।

 

राजा जनक जी ने अयोध्या में राजा दशरथ जी को बारात लाने की सूचना भेजवाते हैं। अयोध्या से गुरुजनों को आगे कर राजा दशरथ जी ने बड़े ही उल्लास व उमंग के साथ बारात लेकर जनकपुर पहुँचे। पूज्य गुरुदेव जी ने चारों भाइयों राम-सीता, भरत-मांडवी, लक्षमण-उर्मिला और रिपुदमन-श्रुतिकीर्ति के विवाह का अद्भुत प्रसंग सुनाया।

 

इस अवसर पर आज के मुख्य यजमान आदरणीय श्री सूरेश गुप्ता जी, आदरणीय श्री जयप्रकाश जी, आदरणीय श्री मुकेश सैनी जी, आदरणीय श्री राजेन्द्र सैनी जी, आदरणीय श्री अशोक गुप्ता जी, आदरणीय श्री पवन गोयल जी, प्रसिद्ध समाजसेवी आदरणीय श्री विजय पहलवान जी, काशी से पधारे विद्वान पूज्य श्री स्वामी दयानन्द जी महाराज, महामण्डलेश्वर पूज्य श्री स्वामी अपूर्वानन्द गिरि जी महाराज, पूज्य श्री स्वामी कल्याणानन्द जी महाराज, पूज्य श्री स्वामी ज्ञानानन्द गिरि जी महाराज, पूज्य श्री स्वामी रामात्मानन्द गिरि जी महाराज समेत अनेक पूज्य सन्त गण, प्रभु प्रेमी संघ के पदाधिकारी गण, शासन-प्रशासन के अनेक अधिकारी गण एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालु भक्तों की उपस्थिति रही।

 

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