मेरे गुरु श्री महेश श्रीवास्तव जी के जन्मदिन पर मेरे मित्र अलीम बजनी द्वारा जन्मदिन पर लिखी अग्रिम बधाई

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आदरणीय महेश श्रीवास्तवजी को जन्मदिन की अग्रिम बधाई।

पत्रकारिता में व्यवस्था की मृदंग पर न कभी राग जयजयवंती

गाया, न ही ऐसी किसी ताल को अपने शब्द स्वर दिए

अलीम बजमी. 25 दिसबंर 2024।

श्री महेश श्रीवास्तवजी। भोपाल दैनिक भास्कर के पूर्व संपादक। कवि, लेखक, पत्रकार। मध्यप्रदेश गान, नर्मदा एवं सिंहस्थ गानl के रचयिता। शुक्रवार 27 दिसंबर को उनका जन्म दिन हैं। वे युवा पत्रकारों के मार्गदर्शक है। प्रेरणा स्त्रोत है। मेरे जैसे सैकड़ों पत्रकार उनके शार्गिद हैं। हम सभी उनके दीर्घायु और चिरायु होने की मंगल कामना करते हैं। मोहक मुस्कान के साथ उनकी स्मरण शक्ति भी अद्भुत है। महेशजी की विशेषता ये है कि न तो कोई दंभ, न कोई अहंकार। सबके प्रति उनका व्यवहार आत्मीय। उनकी भाषा में माधुर्य है तो अपने शिष्यों को सरलता, सहजता से सीख देने का फन भी अनूठा है।

वे हिंदी साहित्य, परंपरा, भारतीय संस्कृति, राजनीतिक घटनाक्रमों आदि के जानकार के रूप में भी शब्द पालिका में पहचान रखते हैं। उनकी कविताएं, प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य से साक्षात्कार कराती है। उनका लेखन आतिशी हैं। भाषा के सौंदर्य का खजाना उनके पास है। महेशजी ने अपने लेखन में शब्दों के चरित्र की मर्यादा का सदैव ख्याल रखा। पौराणिक प्रसंगों के उदाहरण से बात कहने का फन भी उनका अनूठा है। वे हिंदी भाषा के हिमायती के रूप में पहचान रखते हैं। दैनिक भास्कर में मैंने, संपादक के रूप में उनका कठोर व्यक्तित्व भी देखा। लेकिन सहयोगियों के बीच निर्मल हृदय के धनी के रूप में भी जाना। पत्रकारिता में व्यवस्था की मृदंग पर न कभी राग जयजयवंती गाया। न ही ऐसी किसी ताल को अपने शब्द स्वर दिए। कुर्सीदासों की महफिलों की रौनक भी कभी नहीं बने। सर या बास शब्द से हमेशा परहेज रखा। भाई साहब के नाम से हरेक के बीच लोकप्रिय हैं।

भोपाल में हिंदी पत्रकारिता को उसका ध्येय पथ दिखलाने में उनकी अहम भूमिका रही। उनके लेखन में हिंदी पत्रकारिता और हिंदी साहित्य का सम्मिश्रण कई अवसरों पर नजर आया तो पत्रकारिता के माध्यम से भारतीय संस्कारों की अलख को सदैव ज्योति देने का काम किया। कई अवसरों पर प्रतीत हुआ कि हिंदी शब्द संपदा का उनके पास अथाह भंडार है। उनका शब्दानुशासन अद्भुत, प्रेरक के रूप मे हैं। उन्हें शब्द साधक के रूप में भी संबोधित किया जाता हैं। उनके लेखन में प्रकृति, लोकतत्‍व, बौद्धिकता, सर्जनात्‍मकता, काव्‍यात्‍मकता भी देखने को मिलती है। कई अवसरों पर पौराणिक प्रसंगों के माध्यम से पाठकों को भारतीयता, दर्शन, अध्यात्म आदि का साक्षात्कार कराया। सरल-सहज शब्दों में कहे तो मर्म को समझाया। यही कारण था कि वर्ष 1980 से 2000 तक विशेष संपादकीय के रूप में उनके लेखन को देश के कोने-कोने में सराहा गया। महेशजी ने अपने पत्रकारीय जीवन में लोक हित के मुद्दों को ज्ञान और विचारों की समीक्षात्मक टिप्पणियों के साथ जन-जन तक पहुंचायां। पत्रकार एवं कवि के रूप में वे अपने कार्यों, कर्तव्यों और लक्ष्यों का विवेचन भी करते। उनका यह गुण अन्य पत्रकारों में दिखाई नहीं देता। सदैव निष्पक्ष, निर्भीक एवं आदर्श पत्रकारिता के निर्माण का मार्ग भी प्रशस्त किया। वे जानते हैं कि पत्रकारिता समय के साथ समाज की दिग्दर्शिका और नियामक इकाई है। खबर पालिका में भाषा की दृष्टि से विविधता और बहुरूपता मिलेगी। नए-नए प्रयोग, किस्से, कहानियां, आरोप-प्रत्यारोप आदि चुनौतियों के रूप में सामने आएंगे। इसको ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपने संपादकीय कार्यकाल में अत्यधिक सतर्कता बरती। इसकी सीख भी अपने शिष्यों को दी। यही कारण था कि उनका कैरियर काजल की कोठरी में बेदाग है। इसका उल्लेख इसलिए भी कि पत्रकारों को भटकाव के लिए राजनीति, प्रशासन से जुड़ा एक वर्ग सदैव तत्पर रहता हैं।

वहीं, पत्रकारिता में महेशजी द्वारा पल्लवित, पोषित और विकसित सैकड़ों पत्रकार आज भी उनके बताए मार्ग पर चलते हुए नैतिकता, मर्यादा, शुचिता की ज्योत जलाएं हुए हैं। इसके लिए आदरणीय महेशजी को साधुवाद। धन्यवाद। विनम्रता पूर्वक आभार भी। हांलाकि शहर में प्रगतिशीलों की जमात उनसे वैचारिक फासला रखती है लेकिन उनकी मेधा और व्यक्तित्व की महनीयता को मान देने में कभी पीछे नहीं रही।

अब थोड़ा फ्लैश बैक में चले तो ये जानिये- सादगी पसंद महेशजी ने पत्रकारिता की शुरुआत बतौर रिपोर्टर 1960 के दशक से शुरू की। अंग्रेजी में पोस्ट ग्रेज्युट होने के कारण बतौर लेक्चरर उनको सरकारी नौकरी मिल गई। लेकिन सरकारी नौकरी में दिल नहीं रमा। वकालत की भी डिग्री भी उन्होंने ली थी लेकिन व्यवस्था के खिलाफ उनके हृदय में जलती ज्योत पत्रकारिता में खींच लाई। दिल्ली से प्रकाशित होने वाली पत्रिकाओं में छपने लगे। यद्यपि महेशजी की कलम का जादू था कि दिल्ली से लेकर यूपी तक के कुछ अखबारी घराने उन्हें अपने से जोड़ने को इच्छुक थे लेकिन भास्कर के प्रति निष्ठा ऐसी कि महेशजी ने भोपाल नहीं छोड़ा। वे भास्कर में पदोन्नत होते-होते संपादक जैसे महत्वपूर्ण पद पहुंचे। करीब 12 साल तक इस पद का जिम्मा संभाला। सेवानिवृत होने के एक साल बाद वे संस्थान से विदा हुए। हालांकि सेवानिवृति के बाद भास्कर पत्र समूह के चेयरमैन स्वर्गीय श्री रमेश चंद्र अग्रवालजी ने उन्हें संपादकीय सलाहकार के रूप में एक साल तक रोके रखा लेकिन दिसंबर 2001 में उन्होंने रमेशजी से आग्रह करते हुए भास्कर से विदाई ले ली।

इस नाचीज को महेशजी के अधीनस्थ करीब बीस साल तक संपादकीय विभाग में काम करने का मौका मिला। महेशजी ने ही मुझे बतौर प्रूफ री़डर के रूप में नियुक्ति दी थी। बाद में उन्होंने ही रिपोर्टर बनाया। भास्कर में सेवाएं देते हुए मैंने महेशजी को बहुत करीब से देखा। वे हमेशा लम्बेरेटा स्कूटर से चलते। आसमानी कलर की वो स्कूटर उनके जीवन के कई बसंत की गवाह रही। दफ्तर में संपादक के रूप में काफी सख्त मिजाज रखते। लापरवाही कभी बर्दाश्त नहीं करते। डांटते भी खूब। अनुशासन में सबको बांधकर रखते। यद्यपि कई बार कोई बड़ी गलती होती तो महेशजी के धमूके (मुक्के) खाने को मिलते। कई अवसरों पर न्यूज रूम के बोझिल माहौल को वे हास-परिहास और ठहाकों से भी दूर करते। इसके इतर उनका चेहरा एक अभिभावक के रूप में भी रहा। उदाहरण के रूप में भास्कर मैं नौकरी करता हुआ पोस्ट ग्रेज्युट हुआ। परीक्षा के दिनों में महेशजी मुझसे कोई काम नहीं कराते लेकिन पूरे समय दफ्तर में बैठकर पढ़ना होता और परीक्षा देने के बाद उनके पास सीधे जाना पड़ता कि पेपर कैसा हुआ।

किसी भी खबर को लेकर उनका फोकस कंटेट पर रहता। विशेष अवसरों पर पहले पेज की वे खुद डमी बनाते। उस दिन पेज के सभी शीर्षक उनके होते। पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या वाले दिन उन्होंने पूरा अखबार अन्य खबरों से खाली करा दिया था। उनका मत था कि पाठक सिर्फ इंदिराजी से जुड़े पहलुओं के बारे में जानना चाहेगा। उस दिन उनकी लिखी विशेष संपादकीय काले सूरज का दिन ने लोगों की आंखों को नम कर दिया था।

इस घटना के कुछ ही दिन बाद भोपाल में विश्व की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी यानी गैस कांड हुआ। इस घटना से पूरे विश्व को स्तब्ध कर दिया। तब महेशजी की लाशों से उठा सवाल शीर्षक से लिखी विशेष संपादकीय को काफी सराहना मिली थी। इसी प्रकार अर्जुन सिंह के मुख्यमंत्री पद से हटने पर उन्होंने- हे, अर्जुन हर मनुष्य अपनों कर्मों का ही फल यही भोगता होता है, शीर्षक से विशेष संपादकीय लिखी, जिसकी देश में काफी चर्चा हुई। सुंदरलाल पटवा के मुख्यमंत्रित्व काल में 27 हजार कर्मचारियों के तबादले होने पर उन्होंने तीखे शब्दों में अपनी नाराजगी जताते हुए विशेष संपादकीय श्रीमान कर्मचारी फुटबाल नहीं होते शीर्षक से लिखी। इसका असर ये हुआ कि थोक में जारी तबादला आदेश वापस हुए। इसी तरह की उनकी एक विशेष संपादकीय स्वागत है, लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी का, भी खूब चर्चा में रही। वे भोपाल के पहले ऐसे संपादक रहे, जिन्हें राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के दल के साथ कई बार विदेश जाने का मौका मिला।

अब बात महेशजी के संपादकीय व्यवहार की। वे अपने सहयोगियों से कितना स्नेह रखते थे, इसका एक उदाहरण। नसरुल्लागंज के संवाददाता रेवाशंकर शर्मा ने सीहोर जिले से अवैध बस संचालन को लेकर एक खबर की। खबर के प्रकाशन से नाखुश हुए बस मालिक ने श्री शर्मा पर जानलेवा हमला कर दिया। इस घटना से महेशजी इतने व्यथित हुए कि उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री मोतीलाल वोरा के समक्ष अपनी नाराजगी जताई। वोराजी उनके तेवर को समझते हुए बोले- वे खुद शर्माजी को देखने अस्पताल जाएंगे। दोषियों को 24 घंटे के अंदर कानून के शिकंजे में कस लिया जाएगा। हुआ भी ऐसा ही। यही नहीं दफ्तर में कोई साथी बीमार होता तो महेशजी उसके स्वास्थ्य को लेकर चिंतित रहते। कुछ की ड्यूटी उस साथी की मदद के लिए लगा देते। दफ्तर में उनकी प्राथमिकता सहयोगियों को भाषा के संस्कार देने की हमेशा रही। भाषा को लेकर वे सबको समय-समय पर सचेत करते। नवोदित पत्रकारों के लिए वे हमेशा प्रेरक रहे। इसकी वजह उनका लेखन और प्रोत्साहन करने वाला चरित्र। वे खुद प्रयोगधर्मी रहे तो लेखन में भी नए प्रयोग करने के पक्षधर रहे।

यद्यपि हुक्मरानों से रिश्ता और उनकी कृपा पाने के अभिलाषियों में पत्रकारों का एक वर्ग सक्रिय रहता। ये वर्ग अब भी विद्यमान है। लेकिन महेशजी को पूर्व मुख्यमंत्री श्री मोतीलाल वोरा, श्री सुंदर लाल पटवा,श्री दिग्विजय सिंह, श्री बाबूलाल गौर ने कई बार सरकारी बंगला देने की पेशकश की। लेकिन उन्होंने उसे अत्यंत विनम्रता से अस्वीकार कर दिया। उनका मानना था कि सरकार से एक बार मदद लेने के बाद कहीं-न-कहीं वह बोझ मुझे स्वतंत्र रूप से लिखने में बाधक बनेगा। जाने-अनजाने में ही सही उनको यह कृपा कचोटेगी। इस कारण पुराने शहर के शाहजहांनाबाद में स्थित रामनगर कॉलोनी में वे लंबे समय तक रहे। हांलाकि यहां उन्हें कई तरह की व्यवहारिक कठिनाई होती। लेकिन वे संतोष करते। महेशजी को महाभारत और रामायण के कई पौराणिक प्रसंग कंठस्थ है। खास तौर पर महाभारत कथा में कुंती पुत्र कर्ण उनके प्रिय पात्रों में रहा। कर्ण के व्यक्तित्व और कृतित्व का वर्णन करने का उनका अलहदा लहजा है। वो भी अनूठा। कर्ण पर उन्होंने पुस्तक भी लिखी हैं। पत्रकारिता में उत्कृष्ट अवदान के लिए उन्हें गणेश शंकर पत्रकारिता पुरस्कार 2012 से भी नवाजा गया। इसके अलावा उन्हें असंख्य पत्रकारिता सम्मान पुरस्कार भी मिले हैं।

इतिहास रच दिया: महेशजी ने मध्‍यप्रदेश से अपने रिश्ते का अहसास कराते गीत की रचना करके इतिहास रच दिया। बहुत कम लोगों को पता होगा कि मप्र की स्थापना के पांच दशक होने पर मध्यप्रदेश गान की परिकल्पना की गई। प्रदेश के कई गीतकारों से गीत लिखवाए गए। उन गीतों पर काफी मंथन हुआ। यह बात वर्ष 2008-09 की है। लेकिन आम राय नहीं बनी। ऐसे में महेशजी से आग्रह किया गया तो उन्होंने मध्यप्रदेश की प्रकृति, उसके नैसर्गिक चरित्र, कला, सौंदर्य से लेकर दर्शन, शौर्य, पराक्रम, इतिहास, सामाजिक सरोकार और वर्तमान को समाहित करते हुए गीत लिखा। इस गीत को आम राय से राज्य शासन का अधिकारिक मध्यप्रदेश गान माना गया। गीत का पहला मुखड़ा इस प्रकार से है- सुख का दाता सब का साथी शुभ का यह संदेश है, मां की गोद, पिता का आश्रय मेरा मध्यप्रदेश है। विंध्याचल सा भाल नर्मदा का जल जिसके पास है, यहां ज्ञान विज्ञान कला का लिखा गया इतिहास है।

अंत में: आदरणीय महेशजी को जन्म दिन की बहुत-बहुत बधाई। वे सदैव स्वस्थ रहे। इस मंगल कामना के साथ उनका आशीर्वाद एक गुरू, अभिभावक और बड़े भाई के रूप में मुझे सदैव मिलता रहे।

अलीम बजमी,

दैनिक भास्कर भोपाल

alimbazmi786@gmail.com

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