अधर्मयुग की विलाप गाथा ………….

अधर्मयुग की विलाप गाथा ………….
कोई स्वयं को बदलना नहीं चाहता, न कोई अपने भीतर झाँकना चाहता।
ज्ञान की बातें अब बेमानी हो चलीं, अधर्मी युग में अधर्म ही सब पर भारी है।
न्याय के मंदिर में होती बोली, जहाँ सच भी नोटों पर बिकता है।
ईमान का गला घोंटकर, अधर्म अब हर ओर पर दिखता है।
पक्ष – विपक्ष में भेद अनेक, रुपयों के नाम पर सब अनंत एक|
आरोप प्रत्यारोप भर नाम का, पैसों के आगे ईमान किस काम का|
सत्ताएं बदलती देखी, बेईमानी का चेहरा नहीं बदला|
चोरी के नए नयें ढंग देख भगवान भी चिंता से दुबला||
मैटेरियलिस्टिक गटर में लोटते लोग, अपने पापों पर गर्व कर रहे।
मूल्य और धर्म को तजकर, स्वार्थ के पथ पर बढ़ रहे।
धन की अंधी भूख ने, संवेदनाओं को पत्थर बना दिया।
सत्य को अब सौदेबाजी, न्याय को बिकाऊ बना दिया।
सत्ता के गलियारे सोने से मढ़े, पर भीतर से खोखले और धुंधले।
बाबुओं के घर खजानों से भरे, चाय की प्याली वाले करोड़पति बने।
फाइलों में छिपा सत्य, घूस के कागजों में कैद हुआ?
नोटों की बारिश में नहाती व्यवस्था, सत्य और सेवा का नाम मिटाती।
गली गली में छल का बोलबाला, हर डेस्क पर दलाली का गडबड झाला ।
चोरी अब हुनर बन चुकी है, सत्ता के गलियारों में पल रही।
प्रकृति की कराहें अनसुनी, वन, जल, और मिट्टी सब लूटे गए।
धरती माँ की हरियाली भी, बाबुओं के बंगलों में बंधक हुई।
सत्ता ने खुद को मसीहा बताया, पर जनता की चीखें अनसुनी कर दीं।
सड़क, हर पुल, घोटालों के गवाह, सच, अब अंधेरों में सिसकता।
मानव जाति पर असुरों शक्ति, हर सीमा को लांघ चुकी।
प्रकृति चीख-चीख कर पुकार रही, मानव की कृतियों का हिसाब मांग रही।
धरती की छाती फट रही है, पर मानवता, मदांध, सब कुछ नकार रही।
नदियाँ अब विष की धार बन गईं, वन, पत्थरों के जंगल बन गए।
आकाश भी रो रहा चुपचाप, वायु संग ज़हर समा गए।
जीवन को व्यापार बना दिया, हर सांस को भी बिकाऊ कर दिया।
ममता, करुणा, प्रेम के सागर, अब बस किताबों के किस्से बन गए।
सत्ता अब बुढ़ी आँखों का सपना, युवाओं की हिम्मत अपमान बन गई।
कोई कब तक खैर मनाएगा, जब उसका गुनाह सबके सामने आएगा।
ईश्वर का CCTV हर वक्त चलता है, हर एक का हिसाब पल-पल बनता है।
“सत्य की अग्नि बुझती नहीं, अधर्म का हर ताज गिरता है।
जब ईश्वर का आक्रोश उबलता है, धर्म का दीप फिर जलता है।”
अतुल विनोद
