बुलडोजर न्याय या तालिबानी संस्कृति ?

0
Spread the love

देश के भाजपा शासित राज्यों में बुलडोजर न्याय एक बार फिर से चर्चा में है । मध्यप्रदेश ,उत्तर प्रदेश और हरियाणा में बुलडोजर के जरिये त्वरित न्याय देने की गैरकानूनी कोशिश की गयी है। कांग्रेस नेता प्रियंका गाँधी की टिप्पणी ने इस तरीके की वजह से मध्यप्रदेश की सरकार को आड़े हाथों लिया है। अब सवाल ये है कि हमारी सरकारें अपराध होने के बाद अपराधियों को सजा देना चाहतीं हैं या अपनी खीज मिटाना चाहती है। संयोग से बुलडोजर का शिकार देश के अल्पसंख्यक ही हुए हैं।
प्रियंका गांधी द्वारा ‘बुलडोजर न्याय’ को अस्वीकार्य बताए जाने पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने शनिवार को अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि कोई भी शख्स कानून से बड़ा नहीं है और जो भी य तोड़ रहे हैं उनके खिलाफ संविधान के तहत कार्रवाई हो रही है।अब मुख्यमंत्री को ये जानने की जरूरत है की कार्रवाई संविधान कि तहत नहीं बल्कि न्याय विधान कि तहत की जाती है । बुलडोजर संहिता का जिक्र देश कि संविधान में तो कहीं है नहीं।
मध्यप्रदेश ने बुलडोजर संहिता शायद उत्तर प्रदेश से सीखी है। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार ने दस साल पहले बुलडोजर का इस्तेमाल अपराधियों के खिलाफ शुरू किया था हालाँकि इस बुलडोजर संहिता को देश की किसी संसद या विधानसभा ने पारित नहीं किया है। भाजपा शासित सरकारों ने भू-माफिया की कमर तोड़ने के साथ ही ,और बलात्कार ,हत्या जैसे अपराधों के बाद बुलडोजर के जरिये आरोपियों की स्थावर सम्पत्ति को बुलडोज करने की मुहिम शुरू की थी।
बुलडोजर संहिंता का इस्तेमाल करने वाली भाजपा सरकारों का तर्क होता है कि अपराधियों की स्थावर सम्पत्ति सरकारी जमीनों पर अवैध रूप से बनाई गयी है इसलिए उसे तोड़ा जाता है। सरकार से कोई ये नहीं पूछा कि जब कोई सरकारी भूमि पर अतिक्रमण कर निर्माण कर रहा होता है ,तब सरकार कहाँ होती है ? सरकार की आँख तभी क्यों खुलती है जब सम्पत्ति का मालिक किसी अपराध में आरोपी बना दिया जाता है ? उत्तर प्रदेश में बुलडोजर का इस्तेमाल व्यक्ति विशेष के साथ ही सामूहिक रूप से भी किया गया ,और किया जा रहा है। हाल ही में अयोध्या और कन्नौज में बुलदजार चले। मध्य्प्रदेश के छतरपुर में अपराधियों कहें या आरोपियों के खिलाफ बुलडोजर का इस्तेमाल किया गया। देवयोग से बुलडोजर का शिकार सभी लोग गैर भाजपाई निकले।
मध्यप्रदेश में 19 महीने की कांग्रेस सरकार ने भी बुलडोजर का इस्तेमाल किया था ,लेकिन कांग्रेस की कमलनाथ सरकार ने बुलडोजर केवल और केवल भूमाफिया के खिलाफ चलाया था और उसे अच्छा जनसमर्थन मिला था। कांग्रेस के बुल्डोजर ने भाजपा समर्थित भूमाफिया को निशाना बनाया था ,किन्तु भाजपा सरकारों के बुल्डोजर केवल और केवल अल्पसंख्यकों को अपना निशाना बना रही है ,इसलिए उसे जन समर्थन नहीं मिल रहा। आम धारणा ये हैकि ये भाजपा सरकारों की देश की मौजूदा न्याय व्यवस्था के समानांतर तालिबानी न्याय व्यवस्था की स्थापना करने की कोशिश घातक है। आपको याद होगा कि अफगानिस्तान में तालबानियों ने बामियान की बुद्ध मूर्तियों को बारूद से उड़ा दिया था।
भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में समानांतर न्याय व्यवस्था से समाज में लगातार असंतोष बढ़ता जा रहा है और अब ये व्यवस्था राजनीतिक मुद्दा बन रहा है। उत्तर प्रदेश में तो अल्पसंख्यकों की पूरी एक बस्ती को एक सरकारी योजना के नाम पर जमीदोज कर दिया गय। उत्तराखंड में भी भाजपा सरकार ने अल्पसंख्यकों के खिलाफ बुलडोजर का इस्तेमाल किया। दरअसल बुल्डोजर का काम विध्वंश का है ही नहीं। उसे जिस काम के लिए बनाया गया है वो काम उससे न लेकर सरकारें इस भारी-भरकम मशीन के जरिये समुदाय विशेष के खिलाफ बदले की कार्रवाई कर रही है। मध्यप्रदेश की बुलडोजर प्रेमी तत्कालीन शिवतराज सिंह सरकार ने ग्वालियर में एक बलात्कार के आरोपी के खिलाफ तमाम दबाबों के बावजूद बुलडोजर का इस्तेमाल नहीं किया क्योंकि आरोपी भाजपा समर्थक और उच्च जाति का था।
बुलडोजर की आँखें नहीं होतीं। बुलडोजर का नियंत्रण एक चालक के हाथ में होता है और बुलडोजर का चालक सरकारी मुलाजिम होता है। उसकी कमान सरकार के हाथ में होती सरकार।सरकार अपनी गलतियों को छिपाने के लिए बुलडोजर का इस्तेमाल करती है। हर प्रदेश में सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करने की सामूहिक प्रवृत्ति है। लेकिन राजनीतिक रूप से प्रभुत्व सम्पन्न अतिक्रमण में सबसे आगे रहते हैं किन्तु उन्हें बुलडोजर नहीं पहचानता। अतिक्रमणकर्ताओं को सरकारें पहचानतीं हैं लेकिन ये पहचान भी तब होती है जब वे किसी अपराध में आरोपी बन जाते हैं। अंधे बुलडोजर ने अतीत में ऐसी सम्पतियों को भी बुलडोज कर दिया जो आरोपी की थी ही नही। आरोपी उनमें किराये से रहते थे। यानि आरोपी कोई और ,सम्पत्ति किसी और की लेकिन उसे भीउसे भी नहीं बख्शा गया।
मुझे याद आता है कि ये ध्वंसात्मक प्रवृत्ति पहले नौकरशाही में थी। सरकार में नहीं। एक जमाने में मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में राजनीतिक विरोधियों और भूमाफियाओं के खिलाफ ऐसी ही ध्वंसात्मक कार्रवाइयां की गयीं थी । तब बुलडोजर का नहीं बल्कि बारूद का इस्तेमाल किया जाता था । तब मध्य्प्रदेश में सरकार कांग्रेस की थी और उस कार्रवाई को जनसमर्थन भी खूब मिला था ,क्योंकि तब सरकार के निशाने पर कोई जाति विशेष का व्यक्ति नहीं होता था। ग्वालियर में दशकों पहले पुलिस के एक सिपाही की हत्या के बाद तत्कालीन एसपी आसिफ इब्राहिम ने न सिर्फ आरोपी के घर में तोड़फोड़ कराई थी बल्कि आरोपी को भी दिन दहाड़े एक कथित मुठभेड़ में मार गिराया था। ये त्वरित न्याय है या तालिबानी न्याय ? ये तय करना कल भी जरूरी था और आज भी जरूरी है। तकलीफ की बात ये है कि देश की अदालतें बुलडोजर संहिंता के इस्तेमाल के मामले में मौन साधे हुए हैं। मेरा निजी विचार ये है कि बुलडोजर संहिता एक असभ्य और गैरकानूनी विधा है। इस पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए न कि इसे प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। यदि बुलडोजर ही न्यायाधीश बन जायेंगे तो आने वाले दिनों में अदालतों की जरूरत ही किसे होगी ?
@ राकेश अचल
achalrakesh@1959@gmail.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *


Notice: ob_end_flush(): failed to send buffer of zlib output compression (0) in /home2/lokvarta/public_html/wp-includes/functions.php on line 5481