
पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों का अनुसरण, अनुपालन और संवर्धन से आशय किसी एक सम्प्रदाय के सशक्तिकरण से नहीं, अपितु वैश्विक हित व मानवीय मूल्यों के संरक्षण से है, इसीलिए भारत को ज्ञान आलोक के प्रसार का देश कहा जाता है। हम भारतीय विश्व शान्ति निमित्त नित्य प्रार्थना करने वाली सनातन संस्कृति के उपासक होने पर अत्यन्त गौरवान्वित हैं ..। सनातन धर्म प्राचीन धर्म है। साक्षात् ईश्वर ने सनातन धर्म की स्थापना की है। यह अनादि और अनन्त है। सनातन का अर्थ जो नित्य शाश्वत और समाचीन है। जो हर पल है, और वो तब से है जब से धरती, गगन, अम्बर है और जब से मानवीय अस्तिस्व है। वो तब से है जब से जैव जगत है। सनातन का अर्थ है, जो सबके हित की बात करता है। जो सबके लिए है वो सनातन है। हमारे यहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। सनातन वो है, जहाँ अभिव्यक्ति का सौन्दर्य है। हम किसी भी ढंग से पूजा कर सकते हैं। यहाँ कोई संकीर्णता नहीं है। भारतीय वैदिक-सनातन संस्कृति सभी के सम्मान-स्वाभिमान व अधिकारों के प्रति उदार-संवेदनशील है। सनातन वह जीवन-दर्शन है, जो प्रकृति को वश में करने का समर्थन नहीं करता। यों तो प्रकृति को पराजित करके उसको अधीन करना सम्भव नहीं। लेकिन इस तरह की सोच आसुरी चिन्तन है, जबकि सनातन दैवीय चिन्तन है। यहाँ इन्द्रियों को वश में करने की बात होती है। सनातन लेने की नहीं, देने की संस्कृति है। सनातन मृत नहीं, जीवन्त है। स्थिर नहीं, सतत् है। जड़ नहीं चैतन्य है। सनातन जीवन-दर्शन भौतिक, शारीरिक, पारिवारिक और सामाजिक से ऊपर उठकर आत्मिक, आध्यात्मिक स्तर पर भी संतुष्ट करता है। यह उपभोग की नहीं, उपयोग की संस्कृति है। यह लाभ-लोभ की नहीं, त्याग की संस्कृति है। यह भोग की नहीं, मोक्ष की संस्कृति है। यह बाँधता नहीं, मुक्त करता है। सनातन जीवन-दर्शन दानव को मानव बनाता है, मानव को देवता और देवता को ईश्वर के रूप में स्थापित कर देता है। सनातन केवल स्वयं की बात नहीं करता, सदा वसुधैव की बात करता है। केवल आज की बात नहीं करता, बीते हुए कल का विश्लेषण कर आने वाले भविष्य के लिए तैयार करता है। इसलिए यह शाश्वत है, निरन्तर है। इसलिए आधुनिक मानव को सनातन के इस मूल मंत्र को पकड़ना होगा, तभी हम सनातन जीवन-दर्शन को समझ पाएँगे …।