☀ प्रभु प्रेमी संघ ? 28 फरवरी, 2024 (बुधवार)

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पूज्य सद्गुरुदेव आशीषवचनम्
।। श्री: कृपा ।।
? पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों का अनुसरण, अनुपालन और संवर्धन से आशय किसी एक सम्प्रदाय के सशक्तिकरण से नहीं, अपितु वैश्विक हित व मानवीय मूल्यों के संरक्षण से है, इसीलिए भारत को ज्ञान आलोक के प्रसार का देश कहा जाता है। हम भारतीय विश्व शान्ति निमित्त नित्य प्रार्थना करने वाली सनातन संस्कृति के उपासक होने पर अत्यन्त गौरवान्वित हैं ..। सनातन धर्म प्राचीन धर्म है। साक्षात् ईश्वर ने सनातन धर्म की स्थापना की है। यह अनादि और अनन्त है। सनातन का अर्थ जो नित्य शाश्वत और समाचीन है। जो हर पल है, और वो तब से है जब से धरती, गगन, अम्बर है और जब से मानवीय अस्तिस्व है। वो तब से है जब से जैव जगत है। सनातन का अर्थ है, जो सबके हित की बात करता है। जो सबके लिए है वो सनातन है। हमारे यहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। सनातन वो है, जहाँ अभिव्यक्ति का सौन्दर्य है। हम किसी भी ढंग से पूजा कर सकते हैं। यहाँ कोई संकीर्णता नहीं है। भारतीय वैदिक-सनातन संस्कृति सभी के सम्मान-स्वाभिमान व अधिकारों के प्रति उदार-संवेदनशील है। सनातन वह जीवन-दर्शन है, जो प्रकृति को वश में करने का समर्थन नहीं करता। यों तो प्रकृति को पराजित करके उसको अधीन करना सम्भव नहीं। लेकिन इस तरह की सोच आसुरी चिन्तन है, जबकि सनातन दैवीय चिन्तन है। यहाँ इन्द्रियों को वश में करने की बात होती है। सनातन लेने की नहीं, देने की संस्कृति है। सनातन मृत नहीं, जीवन्त है। स्थिर नहीं, सतत् है। जड़ नहीं चैतन्य है। सनातन जीवन-दर्शन भौतिक, शारीरिक, पारिवारिक और सामाजिक से ऊपर उठकर आत्मिक, आध्यात्मिक स्तर पर भी संतुष्ट करता है। यह उपभोग की नहीं, उपयोग की संस्कृति है। यह लाभ-लोभ की नहीं, त्याग की संस्कृति है। यह भोग की नहीं, मोक्ष की संस्कृति है। यह बाँधता नहीं, मुक्त करता है। सनातन जीवन-दर्शन दानव को मानव बनाता है, मानव को देवता और देवता को ईश्वर के रूप में स्थापित कर देता है। सनातन केवल स्वयं की बात नहीं करता, सदा वसुधैव की बात करता है। केवल आज की बात नहीं करता, बीते हुए कल का विश्लेषण कर आने वाले भविष्य के लिए तैयार करता है। इसलिए यह शाश्वत है, निरन्तर है। इसलिए आधुनिक मानव को सनातन के इस मूल मंत्र को पकड़ना होगा, तभी हम सनातन जीवन-दर्शन को समझ पाएँगे …।
? पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा – हमारी वैदिक सनातन संस्कृति के पथ-प्रदर्शक वेद, पुराण तथा उपनिषद् हैं। यही हमारी भारतीय संस्कृति भी है, संस्कृति किसी भी सभ्यता के लिए प्राणवायु के समान होती है। जिस प्रकार प्राण वायु के बिना जीवन सम्भव नहीं, ठीक उसी प्रकार संस्कृति के नष्ट हो जाने से मानवीय समाज पथभ्रष्ट हो जाता है। संस्कृति का ज्ञान हमें ग्रन्थों से होता है। ये ग्रन्थ हमें अपने कर्तव्यों का बोध कराते हैं तथा हमें धर्म-मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं, इसलिए धर्म-ग्रन्थ हमारे पथ-प्रदर्शक हैं। अत: ग्रन्थों के अध्ययन से ही संस्कृति का निरन्तर विकास सम्भव है। उन्होंने कहा कि साधु किसी वेष, चोला, जटाधारी का प्रतीक नहीं; वह तो शान्ति, त्याग, समर्पण राग-रहित जीवन का प्रतीक है, जिसकी तुलना शास्त्राें में कपास से की है। प्रकृति सरल होने के साथ उतनी ही रहस्यमय है, वहाँ जीवनदायी और पालनहार है। “वैदिक सनातन हिन्दुत्व” जीवनशैली सनातन जीवन दर्शन पर आधारित है। सनातन शास्त्रों में ऋषि-मुनियों द्वारा एक मूल मंत्र दिया है, वह है – “नेति नेति …” (अर्थात्, न इति न इति …)। प्रकृति के नियम से, जब मनुष्य जीता है तब तक वह सुखी और सम्पन्न रहा है, किन्तु जब उसने अतिक्रमण करने कि कोशिश की तो मनुष्य को प्रकृति का विध्वंसकारी और विघटनकारी रूप का सामना करना पड़ा है। प्रकृति का जितना अनुभव किया जाए, उतना ही उसका विस्तार स्वरूप का अनुभव मिलता है। सनातन हिन्दू, भक्षक नहीं, प्रकृति का रक्षक होता है। वैदिक सनातन हिन्दुत्व एक प्रकृति संरक्षक संस्कृति है। प्रकृति ईश्वर-ब्रह्म से सम्बन्धित है। सनातन, शाश्वत और निरन्तर है। मैं ‘सनातनी’ हूँ का अर्थ है – “मैं प्रकृति का पुजारी हूँ “। सनातन एक धर्म नही है, बल्कि एक संस्कृति है, जिसे मानव को अपने अनुकरण में ले आना चाहिए। इस माध्यम से ही मनुष्य अपने जीवन में आत्म-ज्ञान, मुक्ति और मोक्ष को प्राप्त हो सकता है …।

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