पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – “त्यजेत एकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत ।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथ्वीं त्यजेत ।।”
सनातन धर्म में राष्ट्र की अभिरक्षा को पुरुषार्थ माना गया है। देश की एकता अखण्डता और स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपने स्वहित अथवा कुल परम्परा का भी त्याग करना श्रेयस्कर है। वही राष्ट्र उन्नतिशील है जहाँ के नागरिक सभ्य, सुशिक्षित और संस्कार सम्पन्न हैं। अतः हमारे सभी प्रयास आत्मोन्नयन की दिशा में ही हो। आत्म-निर्माण राष्ट्र निर्माण की आरम्भिक इकाई है ..! आत्म-निर्माण से ही राष्ट्र निर्माण होता है। किसी भी राष्ट्र की सच्ची सम्पत्ति उसके धन-साधन नहीं बल्कि आदर्श, चरित्रवान व निष्ठावान नागरिक होते हैं। वह परिवारों से ही निकलते हैं। हमें ईश्वर ने जो दायित्व सौंपा है उसे पूरी सत्यनिष्ठा व धर्मपरायणता से निर्वहन करें। एक आदर्श पति, पिता, पुत्र, माता, किसान, शिक्षक, व्यापारी व आदर्श नागरिक बनकर अपने परिवार, समाज, गाँव व राष्ट्र की सच्ची सेवा करें। अपने गाँव को आदर्श गाँव बनाने की ओर बढ़ें। इसके लिए गांव में व्यसन मुक्ति अभियान, स्वच्छता, पर्यावरण व नारी जागरण अभियान चलायें। आत्मभाव का क्षेत्र विस्तृत कीजिए, सामूहिक उन्नति की बात सोचिये। सबको आत्मा मानकर सबकी उन्नति, सबके कल्याण की बात सोचें और इसी योजना को कार्यान्वित करें, तो राष्ट्र-निर्माण हो सकता है। व्यक्तिगत उन्नति से अधिक लाभ नहीं है। सब की उन्नति में अपनी उन्नति सोचने से आत्मा का विस्तार होता है। सद्ज्ञान मनुष्य को अपनी आत्मा से ही प्राप्त होता है। इस स्तर पर मनुष्य इतना ऊँचा उठता है कि उसे साँसारिक मोह, माया, त्रुटियाँ, आलोचनाएँ नहीं सतातीं। उसका मन पवित्र और निर्भय हो जाता हैं। इस आत्मदृष्टि के पाने से रोग, दुःख, शोक आदि पास नहीं फटक सकते। आत्मा के ज्ञान से क्या नहीं जाना जा सकता? सच्ची शान्ति, सच्चा सुख, सच्ची ज्योति आत्मा में ही प्राप्त है …।
पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा – आत्म-निर्माण का अन्तिम साधन है आत्म−भाव का विस्तार। साधक की दृष्टि से विकास का सबसे उच्चस्तर यही है। इस स्तर पर पहुँचने से साधक सर्वत्र आत्मभाव का दर्शन करता है। प्रत्येक व्यक्ति, वस्तु तथा जगत को वह ब्रह्म रूप देखता है। अपने शरीर को वह परमात्मा का ग्रह समझता है। वह जिस वस्तु को देखता है वे सब उसकी आत्मा के अंग प्रत्यंग हैं। उसकी आत्मा का कार्यक्षेत्र सुविस्तृत होता है, जिसमें शत्रु मित्र सभी सम्मिलित रहते हैं। वह जो देखता है, स्पर्श करता है, भाषण करता है, उसमें आत्मा का अस्तित्व है। जो भोजन करता है, श्वास लेता है सब ब्रह्मरूप चेतन अमृत है। ऐसा साधक अपने आपको शरीर नहीं, आत्मा समझता है। वह देश, जाति, वर्ण की संकुचित भूमि से उठकर सब मनुष्यों में एक रस बहने वाली आत्मा को ही देखता है। संसार की वासनाओं की तरंगें उसे दु:खी नहीं करतीं, क्योंकि वह तो स्थिर वस्तु आत्मा में ही विश्वास करता है। वह देहपूजा में रत नहीं रहता, वरन् आत्मा की आराधना करता है।आत्म−निर्माण के इच्छुकों नीरोग और स्वस्थ शरीर बनाओं, जिससे तुम स्वयं अनिष्टकर चिन्तन से बच सको तथा अहितकर कल्पनाओं से बच कर अपना जीवन दिव्य प्रबन्ध से सुव्यवस्थित कर सको। तुम्हें वही ग्रहण करना चाहिये जो शुभ हो। स्वास्थ्य, पवित्र भोजन, सात्त्विक वस्तुओं के भोजन पर निर्भर है। आप जो भोजन करते हो, उसी के अनुसार तुम्हारी भावनाओं का निर्माण होता है। सात्त्विक वस्तुओं−गेहूँ, चावल, फल, सब्जियाँ, दूध, मेवे इत्यादि पर बना हुआ स्वस्थ मनुष्य आत्म-निर्माण सरलता से कर सकता है। उसकी भावनाएँ तामसी वस्तुओं की ओर आकृष्ट न होंगी। वह दूसरों के प्रति कभी घृणा−द्वेष, ईर्ष्या, क्रोध की भावनाएँ नहीं ले जायेगा। इसके विपरीत माँस, मादक द्रव्य, तामसी उत्तेजक पदार्थों, मद्य इत्यादि के बल पर स्वस्थ शरीर अन्दर से खोखला रहेगा। वह उस रेत की दीवार की भाँति है, जो जरा से धक्के से धराशायी हो सकता है। नींद परिश्रम, श्वास−प्रश्वास के व्यायाम, दूध छाछ, फलों के रस ये सभी तत्व शरीर की रक्षा के लिये अमूल्य हैं। उपवास द्वारा रोग से भक्ति तथा अंतरंग शुद्धि करते रहना अनिवार्य है …।