पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – “बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते । तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ।।”
कर्म बीज हैं। इस दृष्टि से हम जो भी हैं, अपने कर्मों का ही परिणाम हैं। अर्थात् हमारे शुभाशुभ कर्मों द्वारा ही हमारा प्रारब्ध और भोग-भाग्य निर्धारित होते हैं, इसलिए हमारे द्वारा क्रियान्वित प्रत्येक कर्म परमार्थ से अभिप्रेरित हों। आध्यात्मिक पथिक अपने समस्त कार्यों को उत्साह पूर्वक संचालित करता है। प्रत्येक कार्य को परमात्मा की सेवा उपासना मानकर करना ही श्रेष्ठता, पूर्णता और जीवन की संसिद्धि का रहस्य है ..! कर्म बीज की भाँति जीवन में सुख-दुःख की फसल उगाते हैं। मनसा, वाचा, कर्मणा पावित्र्य और स्वयं के प्रति जागरूकता नितान्त अपेक्षित है। सचेत रहना एक स्थिर जीवन और एक स्वस्थ मन का आधार है। सचेत रहने का अर्थ है – सदैव एक जागरूकता की भावना बनाए रखना, जिसके द्वारा आप स्वयं के विचारों एवं कार्यों को देख रहे हों। हमारा चिन्तन ऐसा होना चाहिए कि हम कभी भी दूसरों के मन को आहत न करें। दरिद्र के प्रति, दीन के प्रति, अभावग्रसित के प्रति संवेदनशील रहें, उनका सम्मान करें इससे बड़ा विचार और क्या होगा कि हमारी संस्कृति ने दरिद्र को भी नारायण कहा है। जैसा बीज बोयेंगे, फल वैसा ही आयेगा। हम सब चाहते हैं कि हमें जीवन में केवल आनन्द ही प्राप्त हो, परन्तु सदा ऐसे कैसे हो सकता है। हम सब चाहते हैं जीवन में केवल परम सुख और शान्ति ही मिले, परन्तु ऐसा भी कहाँ होता है। हमारे चाहने में और कर्म में विरोध है। “जो जस करहि, तस फल चाखा ..।” कर्म हमारा बीज है। जो बोयेंगे, वही देर-सवेर काटेगें। बीज बोने में और फसल काटने में समय का अंतराल हो सकता है। हम भूल जाते हैं कि हमने क्या बोया था। परन्तु प्रकृति को और उसके नियमों को भूलने की आदत नहीं है। फल ही प्रमाण है कि हमने क्या बोया था। कर्म से ही हमारा बन्धन है, कर्म से ही हमारी मुक्ति है। कर्म के अनुसार ही हमारी गति व स्थिति है …।
पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा – जिसे हम भाग्य कहते है, वह क्या है? हमारे द्वारा पूर्व में किए गए अच्छे या बुरे कर्मो का फल। ईश्वर न किसी का भाग्य बनाते हैं न बिगाड़ते हैं। उस सर्वव्यापक ने तो हमें सत्य ज्ञान वेद के रूप में दिया है। हमें विचार करने की सामर्थ शक्ति के रूप में बुद्धि प्रदान की है। कर्म करने के लिए हाथ पाँव के साथ साधन के रूप में दस इन्द्रियाँ दी हैं और हमारे उपयोग, उपभोग के लिए सारी प्रकृति जैसा खजाना दिया है। किसी और प्राणी को इतना नहीं दिया है जितना मनुष्य को। जैसा करो वैसा पाओ। हमारी असली पहचान तो कर्मो से ही है – न धन से, न पद से, न बल से और न हमारी ज्ञान विद्वता से। हमारा ज्ञान सार्थक तब ही है जब हम इसे अपने आचरण में उतारें। ज्ञान और कर्म दो पंखों की तरह हैं जिनके सहारे से ऊँची उड़ान भरी जा सकती है। गीता ने तो स्पष्ट ही कहा है, हमें कर्म की स्वतंत्रता है, फल की नहीं। कर्म ही हमारा बन्धन है, कर्म ही मोक्ष है। कर्म ही धन है, कर्म ही हमारा गर्भाशय है। कर्म से ही गति है, सुगति है। श्रेष्ठतम कर्म ही यज्ञ है। ईश्वर से हम प्रार्थना करते हैं कि हमें सद्बुद्धि दें। क्यों? इसलिए कि हमारे कर्म विवेकपूर्ण हों, जिसके द्वारा सतकर्म हों। एक व्यक्ति नास्तिक है, ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानता, परन्तु वह सत्कर्म करता है। उसे क्या फल मिलेगा? शुभ कर्मों के अनुसार शुभ फल मिलेगा। दूसरा व्यक्ति है तो आस्तिक, लेकिन कर्म खोटे करता है। खोटे कर्म के फल भी खोटे होंगे। ईश्वर सदा न्याय करता है और स्वयं भी अपने नियमों के बन्धन में है। कर्मशील व्यक्ति कर्म करते हुए विश्राम कर लेता है। कर्म में ही उसका विश्राम, हर्ष और आनन्द निहित है।’ कर्म की निरन्तरता आपको गतिशील व प्रगतिशील बनाए रखती है। आप अपनी ऊर्जा दूसरों को प्रभावित करने में खर्च न करें। वरन् अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा को शुभकार्यों में लगायें, कल आपकी सफलता लोगों को स्वयं प्रभावित करेगी। इस प्रकार जब हम बिना फल की इच्छा से कर्म करते हैं तब निष्काम-फल यानि अमृत-फल की उत्पत्ति होती है, जिसे प्राप्त कर हम परम-आनन्द अवस्था में स्थित होकर जन्म-मृत्यु चक्र से मुक्त हो परमगति को प्राप्त हो सकते हैं …।