झोला छाप ख़बरी शहरी पत्रकारिता में टूटती और आंचलित पत्रकारिता में आज भी मजूबत रीड़ कि हड्डी ….?
समाज में बढ़ती हुई स्वार्थ की भावना और आत्म केंद्रित होना ही पत्रकारों के पतन का एकमात्र कारण है। पत्रकारिता कोई बिजनेस नहीं है यह सच्चाई की राह पर चलने जैसा जुनूनी काम है जिसमें हमेशा दाल रोटी के लाले पड़े रहते हैं। लेकिन पत्रकार अगर अपने निष्पक्ष धर्म से जरा सा भी नीचे उतर जाए तो उसके लिए बहुत मौज मस्ती के बहुत सारे सामान मौजूद हैं। आजकल अधिकतर पत्रकार आसान रास्ता चुनते हैं सच दिखाकर जानलेवा दुश्मनी कौन ले? इससे बेहतर है कि किसी न किसी की गोद में बैठे रहो और मलाई खाते रहो। इसका उदाहरण आप डिग्री वाली शहरी पत्रकारिता में देख सकते है ..?
वही आंचलिक पत्रकारिता उन विवेकाधीन एवं स्वाधीन पत्रकारों के लेखों, रिपोर्टों, संवादों और साक्षात्कारों को कहा जाता है, जो अपने स्थानीय क्षेत्र के मुद्दों, समस्याओं, व्यक्तियों और समुदायों पर विशेष जानकारी प्रदान करते हैं। इसके लिए वे स्थानीय अखबारों, पत्रिकाओं, रेडियो स्टेशनों, टीवी चैनलों या अन्य मीडिया मंचों में काम करते हैं।
आंचलिक पत्रकारों का काम अक्सर शहरों से दूर व पिछड़े क्षेत्रों में होता है, जहां स्थानीय मुद्दों को बड़ी मीडिया कंपनियों द्वारा उठाया जाना असंभव होता है। इन पत्रकारों का काम स्थानीय लोगों के अधिकारों को जानने, समाज के अन्य विषयों पर विचार विनिमय करने और समस्याओं को उजागर करने का होता है। इसलिए, आंचलिक पत्रकारों को समुदाय की आवाज़ बनाने का महत्वपूर्ण रोल मिलता है।
हाँ, आप इसे पत्रकारिता की रीढ़ की हड्डी भी कह सकते हैं, क्योंकि इस शाखा के पत्रकारों का काम समुदाय के मुद्दों को उठाना और उन्हें सामाजिक न्याय के लिए लड़ाई लड़ना होता है, जिसमें वे समाज के लोगों के साथ साथ स्थानीय अधिकारियों और संस्थाओं के साथ भी अच्छी संबंध बनाते हैं। इसलिए, आंचलिक पत्रकारों की रिपोर्टिंग उन्हें एक संपूर्णता देती है, जो समाज की समस्याओं और उनके समाधान के बारे में विशेष जानकारी प्रदान करती है।
आमतौर पर, आंचलिक पत्रकारों के पास संचार के लिए उचित संसाधन नहीं होते हैं और उनके पास बड़े मीडिया कंपनियों की तुलना में कम बजट होता है। इसलिए, उन्हें न केवल अपने स्थानीय समुदाय की जानकारी प्रदान करना होता है, बल्कि वे अपने संगठन या संस्थान के साथ मिलकर अपने काम को संचार करने के लिए भी प्रयास करते हैं।
इसलिए, आंचलिक पत्रकारिता जैसी रीढ़ की हड्डी को माना जा सकता है, जो दर्शकों को संदेशों और समस्याओं के संदर्भ में अधिक संवेदनशील बनाती है। क्योंकि इनके पास कोई डिग्री नही नही होती ….?
